श्रीनी से संवाद: दिल्ली SIR फ्लॉप, चुनाव आयोग रद्द करे ये प्रक्रिया
'श्रीनी से संवाद' में एस. श्रीनिवासन का विश्लेषण: दिल्ली में 50% वोटरों पर संकट। जानिए क्यों चुनाव आयोग को SIR रद्द कर जनता से मांगनी चाहिए माफी।
Srini se Samwad: दिल्ली में चुनाव आयोग (Election Commission) द्वारा चलाए जा रहे 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) के तहत वोटर लिस्ट से जुड़े चौंकाने वाले आंकड़े और VVIPs को नोटिस मिलने का मुद्दा तूल पकड़ता जा रहा है। 1.45 करोड़ वोटरों में से लगभग 50% वोटरों का नाम या तो ड्राफ्ट लिस्ट से काट दिया गया है या उन्हें 'विसंगतियों' के कारण नोटिस थमा दिया गया है।
डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के खास कार्यक्रम 'श्रीनी से संवाद' में एंकर मनीष कुमार ने 'द फ़ेडरल' के एडिटर-इन-चीफ एस. श्रीनिवासन के साथ इस पूरे घटनाक्रम की ज़मीनी हकीकत, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और इसके दूरगामी परिणामों पर गहन चर्चा की।
1. SSR प्रक्रिया का मूल उद्देश्य बनाम ज़मीनी हकीकत
एंकर मनीष कुमार ने सवाल उठाया कि ड्राफ्ट रोल में वोटरों की संख्या 1.45 करोड़ से घटकर 95 लाख कैसे हो गई और 32 लाख लोगों को नोटिस क्यों भेजा गया?
जवाब में एस. श्रीनिवासन ने कहा कि चुनाव आयोग का जो मूल उद्देश्य था (कि कोई पात्र वोटर छूटे नहीं और घुसपैठिए/अपात्र वोटर बाहर हों), वह पूरी तरह से विफल हो गया है। चुनाव आयोग घुसपैठियों की पहचान करने में नाकाम रहा है। श्रीनिवासन ने कहा, "यह पूरा सिस्टम अपने रास्ते से भटक गया है। पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा जैसे लोग भी कह चुके हैं कि इस SSR को खत्म (Scrap) कर देना चाहिए और कोई नया, पारदर्शी तरीका अपनाना चाहिए।"
2. VVIPs को नोटिस: चुनाव आयोग की नाकामी या निष्पक्षता?
दिल्ली में लालकृष्ण आडवाणी, जगदीप धनखड़, कपिल सिब्बल, सीएम रेखा गुप्ता और अरविंद केजरीवाल जैसे दिग्गजों को विसंगति (विशेषकर 2002 के SSR से अनमैप्ड होने) का नोटिस भेजा गया।
श्रीनिवासन ने स्पष्ट किया कि इसे निष्पक्षता नहीं, बल्कि "सिस्टम की गड़बड़ी और डिज़ाइन का फेल्योर" कहा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "VVIPs के कागज़ तो तुरंत देखकर निपटा दिए जाते हैं (जैसे सीएम रेखा गुप्ता का मामला एक दिन में सुलझ गया), लेकिन मंगोलपुरी की झुग्गी में रहने वाले आम मज़दूर का क्या होगा? वह 12 दस्तावेज़ कहां से लाएगा?"
3. 'ज़िंदा आदमी को मुर्दा घोषित करना' और नागरिकता पर सवाल
चर्चा में कामता प्रसाद नामक एक व्यक्ति का हास्यास्पद और डरावना उदाहरण दिया गया। कामता प्रसाद ज़िंदा हैं, लेकिन इलेक्शन कमीशन की लिस्ट में उन्हें मृत बता दिया गया। जब उन्होंने शिकायत की, तो आयोग ने गलती मानने के बजाय कहा कि "बीएलओ के अनुसार आप मर चुके हैं।"
श्रीनिवासन ने बताया कि चुनाव आयोग की यह प्रक्रिया अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकों की नागरिकता तय करने का हथियार बन गई है। "लोगों के हाथ में एपिक (Voter ID) कार्ड है, उन्होंने पिछले चुनाव में वोट भी दिया है, लेकिन आयोग कह रहा है कि यह सब बेकार है; साबित करो कि 2002 में तुम्हारा नाम था या नहीं। यह पूरी तरह अवांछनीय है।"
4. न्यायपालिका की चुप्पी और चुनाव आयोग की ज़िम्मेदारी
मनीष कुमार ने कपिल सिब्बल का ज़िक्र करते हुए न्यायपालिका (सुप्रीम कोर्ट) की चुप्पी पर सवाल उठाया।
श्रीनिवासन ने कहा कि कोर्ट का रवैया निराशाजनक रहा है। पश्चिम बंगाल में जब लाखों वोटरों (जिनके नाम में चुनाव आयोग के कर्मचारियों ने ही स्पेलिंग या उम्र की गलती की थी) का नाम काटा गया, तो सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता नहीं दिखाई। श्रीनिवासन ने कहा कि पहले चुनाव आयोग की ज़िम्मेदारी होती थी कि वह पुल के नीचे सो रहे व्यक्ति का नाम भी खुद जाकर लिस्ट में जोड़े। लेकिन अब पूरी ज़िम्मेदारी और 'बर्डन ऑफ प्रूफ' जनता पर डाल दिया गया है।
निष्कर्ष: "SSR को रद्द कर माफी मांगे चुनाव आयोग"
चर्चा का समापन करते हुए एस. श्रीनिवासन ने एक स्पष्ट मांग रखी। उन्होंने कहा, "चुनाव आयोग को यह पूरा SSR कैंसल कर देना चाहिए। उन्हें यह मान लेना चाहिए कि यह काम उनसे नहीं संभला, जनता से माफी मांगनी चाहिए और इसे पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए। प्रक्रिया को दोबारा शुरू किया जाना चाहिए, जिसमें जनता को पर्याप्त समय मिले और पूरी व्यवस्था को ज़्यादा पारदर्शी बनाया जाए।"
4 नवंबर को दिल्ली की फाइनल वोटर लिस्ट जारी होनी है, जिससे यह साफ होगा कि कितने लोगों का नाम बचा और कितने हमेशा के लिए सिस्टम से बाहर कर दिए गए।
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