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'दिमागी नक्सल' विवाद: खान मार्केट से शुरू हुआ नैरेटिव युवाओं के आगे पस्त

'श्रीनि से संवाद' में एस. श्रीनिवासन और मनीष कुमार का विश्लेषण: 'दिमागी नक्सल' शब्द के पीछे की राजनीति, Gen-Z आंदोलनों का पलटवार और बदरंग होती लेबलिंग।


Srini se Samvad: 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए भाषण में इस्तेमाल किए गए शब्द 'दिमागी नक्सल' (Mental/Brain Naxals) को लेकर देश में एक नई राजनीतिक और सामाजिक बहस छिड़ गई है। सरकार विरोधी आवाजों, छात्र आंदोलनों और बुद्धिजीवियों के खिलाफ 'खान मार्केट गैंग', 'टुकड़े-टुकड़े गैंग', 'अर्बन नक्सल' और 'आंदोलनजीवी' जैसे राजनीतिक संबोधनों (Rhetoric) की कड़ी में अब 'दिमागी नक्सल' नया शब्द बनकर उभरा है।


डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म द फेडरल देश के खास कार्यक्रम 'श्रीनि से संवाद' में वरिष्ठ पत्रकार मनीष कुमार ने द फेडरल के एडिटर-इन-चीफ एस. श्रीनिवासन से इस शब्दावली के पीछे की राजनीति, इसके समाज पर प्रभाव और देश की वर्तमान स्थिति पर विस्तृत चर्चा की।


राजनीतिक शब्दावली का विकास: 'खान मार्केट' से 'दिमागी नक्सल' तक
चर्चा के दौरान एस. श्रीनिवासन ने 2014 के बाद से केंद्र सरकार द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली राजनीतिक भाषा और नैरेटिव निर्माण (Narratives) के क्रम को रेखांकित किया:

खान मार्केट गैंग: लुटियंस दिल्ली के उस अभिजात/बौद्धिक वर्ग के लिए इस्तेमाल किया गया शब्द, जिसे सरकार का विरोधी माना जाता था।

टुकड़े-टुकड़े गैंग व अर्बन नक्सल: जेएनयू छात्र आंदोलनों और भीमा कोरेगांव जैसे मुद्दों के समय शहरों में रहने वाले वामपंथी विचारकों व आलोचकों को निशाना बनाने के लिए इस गढ़े गए नैरेटिव का उपयोग हुआ।

आंदोलनजीवी: कृषि कानूनों के खिलाफ हुए किसान आंदोलनों के दौरान सड़क पर उतरने वाले समूहों को यह नाम दिया गया।

दिमागी नक्सल: स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इस शब्द का प्रयोग उन लोगों के लिए किया गया, जो विकास परियोजनाओं, सरकारी नीतियों और विचारों के स्तर पर सरकार से असहमत हैं या आलोचनात्मक रुख अपनाते हैं।

'दिमागी नक्सल' शब्द पर बीजेपी और विपक्ष का रुख
बीजेपी का पक्ष: बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी और पार्टी के राज्यसभा सांसद (पूर्व डीजीपी) बृजलाल के बयानों का हवाला देते हुए बताया गया कि पार्टी के अनुसार, जो लोग विकास परियोजनाओं को पर्यावरण के नाम पर रोकते हैं, संवैधानिक बदलावों या सेना की शहादत पर सवाल उठाते हैं, या विचार के स्तर पर व्यवस्था को चुनौती देते हैं (चाहे वे शिक्षक, कवि, लेखक या बुद्धिजीवी हों), वे इस श्रेणी में आते हैं।

विपक्ष और नागरिक समाज की प्रतिक्रिया: पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम और अरविंद केजरीवाल सहित कई विपक्षी नेताओं ने इस लेबलिंग पर पलटवार करते हुए कहा कि सरकार की गलत नीतियों पर सवाल उठाना देशभक्ति का हिस्सा है, न कि देशद्रोह। विपक्ष का तर्क है कि हर आलोचक को 'नक्सल' या 'राष्ट्रविरोधी' कहना लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है।

जेन-जी और जेन-अल्फा का नया 'प्रतिकार'
एस. श्रीनिवासन ने विश्लेषण करते हुए कहा कि 2014 से लेकर अगले कुछ सालों तक ऐसे शब्दों का इस्तेमाल लोगों को डराने और रक्षात्मक (Defensive) स्थिति में लाने में सफल रहा। लेकिन 2026 के वर्तमान दौर में, विशेषकर जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलनों (Gen-Z) और अब सड़कों पर उतर रही स्कूली बच्चों (Gen-Alpha) की पीढ़ी के बीच इस रणनीति का असर उल्टा देखने को मिल रहा है।

कीचड़ को 'Badge of Honor' बनाना: मुख्य न्यायाधीश की विवादित टिप्पणी के बाद जिस तरह युवाओं ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) बनाई थी, उसी तरह अब 'दिमागी नक्सल' कहे जाने पर युवाओं ने खुद आगे बढ़कर सवाल पूछने को अपनी पहचान बनाना शुरू कर दिया है।

मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने का आरोप: देश का युवा वर्ग (Gen-Z) पेपर लीक, लटकी हुई नौकरियों, महंगी शिक्षा और बेरोजगारी जैसे ठोस सवालों पर जवाब चाहता है। भाषणों में विकास के बड़े-बड़े आंकड़ों और बुनियादी समस्याओं से मुंह मोड़ने के कारण अब जनता इन राजनीतिक संबोधनों (Rhetoric) को बेहद आलोचनात्मक नजरिए से देख रही है।

निष्कर्ष और आत्मचिंतन की जरूरत
वरिष्ठ पत्रकार एस. श्रीनिवासन के अनुसार, राष्ट्र और सरकार दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं। सरकार की नीतियों की आलोचना करना राष्ट्र की आलोचना नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों और युवाओं के पास प्रश्न पूछने का संप्रभु अधिकार है।
उन्होंने कहा कि सरकार को अपने पुराने 'राजनीतिक प्लेबुक' और लेबलिंग वाले नैरेटिव पर निर्भर रहने के बजाय आत्मचिंतन करना चाहिए तथा देश के युवाओं, छात्रों और आम नागरिकों की बुनियादी समस्याओं का समाधान निकालने के लिए सार्थक संवाद की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए।


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