UP में टलेंगे या होंगे पंचायत चुनाव? हाई कोर्ट के आदेश पर बड़ा घमासान
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी में 3 महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराने का दिया आदेश। विधानसभा चुनाव से पहले बढ़ी योगी सरकार की मुश्किलें, विपक्ष ने घेरा।
Janpath: उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव से ठीक चार महीने पहले राज्य की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में प्रदेश सरकार को सख्त आदेश दिया है कि अगले तीन महीने के भीतर प्रदेश में पंचायत चुनाव संपन्न कराए जाएं। हाई कोर्ट ने साफ किया है कि चुनाव के लिए ओबीसी आयोग की रिपोर्ट का इंतजार करने की जरूरत नहीं है, बल्कि आरक्षण के मौजूदा स्टेटस के आधार पर ही प्रक्रिया पूरी की जाए।
'द फ़ेडरल देश' के खास कार्यक्रम 'जनपथ' में इस कानूनी और राजनीतिक संकट पर विस्तृत चर्चा की गई। इस परिचर्चा में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता मोहम्मद आजम खान और कांग्रेस नेता व अधिवक्ता आशीष आनंद ने हिस्सा लिया। दोनों विपक्षी नेताओं ने योगी सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि सरकार जमीनी स्तर पर अपनी संभावित हार और सत्ता के विकेंद्रीकरण (Decentralization) के डर से चुनाव टालने की कोशिश कर रही थी।
58 हज़ार से अधिक ग्राम प्रधानों का भविष्य और अनुच्छेद 243E का उल्लंघन
चर्चा की शुरुआत में कांग्रेस नेता और अधिवक्ता आशीष आनंद ने संविधान के प्रावधानों का हवाला देते हुए सरकार की 'टालमटोल' नीति पर प्रहार किया।
संवैधानिक बाध्यता: आशीष आनंद ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 243E(1) और 243E(3)(a) स्पष्ट कहता है कि चुनी हुई पंचायत की पहली बैठक से 5 साल की अवधि समाप्त होने से पहले ही नए चुनाव हो जाने चाहिए। सरकार ने जानबूझकर पिछड़ा वर्ग आयोग और आरक्षण का बहाना बनाकर समय बर्बाद किया।
आयोग की निष्क्रियता: उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग बहुत देर से बनाया गया और उसकी बैठकों में लोगों की उपस्थिति तक नगण्य रही, जिस पर माननीय उच्च न्यायालय ने भी कड़ी टिप्पणी की थी।
ऐतिहासिक नज़ीर: आशीष आनंद ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के वर्ष 2000 के ऐतिहासिक फैसले 'प्रेमलाल पटेल बनाम स्टेट ऑफ यूपी' का ज़िक्र करते हुए कहा कि भाजपा जब भी सत्ता में आती है, सत्ता का केंद्रीकरण करने के लिए 5 साल की तय अवधि को मनमाने तरीके से बढ़ाने का प्रयास करती है, जिसे अदालत पूर्व में भी असंवैधानिक करार दे चुकी है।
ग्राम प्रधान बने 'प्रशासक': बैकडोर से चुनाव प्रभावित करने का आरोप
सपा प्रवक्ता मोहम्मद आजम खान ने मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था पर तीखा हमला बोला।
प्रशासक या सत्ता के एजेंट?: कार्यकाल समाप्त होने के बाद 58,189 ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक (Administrator) नियुक्त कर काम चलाने की व्यवस्था पर आजम खान ने कहा कि बीडीओ (BDO), डीएम और जिला पंचायत अधिकारियों के सीधे नियंत्रण में आकर ये प्रतिनिधि स्वतंत्र नहीं रह गए हैं। वे पूरी तरह सत्ता के दबाव में काम कर रहे हैं।
विधानसभा चुनाव पर असर: आजम खान ने दावा किया कि भाजपा बिल्कुल नहीं चाहती थी कि माइक्रो लेवल (वार्ड और पंचायत स्तर) पर चुनाव हों, क्योंकि 10-13 साल के कार्यकाल और नीतियों को लेकर जनता में गहरा आक्रोश है। यदि पंचायत चुनाव होते हैं, तो उसके परिणाम सीधे तौर पर आगामी विधानसभा चुनाव को प्रभावित करेंगे। इसी डर से सरकार इसे विधानसभा चुनाव के बाद तक टालना चाहती थी।
'वन नेशन, वन इलेक्शन' की थ्योरी पर सवाल
परिचर्चा में यह सवाल भी उठा कि क्या प्रशासनिक मशीनरी इतने कम समय में पंचायत और विधानसभा दोनों चुनाव कराने में सक्षम है?
कांग्रेस का पलटवार: आशीष आनंद ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार पूरे देश में 'वन नेशन, वन इलेक्शन' का राग अलापती हैं। यदि वे पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने का दावा करते हैं, तो क्या वे एक राज्य में पंचायत और विधानसभा चुनाव साथ या कुछ अंतराल पर नहीं करा सकते? अगर सरकार असमर्थता जताती है, तो उनकी 'वन नेशन, वन इलेक्शन' की पूरी थ्योरी ही खारिज हो जाती है।
बागी उम्मीदवारों का भय: आनंद ने यह भी जोड़ा कि यूपी में करीब 7 लाख ग्राम पंचायत वार्ड हैं। सरकार को डर था कि टिकट बंटवारे और चुनाव के दौरान स्थानीय स्तर पर बगावत होगी, जिससे विधानसभा चुनाव में उनका प्रशासनिक गणित बिगड़ सकता है।
क्या सुप्रीम कोर्ट का रुख करेगी सरकार?
विपक्षी प्रवक्ताओं ने अंदेशा जताया कि योगी सरकार हाई कोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकती है।
पैटर्न का आरोप: सपा प्रवक्ता ने उदाहरण देते हुए कहा कि 69,000 शिक्षक भर्ती मामले में जब हाई कोर्ट और आरक्षित आयोगों ने आरक्षण नियमों का पालन करने को कहा, तो राज्य सरकार स्टे लेने सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई।
विपक्ष का स्टैंड: दोनों प्रवक्ताओं ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार या उनके समर्थक संगठन सुप्रीम कोर्ट जाते हैं, तो इससे उनकी आरक्षण विरोधी और लोकतंत्र विरोधी मंशा पूरी तरह बेनकाब हो जाएगी। विपक्षी दल जमीनी स्तर पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों और लोकतंत्र की रक्षा के लिए अदालत में मजबूती से खड़े रहेंगे।

