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श्रीनि से संवाद: DU में 2.5 लाख छात्र, लेकिन हॉस्टल सिर्फ 9000 क्यों?

दिल्ली में 7 छात्रों की मौत ने खोली सिस्टम की पोल। 'द फ़ेडरल देश' पर जानिए कैसे हॉस्टल की कमी भारत के 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' को डिजास्टर बना रही है।


Srini se Samvad: दिल्ली के सत्य निकेतन (साउथ कैंपस) में 6 मंजिला पीजी (PG) इमारत ढहने से हुई 7 छात्रों की दर्दनाक मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया है। नए संसद भवन और भव्य कर्तव्य पथ बनाने वाली सरकारें आखिर छात्रों के लिए सुरक्षित हॉस्टल क्यों नहीं बनातीं? जब शिक्षा, पाठ्यक्रम और फीस पर बात होती है, तो यह क्यों भुला दिया जाता है कि देश के भविष्य (छात्रों) के रहने का ठिकाना क्या होगा?


'द फ़ेडरल देश' के खास कार्यक्रम 'श्रीनि से संवाद' में एंकर मनीष कुमार के साथ द फ़ेडरल के एडिटर-इन-चीफ एस. श्रीनिवासन (S. Srinivasan) ने इस मुद्दे की परतें खोलीं। इस चर्चा में जो आंकड़े और सच्चाइयां सामने आईं, वे स्पष्ट करती हैं कि अगर वक्त रहते छात्रों की शिक्षा और आवास पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भारत का 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' (जनसांख्यिकीय लाभांश) देश के लिए सबसे बड़ा 'डिजास्टर' (विनाश) बन जाएगा।

1. DU का खौफनाक सच: 2.5 लाख छात्र और सिर्फ 9000 बेड
सत्य निकेतन की घटना कोई सामान्य हादसा नहीं है, बल्कि सिस्टम की नाकामी का जीता-जागता सबूत है। दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) देश की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज में से एक है।

आंकड़े डराते हैं: डीयू में लगभग 2.5 लाख छात्र पढ़ते हैं, लेकिन यूनिवर्सिटी के पास हॉस्टल में सिर्फ 9000 बेड उपलब्ध हैं। अन्य राज्यों से आने वाले 100 में से 90 छात्रों को हॉस्टल नसीब नहीं होता।

श्रीनिवासन ने कड़ा सवाल उठाया कि जब दिल्ली के पॉश साउथ कैंपस का यह हाल है, तो मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश या झारखंड के दूरदराज इलाकों से आने वाले छात्रों का क्या होता होगा? सपनों को लेकर दिल्ली आने वाले छात्र मजबूरन बिना सुरक्षा मानकों वाले जानलेवा प्राइवेट पीजी (PG) में रहने को विवश हैं।

2. नीति आयोग की रिपोर्ट और सरकार की भटकी हुई प्राथमिकताएं
यह संकट सिर्फ दिल्ली का नहीं, बल्कि पूरे देश का है। देश में 1100 से ज्यादा यूनिवर्सिटीज और 42 हजार से अधिक कॉलेज हैं।

65% कॉलेजों में हॉस्टल नहीं: नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि 60 से 65 प्रतिशत सरकारी/सार्वजनिक कॉलेजों में बाहर से आने वाले छात्रों के लिए हॉस्टल की कोई सुविधा नहीं है। खासकर लड़कियों की सुरक्षा के अभाव में उनका एनरोलमेंट (दाखिला) सीधे तौर पर प्रभावित होता है।

विदेशी छात्रों पर फोकस, अपनों की अनदेखी: नई शिक्षा नीति और सरकारों का पूरा फोकस 50,000 विदेशी छात्रों को लुभाने और ग्लोबल लेवल के हॉस्टल बनाने पर है। लेकिन उन 97% भारतीय छात्रों की अनदेखी की जा रही है, जो इसी देश में पढ़ते हैं। इसके अलावा, कॉलेजों में शिक्षकों की 40% तक कमी है और इंफ्रास्ट्रक्चर चरमरा चुका है।

3. 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' बनाम 'डिजास्टर': 2040 का अल्टीमेटम
इस चर्चा का सबसे गंभीर पहलू 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' (युवा आबादी का आर्थिक लाभ) था।

1990 के दशक तक देश की 40% आबादी 15 साल से कम उम्र की थी। आज भारत की वर्किंग पॉपुलेशन (15 से 64 वर्ष) सबसे ज्यादा है, लेकिन इसका लाभ हमें केवल 2040 तक ही मिल पाएगा।

2050 तक देश की 44% से अधिक आबादी वृद्धावस्था की ओर बढ़ जाएगी।

एशियन टाइगर बनाम लैटिन अमेरिका: हांगकांग, सिंगापुर और ताइवान जैसे देशों ने समय रहते अपने युवाओं को बेहतर शिक्षा और सुविधाएं देकर खुद को आर्थिक महाशक्ति (Asian Tigers) बना लिया। वहीं, लैटिन अमेरिकी देश ऐसा न कर पाने के कारण घोर सामाजिक असमानता और संकट में फंस गए।

यदि हम आज इन छात्रों को सुरक्षित माहौल, शिक्षा और रोजगार नहीं देंगे, तो 'विकसित भारत' का सपना टूट जाएगा और यह युवा आबादी हमारे लिए एक बड़ा सामाजिक संकट बन जाएगी।

4. युवाओं की बगावत: धर्म से हटकर 'शिक्षा और रोज़गार' पर आई बहस
अब तक देश की राजनीति धर्म, जाति और जनसंख्या वृद्धि के इर्द-गिर्द घूमती थी। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) जैसे युवा आंदोलनों और नीट (NEET) विवाद ने राजनीति की दिशा बदल दी है।

श्रीनिवासन ने कहा कि अब राजनेताओं को मजबूरन शिक्षा, हॉस्टल और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर बात करनी होगी।

युवा वोटर और बच्चों को दिल्ली भेजने वाली माताएं (महिला वोटर) अब सवाल पूछ रही हैं। सत्य निकेतन हादसे ने अभिभावकों के मन में जो खौफ पैदा किया है, उसका जवाब सरकारों को देना ही होगा।

निष्कर्ष:
भारत को अमेरिका के 'यूनिवर्सिटी सिटीज' (जैसे पर्ड्यू - Purdue) मॉडल से सीखने की जरूरत है, जहां पूरा शहर ही यूनिवर्सिटी और छात्रों की अर्थव्यवस्था के इर्द-गिर्द बसा होता है। सत्य निकेतन हादसे के बाद यदि सरकारें अब भी नहीं जागीं और हॉस्टल व शिक्षा के बुनियादी ढांचे पर पैसा नहीं खर्च किया, तो कंक्रीट के मलबे में सिर्फ छात्रों की जान नहीं जाएगी, बल्कि पूरे देश का भविष्य दफन हो जाएगा।


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