x

यूपी 2027: योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर सस्पेंस, सियासी गलियारों में भूचाल

उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के बयान से यूपी में सस्पेंस; क्या 2027 में योगी आदित्यनाथ की जगह सामूहिक नेतृत्व पर दांव लगाएगी दिल्ली?


Janpath: क्या उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में योगी आदित्यनाथ भारतीय जनता पार्टी (BJP) का मुख्यमंत्री चेहरा नहीं होंगे? क्या भाजपा दिल्ली और मध्य प्रदेश की तरह उत्तर प्रदेश में भी बिना किसी मुख्यमंत्री चेहरे के, यानी सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ने जा रही है? डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फेडरल देश' के शो 'जनपथ' में एंकर मनीष कुमार ने उत्तर प्रदेश के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के एक ताजा और चौंकाने वाले बयान को लेकर देश के दो वरिष्ठ पत्रकारों सुनील शुक्ल और आदेश शुक्ला के साथ इस बड़े सियासी सस्पेंस की परतों को खोला है।


प्रदेश अध्यक्ष के बयान ने फूंक दी अटकलों को हवा
एंकर मनीष कुमार ने चर्चा की शुरुआत करते हुए बताया कि उत्तर प्रदेश के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने एक न्यूज़ चैनल के कॉन्क्लेव (कार्यक्रम) में मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर एक बेहद रहस्यमयी बयान दिया है। जब उनसे पूछा गया कि क्या 2027 का चुनाव योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर लड़ा जाएगा, तो उन्होंने इसका स्पष्ट जवाब देने के बजाय कहा कि भाजपा के पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और नितिन नवीन जैसे कई बड़े और दिग्गज नेताओं का 'सामूहिक नेतृत्व' है। उन्होंने यह साफ नहीं किया कि भाजपा योगी आदित्यनाथ को ही अपना इकलौता चेहरा प्रोजेक्ट करेगी।

"योगी आदित्यनाथ के बिना यूपी में चुनाव लड़ना भाजपा के लिए नामुमकिन" - वरिष्ठ पत्रकार सुनील शुक्ल
वरिष्ठ पत्रकार सुनील शुक्ल ने प्रदेश अध्यक्ष के बयान का बारीक विश्लेषण करते हुए कहा कि भले ही पार्टी शब्दों का हेरफेर कर रही हो, लेकिन भाजपा के पास उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के अलावा चुनाव लड़ने का कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

सुनील शुक्ल ने तर्क दिया:

"पिछले 9-10 वर्षों में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश में योगी जी के अलावा किसी दूसरे नेता को खड़े होने ही नहीं दिया। वे न केवल यूपी, बल्कि देश भर में (जैसे हाल ही में हुए पश्चिम बंगाल चुनाव में) भाजपा के सबसे बड़े हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के पोस्टर बॉय रहे हैं। उनका कोर वोटर केवल उनके चेहरे पर बंधा है। अगर भाजपा उन्हें चेहरा नहीं बनाती है, तो वह अपने सबसे मजबूत 'कट्टर हिंदुत्व' के नैरेटिव से ही समझौता कर बैठेगी।"

हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की करारी शिकस्त (सिर्फ 33 सीटों पर सिमटना) और प्रधानमंत्री मोदी के खुद के संसदीय क्षेत्र (वाराणसी) के आसपास की सीटें हारने के कारण केंद्रीय नेतृत्व योगी आदित्यनाथ पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। योगी आदित्यनाथ के चेहरे के साथ 'एंटी-इनकंबेंसी' (सत्ता विरोधी लहर) और पेपर लीक जैसे प्रशासनिक मुद्दे जरूर जुड़े हैं, लेकिन उनके बिना भाजपा का कोर वोट बैंक बिखर सकता है।

"मध्य प्रदेश और राजस्थान की तरह यूपी में भी मिल सकता है सरप्राइज" - आदेश शुक्ला
इसके विपरीत, वरिष्ठ पत्रकार आदेश शुक्ला ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों का उदाहरण देते हुए एक अलग दृष्टिकोण रखा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की जोड़ी हमेशा अपने चौंकाने वाले फैसलों के लिए जानी जाती है, जैसे उन्होंने शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे जैसे दिग्गजों को दरकिनार कर पहली बार के विधायकों को मुख्यमंत्री बना दिया।

आदेश शुक्ला ने कहा:

"भाजपा की रणनीति का यह हिस्सा होता है कि वह नाराज वोटर और विपक्ष दोनों को भ्रमित (Confuse) करने के लिए ऐसे बयान दिलवाती है। उत्तर प्रदेश में 2017 से लेकर 2024 तक भाजपा का ग्राफ लगातार नीचे गिरा है (325 सीटों से घटकर 2022 में कम होना और फिर 2024 लोकसभा में भारी नुकसान)। अगर दिल्ली दरबार चाहेगा कि योगी आदित्यनाथ को केंद्र (दिल्ली) में शिफ्ट कर किसी नए चेहरे, यहाँ तक कि किसी साधारण एमएलए पर दांव लगाया जाए, तो योगी जी जैसे 'प्रतिकार और असहमत' रहने वाले नेता को हटाना आसान नहीं होगा, लेकिन संसदीय बोर्ड के फैसले के आगे किसी की नहीं चलती।"

उन्होंने आगाह किया कि हाल ही में सामने आया राम मंदिर चंदा चोरी का बड़ा विवाद चुनाव में विपक्ष द्वारा एक बड़ा मुद्दा बनाया जाएगा। इसके अलावा, यूपी में युवाओं के पास नौकरी न होना, पेपर लीक के खिलाफ इलाहाबाद से लखनऊ तक छात्रों का सड़कों पर उतरना और ब्राह्मणों की नाराजगी जैसी बड़ी चुनौतियां योगी सरकार के सामने खड़ी हैं।

क्या इतना बड़ा जोखिम लेगी भाजपा?
बहस के अंत में मनीष कुमार और दोनों विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि उत्तर प्रदेश का चुनाव सीधे 2029 के लोकसभा चुनाव यानी दिल्ली के रास्ते को तय करता है। ऐसे में चुनाव से महज कुछ महीने पहले योगी आदित्यनाथ जैसे रसूखदार चेहरे को दरकिनार करना या उन्हें प्रोजेक्ट न करना भाजपा के लिए एक आत्मघाती कदम (Risk) भी साबित हो सकता है। अब देखना यह होगा कि क्या भाजपा अपने 'कोर हिंदुत्व' वोट बैंक को बचाने के लिए योगी के चेहरे को ही आगे रखती है या फिर उत्तर प्रदेश में किसी बड़े राजनीतिक यू-टर्न की स्क्रिप्ट लिखी जा रही है।


Read More
Next Story