BRICS 2024: 7 साल बाद भारत आ रहे शी जिनपिंग, क्या सुधरेंगे रिश्ते?
BRICS समिट के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आ रहे हैं। गलवान के बाद पहले दौरे और द्विपक्षीय वार्ता पर 'द फ़ेडरल देश' पर पूर्व राजनयिक का विश्लेषण।
Janpath: भारत की मेजबानी में होने जा रहे 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन का मंच सज चुका है। इस सम्मेलन की सबसे बड़ी और अहम खबर चीन के विदेश मंत्रालय से आई है, जिसने पुष्टि कर दी है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) भारत आ रहे हैं। साल 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद यह पहला मौका है जब चीनी राष्ट्रपति भारतीय सरजमीं पर कदम रखेंगे।
'द फ़ेडरल देश' के खास कार्यक्रम 'जनपथ' में इसी अहम कूटनीतिक हलचल पर चर्चा की गई। पूर्व भारतीय राजनयिक विवेक काटजू ने इस दौरे के कूटनीतिक मायने, भारत-चीन के बीच गहराए 'ट्रस्ट डेफिसिट' (भरोसे की कमी) और ब्रिक्स के मंच पर अमेरिका विरोधी गुटबाजी को लेकर विस्तार से विश्लेषण किया।
गलवान के बाद पहला दौरा: क्या पिघलेगी रिश्तों की बर्फ?
कार्यक्रम में पूर्व राजनयिक विवेक काटजू ने स्पष्ट किया कि 2020 के गलवान वाकये के बाद दोनों देशों के रिश्तों में भारी खटास आई है।
भरोसे की भारी कमी: भारत और चीन के बीच सीमा पर स्थिरता लाने के प्रयास जरूर हुए हैं, लेकिन 'ट्रस्ट डेफिसिट' अब भी बरकरार है। चीन ने अभी तक 14 में से 12 पड़ोसियों के साथ सीमा विवाद सुलझा लिया है, लेकिन भारत और भूटान के साथ वह एलएसी (LAC) निर्धारित करने को भी तैयार नहीं है।
क्या होगी मोदी-जिनपिंग वार्ता? कूटनीतिक लिहाज से यह लगभग असंभव है कि शी जिनपिंग भारत आएं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी अलग से द्विपक्षीय वार्ता न हो। यह बैठक रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने की दिशा में अहम हो सकती है।
व्यापारिक असंतुलन और नीयत पर सवाल: भारत दुनिया की 'फार्मास्युटिकल फैक्ट्री' है, लेकिन कच्चा माल (API) चीन से आता है। दूसरी ओर, चीन हाई-टेक सामानों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाता है। काटजू ने साफ कहा कि अगर चीन का रवैया ऐतिहासिक रूप से नकारात्मक रहेगा, तो भारत हमेशा उसकी नीयत पर सवालिया निशान लगाएगा।
BRICS को 'एंटी-अमेरिका' गुट नहीं बनने देगा भारत
ब्रिक्स के मंच पर चीन और रूस की मंशा को लेकर भी 'जनपथ' में बड़ी बात निकलकर सामने आई:
चीन-रूस का एजेंडा: रूस और चीन चाहते हैं कि ब्रिक्स को अमेरिका और पश्चिमी देशों के खिलाफ एक मजबूत गुट (Anti-US Bloc) के रूप में खड़ा किया जाए।
भारत का 'मिडल कोर्स': भारत कभी नहीं चाहेगा कि ब्रिक्स किसी एक देश (चीन या रूस) के अधीन होकर काम करे। इसलिए भारत इस मंच पर एक संतुलित और मध्यम मार्ग (Middle Course) अपना रहा है। हाल ही में सऊदी अरब और यूएई जैसे अमेरिकी सहयोगी देशों के ब्रिक्स में शामिल होने से इस मंच का दायरा और भी व्यापक हो गया है।
सीमा पर शांति के बिना सामान्य रिश्ते नामुमकिन
चर्चा के अंत में यह बात साफ तौर पर उभर कर आई कि लोकतांत्रिक देश होने के नाते, भारत सरकार देश की जनता की भावनाओं की अनदेखी नहीं कर सकती। जब तक सीमा पर चीन की ओर से पूर्ण शांति और स्थिरता का आश्वासन नहीं मिलता, तब तक भारत और चीन के आर्थिक और व्यापारिक रिश्ते पूरी तरह से सामान्य नहीं हो सकते।
Next Story

