संसद ठप होने से ₹180 करोड़ का नुकसान: 'श्रीनि से संवाद' में बड़ा खुलासा
'द फ़ेडरल' के कार्यक्रम 'श्रीनि से संवाद' में एडिटर-इन-चीफ़ एस. श्रीनिवासन और मनीष कुमार ने बताया संसद के 180 करोड़ का नुकसान, राहुल गांधी की भूमिका व राजनीतिक संकट।
Srini se samwad: संसद के मानसून सत्र का अंतिम दौर चल रहा है, लेकिन सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बना गतिरोध टूटने का नाम नहीं ले रहा। पूरे सत्र के दौरान हंगामे, वॉकआउट और कार्यवाही के बार-बार स्थगित होने के कारण कई महत्वपूर्ण जनहित के मुद्दे बहस से अछूते रह गए हैं। डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के विशेष कार्यक्रम 'श्रीनि से संवाद' में वरिष्ठ पत्रकार मनीष कुमार ने एडिटर-इन-चीफ़ एस. श्रीनिवासन के साथ इस मौजूदा राजनीतिक स्थिति, संसदीय व्यवस्था में आ रही गिरावट और इसके दीर्घकालिक प्रभावों पर एक गहन चर्चा की।
1. मानसून सत्र और बढ़ता वित्तीय नुकसान
चर्चा की शुरुआत करते हुए एंकर मनीष कुमार ने ध्यान दिलाया कि मानसून सत्र खत्म होने में अब केवल दो दिन बचे हैं, लेकिन संसद का काम उस सलीके से नहीं हो पाया जैसी उम्मीद की जाती है। जो बिल पास भी हुए, वे सरकार ने जल्दबाज़ी में पास करा लिए।
इस पर द फ़ेडरल के एडिटर-इन-चीफ़ एस. श्रीनिवासन ने कहा कि इस सत्र से अब किसी बड़े नतीजे की उम्मीद करना मुश्किल है। उन्होंने संसद के ठप होने से हो रहे भारी वित्तीय नुकसान के आंकड़े सामने रखे:
प्रति मिनट और घंटे का खर्च: संसद के दोनों सदनों को चलाने में प्रति मिनट लगभग 2.5 लाख रुपये खर्च होते हैं। यानी दोनों सदन यदि चलें तो प्रति घंटे 1.5 करोड़ रुपये का सार्वजनिक धन खर्च होता है।
दैनिक व सत्र का नुकसान: यदि प्रतिदिन 6 घंटे का सत्र माना जाए, तो हर दिन करीब 9 करोड़ रुपये का खर्च आता है। चार हफ्ते (एक महीने) के इस पूरे मानसून सत्र के वाश-आउट (Washout) होने से देश के लगभग 170 से 180 करोड़ रुपये का भारी आर्थिक नुकसान हुआ है।
2. जवाबदेही का ख़त्म होना और संसदीय प्रक्रियाओं पर चोट
एस. श्रीनिवासन ने बताया कि पैसे के नुकसान से भी बड़ा नुकसान देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और संसदीय जवाबदेही (Parliamentary Accountability) को हो रहा है:
प्रश्नकाल और शून्यकाल का ठप होना: संसद में 'क्वेश्चन आवर' (Question Hour) और 'जीरो आवर' (Zero Hour) ऐसे हथियार हैं जहाँ विपक्ष ही नहीं, बल्कि सत्तापक्ष के सांसद भी अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याओं, स्थानीय मुद्दों और सरकारी नीतियों की कमियों पर तीखे सवाल पूछ सकते हैं। सत्र न चलने से यह प्रक्रिया पूरी तरह ठप हो गई।
संसदीय समितियों को बायपास करना: हंगामे के बीच सरकार कई विधेयकों को बिना किसी गहन चर्चा या स्टैंडिंग कमेटी (Standing Committee) को भेजे ही आनन-फानन में पास करा लेती है, जिससे कानून बनाने की पूरी विधायी प्रक्रिया (Legislative process) प्रभावित होती है।
3. विपक्ष की माँगें और सत्ता-विपक्ष के बीच 'संवादहीनता'
संसद में जारी इस गतिरोध की मुख्य वजहों पर चर्चा करते हुए दोनों पत्रकारों ने विपक्ष के रुख और सरकारी प्रतिक्रिया का विश्लेषण किया:
जंतर-मंतर और लाठीचार्ज का मुद्दा: विपक्ष दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों, पैलेट गोलियों के इस्तेमाल और लाठीचार्ज के मामले में गृह मंत्री से सीधे सदन के अंदर जवाब और वक्तव्य (Statement) की मांग कर रहा है।
शर्तों के साथ गृह मंत्री का बयान: श्रीनिवासन के अनुसार, सरकार और गृह मंत्री सदन में आने को तैयार तो थे, लेकिन उन्होंने यह शर्त रखी थी कि बयान के दौरान कोई रोक-टोक या हंगामा नहीं होगा। विपक्ष ने इन पूर्व-शर्तों को मानने से इनकार कर दिया, क्योंकि उनका तर्क है कि जनप्रतिनिधियों को अपनी बात रखने का पूरा अधिकार होना चाहिए।
संवादहीनता की स्थिति: दोनों पक्षों के अपने-अपने रुख पर अड़े रहने के कारण कोई बीच का रास्ता नहीं निकल सका और संवादहीनता (Communication Breakdown) की स्थिति पैदा हो गई।
4. स्वर्गीय अरुण जेटली के बयान का जिक्र और 'रोल रिवर्सल'
कार्यक्रम के दौरान राज्यसभा में कांग्रेस अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा दिए गए उस वक्तव्य का भी जिक्र हुआ, जिसमें उन्होंने भाजपा के दिवंगत वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली के बयान को उद्धृत किया था।
अरुण जेटली का कथन: पूर्व में अरुण जेटली ने कहा था कि "संसद की कार्यवाही में व्यवधान डालना (Disruption) भी संसदीय रणनीति का एक जायज तरीका (Legitimate Parliamentary Tactic) है, ताकि सरकार को जवाबदेह बनाया जा सके।"
भूमिका का बदलना (Role Reversal): श्रीनिवासन ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि 2004 से 2014 के बीच (UPA-1 और UPA-2 के कार्यकाल में) 2G स्पेक्ट्रम और कोल ब्लॉक आवंटन जैसे भ्रष्टाचार के मुद्दों पर तत्कालीन विपक्षी पार्टी बीजेपी ने भी लगातार कई दिनों और सत्रों तक संसद को ठप रखा था। आज भूमिकाएं बदल चुकी हैं- जो कल सत्ता में थे वे आज विपक्ष में रहकर वही रणनीति अपना रहे हैं, और जो कल विपक्ष में थे वे आज सत्ता में आकर बहस की दुहाई दे रहे हैं।
5. राहुल गांधी और विपक्ष का बदलता शक्ति-समीकरण
संसद के भीतर और बाहर हो रहे राजनीतिक घटनाक्रमों का विश्लेषण करते हुए एडिटर-इन-चीफ़ एस. श्रीनिवासन ने राहुल गांधी की उभरती भूमिका पर अहम बातें कहीं:
'इंडिया' ब्लॉक में नेतृत्व की स्वीकार्यता: पश्चिम बंगाल चुनावों और हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद विपक्ष के अंदर एक बड़ा बदलाव आया है। पहले जो सहयोगी दल (जैसे टीएमसी, एनसीपी आदि) कांग्रेस या राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर झिझक रहे थे, अब संसद के भीतर वे राहुल गांधी को विपक्ष के मुख्य नेता (Leader of Opposition) के रूप में पूर्ण समर्थन दे रहे हैं।
जनता और युवाओं के मुद्दे: राहुल गांधी संसद के बाहर नीट (NEET) परीक्षा में धांधली, पेपर लीक, सरकारी नौकरियों में अनियमतताओं और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर युवाओं और छात्रों से सीधे जुड़ रहे हैं। उन्होंने इलाहाबाद, कोटा और देहरादून जैसे शहरों में छात्रों की आवाज उठाई है।
सत्तापक्ष के निशाने पर: विपक्ष का केंद्रीय चेहरा और प्रतीक (Symbol) बनने के कारण ही भाजपा और एनडीए के सांसद संसद परिसर में सीधे तौर पर राहुल गांधी को निशाना बनाकर प्रदर्शन कर रहे हैं।
6. जन-असंतोष और भविष्य की राजनीति
सदन के बाहर देश के सामान्य माहौल पर बात करते हुए विश्लेषकों ने कहा कि जनता के बीच कुछ बुनियादी समस्याओं को लेकर असंतोष बढ़ रहा है:
आर्थिक दबाव और महंगाई: महंगाई, निजी व सरकारी नौकरियों की कमी और आर्थिक संकट (Economic Distress) से आम नागरिक परेशान हैं।
अंतरराष्ट्रीय और कृषि कारक: खाड़ी देशों (गल्फ़) में चल रहे तनाव, तेल की कीमतों की अनिश्चितता और अल-नीनो के कारण खेती-किसानी पर मंडराते संकट ने इस असंतोष को और गहरा किया है।
एंटी-इनकंबेंसी (Anti-Incumbency): सरकार जब अपने लंबे कार्यकाल (तीसरे टर्म) में होती है, तो जनता उनके पुराने वादों के पूरा न होने पर सवाल उठाने लगती है। इसी वजह से आने वाले राज्य विधानसभा चुनावों और आगामी राजनीतिक परिदृश्य में यह टकराव और तीखा होने की संभावना है।
कार्यक्रम के अंत में दोनों पत्रकारों ने इस बात पर जोर दिया कि केवल नए और भव्य संसद भवन (New Parliament Building) के बन जाने से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता। लोकतंत्र की असली आत्मा सदन के भीतर होने वाले सार्थक संवाद, बहस और एक-दूसरे के प्रति सम्मान में बसती है। यदि देश के शीर्ष नेता संसद के अंदर बैठकर जनता के असली सवालों का हल निकालने के बजाय केवल राजनीतिक स्कोर साधने में लगे रहेंगे, तो इससे हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को गहरा आघात पहुँचेगा।
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