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INDIA गठबंधन में फूट या रणनीति? SP और कांग्रेस ने दिया बड़ा जवाब

क्या इंडिया गठबंधन में सब कुछ ठीक है या सीट शेयरिंग से पहले दबाव की राजनीति शुरू हो चुकी है? द फेडरल देश के शो जनपथ में सपा प्रवक्ता मनोज यादव और कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने इस विवाद पर खुलकर अपनी बात रखी।


Janpath: उत्तर प्रदेश की राजनीति में विधानसभा चुनाव से पहले सियासी तापमान बढ़ने लगा है। भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बाहर करने के लिए इंडिया गठबंधन के तहत कांग्रेस और समाजवादी पार्टी साथ आने की बात तो कर रहे हैं, लेकिन दोनों दलों के नेताओं की बयानबाजी गठबंधन की मजबूती पर सवाल भी खड़े कर रही है। सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के हालिया बयान ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। मसूद ने दावा किया कि यदि कांग्रेस साथ नहीं होती तो समाजवादी पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव में 37 सीटें नहीं जीत पाती।

हालांकि इस बयान के बाद दोनों दलों के आधिकारिक प्रवक्ताओं ने इसे व्यक्तिगत राय बताते हुए गठबंधन को लेकर भरोसा जताया। द फेडरल देश की विशेष चर्चा में समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मनोज यादव और कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने इस पूरे विवाद पर अपनी-अपनी पार्टी का पक्ष रखा।
इमरान मसूद के बयान से क्यों मचा सियासी घमासान?
लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा था। इस गठबंधन को भाजपा के खिलाफ प्रभावी माना गया और समाजवादी पार्टी 37 सीटें जीतने में सफल रही, जबकि कांग्रेस ने भी अपने प्रदर्शन में सुधार किया।लेकिन चुनाव के कुछ महीने बाद ही कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा कि समाजवादी पार्टी की इस सफलता में कांग्रेस की बड़ी भूमिका रही। उनका कहना था कि यदि कांग्रेस साथ नहीं होती तो सपा इतनी बड़ी जीत दर्ज नहीं कर पाती।
राजनीति में बयान अक्सर संदेश भी होते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह सिर्फ व्यक्तिगत टिप्पणी थी या फिर सीट बंटवारे से पहले राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति?
समाजवादी पार्टी ने क्या कहा?
द फेडरल देश की चर्चा में समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मनोज यादव ने विवाद को ज्यादा तूल देने से इनकार किया। उन्होंने कहा,"हम एक हैं। अगर कोई जिम्मेदार शीर्ष नेता इस तरह की बात कहे तो उसका अलग महत्व होता है, लेकिन किसी एक सांसद के बयान का कोई विशेष अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए।"
मनोज यादव का यह बयान साफ संकेत देता है कि समाजवादी पार्टी फिलहाल गठबंधन को लेकर सार्वजनिक टकराव से बचना चाहती है। पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि व्यक्तिगत बयानों को गठबंधन की आधिकारिक लाइन नहीं माना जाना चाहिए।
कांग्रेस ने भी बताया निजी राय
कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने भी इमरान मसूद के बयान को व्यक्तिगत राय करार दिया। उन्होंने कहा,"सीट शेयरिंग को लेकर अभी कोई आधिकारिक बातचीत शुरू नहीं हुई है। जहां तक इमरान मसूद के बयान का सवाल है, वह उनकी निजी राय है। पार्टी का आधिकारिक रुख नहीं है। हमारा लक्ष्य साफ है—उत्तर प्रदेश से भाजपा को हटाना।"
कांग्रेस का यह रुख बताता है कि पार्टी फिलहाल गठबंधन पर किसी तरह का सार्वजनिक विवाद खड़ा नहीं करना चाहती। हालांकि यह भी साफ है कि सीटों के बंटवारे का दौर शुरू होते ही दोनों दल अपनी-अपनी राजनीतिक ताकत का आकलन सामने रखेंगे।
क्या सीट शेयरिंग से पहले दबाव की राजनीति?
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है। ऐसे में यह माना जा रहा है कि नेताओं के बयान कहीं न कहीं अपनी पार्टी की दावेदारी मजबूत करने की कोशिश भी हो सकते हैं।कांग्रेस चाहती है कि लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के आधार पर उसे विधानसभा चुनाव में अधिक सीटें मिलें। वहीं समाजवादी पार्टी यह मानती है कि प्रदेश में उसका संगठन और जनाधार कांग्रेस से कहीं अधिक मजबूत है।यही कारण है कि दोनों दल सार्वजनिक रूप से गठबंधन की बात कर रहे हैं, लेकिन भीतर ही भीतर अपनी-अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने में भी लगे हैं।
बीजेपी की नजर विपक्ष की हर हलचल पर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्षी दलों के बीच इस तरह की बयानबाजी का सबसे अधिक लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है। बीजेपी लगातार यह संदेश देने की कोशिश करती रही है कि इंडिया गठबंधन अवसरवादी है और उसके सहयोगी दल एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करते।ऐसे में यदि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं के बीच बयानबाजी बढ़ती है तो भाजपा को विपक्ष की एकजुटता पर सवाल उठाने का नया मौका मिल सकता है।
गठबंधन की असली परीक्षा अभी बाकी
फिलहाल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों यह कह रही हैं कि उनका साझा लक्ष्य भाजपा को चुनौती देना है। लेकिन राजनीतिक इतिहास बताता है कि गठबंधन की असली परीक्षा चुनाव से पहले सीटों के बंटवारे के समय होती है।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में सीटों का गणित ही सबसे बड़ी राजनीति बन जाता है। ऐसे में आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि दोनों दल बयानबाजी तक सीमित रहते हैं या फिर यह मतभेद सीटों के बंटवारे को भी प्रभावित करते हैं।
फिलहाल दोनों दलों के आधिकारिक प्रवक्ता यही संदेश दे रहे हैं कि गठबंधन मजबूत है और भाजपा के खिलाफ साझा लड़ाई जारी रहेगी। लेकिन राजनीति में कहा जाता है कि "जहां धुआं उठता है, वहां आग भी कहीं न कहीं जरूर होती है।" अब यह आग सिर्फ चिंगारी है या बड़ा सियासी तूफान बनेगी, इसका जवाब आने वाला समय देगा।


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