डायबिटिक लोग जरूर कराएं ये जांच, हार्ट फेल्यॉर से बचाव में मिलेगी मदद
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हार्ट फेल्यॉर का खतरा डायबिटिक लोगों में अधिक क्यों होता है और कैसे बचें?

डायबिटिक लोग जरूर कराएं ये जांच, हार्ट फेल्यॉर से बचाव में मिलेगी मदद

डायबिटिक मरीजों को कौन-कौन से टेस्ट कब करवाने चाहिए ताकि हार्ट फेल्योर का जोखिम समय रहते पहचाना जा सके और इस समस्या को बढ़ने से रोका जा सके? यहां जानें...


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डायबिटिक मरीजों में दिल कमजोर होने की प्रक्रिया बहुत धीमी गति से चलती रहती है। इसे साइलेंट हार्ट डैमेज कहते हैं। डायबिटीज में जब लंबे समय तक ब्लड शुगर ज्यादा बना रहता है तो यह शरीर की नसों को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाने लगता है। इसे ही डायबिटिक न्यूरोपैथी कहते हैं। अधिकतर लोगों में इसके लक्षण पैरों की झनझनाहट, सुन्नपन या जलन के रूप में देखने को मिलते हैं। क्योंकि इसक सबसे पहले असर अक्सर पैरों की नसों पर दिखता है।

पैरों में दिखते हैं हार्ट डैमेज के लक्षण

अब सवाल उठता है कि शुगर के कारण होने वाले साइलेंट हार्ट डैमेज का असर पहले पैरों में ही क्यों दिखता है? तो इसका कारण यह है कि हमारे पैरों तक जाने वाली नसें शरीर की सबसे लंबी नसों में से होती हैं। लंबी नसों को पोषण बनाए रखना अधिक कठिन होता है। इसलिए शुगर से होने वाला नुकसान वहां पहले दिखाई देता है।

ब्लड में जब लंबे समय तक ग्लूकोज का स्तर अधिक बना रहता है तो वही अतिरिक्त ग्लूकोज नसों की छोटी-छोटी रक्त वाहिकाओं(Blood Vessels)को नुकसान पहुंचाने लगता है। इससे नसों को सही पोषण और ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। साथ ही शुगर से बनने वाले हानिकारक रसायन नसों की संरचना को भी प्रभावित करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि नसें कमजोर होने लगती हैं।

दिल को कैसे प्रभावित करती है डायबिटीज?

शरीर की नसें केवल हाथ-पैर तक सीमित नहीं हैं। कुछ नसें हमारे दिल से भी जुड़ी होती हैं। ये नसें दिल की धड़कन को नियंत्रित करने, उसकी गति को परिस्थिति के अनुसार बदलने और दर्द जैसे संकेत महसूस कराने का काम करती हैं।

लेकिन जब डायबिटी के कारण ये नसें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं तब मुख्य रूप से दो स्थितियां बनती हैं। पहली ये कि दिल की धड़कन का सामान्य नियंत्रण गड़बड़ा सकता है। दूसरी ये कि अगर दिल को ऑक्सीजन की कमी हो या हल्का हार्ट अटैक भी आए तो सीने का सामान्य दर्द महसूस नहीं हो पाता है। यही कारण है कि कुछ डायबिटिक मरीजों में “साइलेंट हार्ट अटैक” देखने को मिलता है।

डायबिटिक न्यूरोपैथी क्या होती है?

डायबिटीज होने पर तंत्रिका क्षति (diabetic neuropathy) केवल पैरों तक सीमित नहीं रहती। यह हृदय की संवेदनात्मक नसों को भी प्रभावित कर सकती है। परिणामस्वरूप, जब हृदय को ऑक्सीजन की कमी होती है या कहिए कि सूक्ष्म इस्कीमिया विकसित होता है तो सामान्य सीने के दर्द जैसे संकेत स्पष्ट रूप से महसूस नहीं होते। इस्कीमिया (Ischemia) का मतलब है, शरीर के किसी हिस्से तक पर्याप्त रक्त न पहुंच पाना। इसी कारण कई डायबिटिक मरीजों में 'साइलेंट मायोकार्डियल इस्कीमिया' पाया गया है, जहां हृदय को क्षति पहुंचती रहती है लेकिन इसके लक्षण स्पष्ट नहीं होते।

जनसंख्या आधारित अवलोकनों में यह पाया गया कि डायबिटीज वाले लोगों में बिना दर्द वाले हार्ट अटैक का अनुपात अधिक है। फ्रेमिंघम हार्ट स्टडी के विस्तृत विश्लेषणों ने संकेत दिया कि डायबिटीज़ स्वयं एक स्वतंत्र कार्डियोवैस्कुलर जोखिम कारक है, चाहे पारंपरिक लक्षण मौजूद हों या नहीं।

इसके अतिरिक्त, इकोकार्डियोग्राफी आधारित अध्ययनों में यह देखा गया है कि कई डायबिटिक लोगों में, भले ही उन्हें सांस की गंभीर शिकायत न हो, फिर भी लेफ्ट वेंट्रिकुलर डायस्टोलिक डिसफंक्शन प्रारंभिक अवस्था में मौजूद होती है। यह ऐसी स्थिति है, जिसमें दिल का बायां निचला कक्ष (लेफ्ट वेंट्रिकल) आराम की अवस्था (डायस्टोल) में ठीक से ढीला होकर रक्त भर नहीं पाता। यानी यह स्थिति हृदय की रक्त भरने की क्षमता को प्रभावित करती है और भविष्य में हार्ट फेल्योर का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।

यह प्रक्रिया कैसे विकसित होती है?

जब ब्लड में ग्लूकोज लगातार अधिक रहता है तो हृदय की कोशिकाओं में माइटोकॉन्ड्रियल कार्य प्रभावित होता है। पहले माइटोकॉन्ड्रिया को समझ लेते हैं- हमारी हर कोशिका के अंदर छोटे-छोटे ऊर्जा केंद्र होते हैं, जिन्हें माइटोकॉन्ड्रिया कहा जाता है। ये कोशिका के 'पावरहाउस' होते हैं। यानी भोजन और ग्लूकोज से ऊर्जा बनाकर कोशिका को काम करने की ताकत देते हैं। दिल की मांसपेशियां तो खासतौर पर माइटोकॉन्ड्रिया पर निर्भर रहती हैं क्योंकि दिल को हर सेकंड बिना रुके पंप करना होता है।

अब समस्या तब शुरू होती है, जब ब्लड में ग्लूकोज़ लंबे समय तक अधिक बना रहता है। अतिरिक्त ग्लूकोज़ कोशिकाओं के अंदर जाकर सामान्य ऊर्जा उत्पादन की प्रक्रिया को बिगाड़ देता है। इससे तीन मुख्य प्रभाव होते हैं...

पहला- ऊर्जा उत्पादन की प्रक्रिया असंतुलित हो जाती है।

दूसरा- हानिकारक फ्री रेडिकल्स (Reactive Oxygen Species) अधिक बनने लगते हैं, जिससे ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है।

तीसरा- माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना और कार्यक्षमता धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है।

जब ऐसा होता है तो दिल की कोशिकाएं पर्याप्त और संतुलित ऊर्जा नहीं बना पातीं। शुरुआत में यह परिवर्तन सूक्ष्म होता है। लेकिन समय के साथ दिल की पंपिंग क्षमता पर असर पड़ सकता है।


हाई ग्लूकोज का दिल पर असर

ऊर्जा उत्पादन की क्षमता घटती है, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है और सूजन सक्रिय रहती है। धीरे-धीरे हृदय की मांसपेशियां कठोर होने लगती हैं। यही वह चरण है, जिसे प्रारंभिक डायबिटिक कार्डियोमायोपैथी कहा जाता है और अक्सर यह बिना स्पष्ट लक्षणों के प्रगति करता है।

आधुनिक क्लिनिकल परीक्षणों ने यह भी दिखाया कि समय पर हस्तक्षेप से इस जोखिम को कम किया जा सकता है। EMPA-REG OUTCOME और DAPA-HF Trial ने यह दर्शाया कि कुछ दवाएं केवल शुगर कम नहीं करतीं बल्कि हार्ट फेल्योर के जोखिम को भी घटाती हैं। इसका अर्थ है कि यदि जोखिम को प्रारंभिक स्तर पर पहचाना जाए तो हृदय की कार्यक्षमता को सुरक्षित रखा जा सकता है।


साइलेंट हार्ट डैमेज को कैसे पहचानें?

अब प्रश्न यह है कि साइलेंट हार्ट डैमेज को पहचाना कैसे जाए? केवल लक्षणों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। नियमित HbA1c मॉनिटरिंग के साथ-साथ लिपिड प्रोफाइल, रक्तचाप की निगरानी और आवश्यकता पड़ने पर इकोकार्डियोग्राफी जैसे परीक्षण महत्वपूर्ण हो सकते हैं। कुछ अधिक जोखिम वाले व्यक्तियों में NT-proBNP जैसे बायोमार्कर भी प्रारंभिक हृदय तनाव का संकेत दे सकते हैं। विशेष रूप से वे व्यक्ति जिनमें...

लंबे समय से डायबिटीज है,

जिनका HbA1c लगातार अधिक रहता है,

जिनमें पेट की चर्बी अधिक है,

जिनमें किडनी की समस्याएं हैं

उनमें साइलेंट कार्डियक डैमेज का जोखिम अधिक माना जाता है। महिलाओं में यह जोखिम अक्सर कम आंका जाता है क्योंकि लक्षण पारंपरिक 'सीने के दर्द' की तरह स्पष्ट नहीं होते।

डायबिटीज एक लगातार चलने वाली अवस्था है। इसका प्रभाव केवल रक्त में ग्लूकोज की मात्रा तक सीमित नहीं रहता। बल्कि धीरे-धीरे रक्त वाहिकाओं, किडनी और हृदय की मांसपेशियों पर भी पड़ता है। इसलिए आधुनिक चिकित्सा केवल शुगर कंट्रोल पर नहीं बल्कि कार्डियो-मेटाबॉलिक मॉनिटरिंग पर केंद्रित है।



शुगर होने पर हार्ट हेल्थ का ध्यान कैसे रखें?

सबसे पहले जरूरी जांच की बात करें तो HbA1c की नियमित जांच अनिवार्य मानी जाती है। यूके प्रॉस्पेक्टिव डायबिटीज स्टडी में सामने आया कि HbA1c में वृद्धि के साथ कार्डियोवैस्कुलर जोखिम भी बढ़ता है। सामान्यतः हर 3 से 6 महीने में HbA1c की जांच यह संकेत देती है कि लंबे समय में ग्लाइसेमिक नियंत्रण कैसा है। यदि यह लगातार 7 प्रतिशत से ऊपर बना रहता है तो यह केवल शुगर का संकेत नहीं है। बल्कि संभावित हृदय जोखिम का भी संकेत हो सकता है।

इसके साथ ही लिपिड प्रोफाइल अत्यंत महत्वपूर्ण है। क्योंकि LDL कोलेस्ट्रॉल का बढ़ा स्तर धमनियों में प्लाक निर्माण को तेज करता है। डायबिटिक व्यक्तियों में साल में कम से कम एक बार लिपिड प्रोफाइल करवाना हृदय जोखिम आकलन का आधार माना जाता है। यदि पहले से हृदय रोग मौजूद हो तो अधिक बार जांच की आवश्यकता हो सकती है।

रक्तचाप की नियमित निगरानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। डायबिटीज़ और हाइपरटेंशन का संयोजन हार्ट फेल्योर का जोखिम कई गुना बढ़ा देता है। यदि 130/80 mmHg से ऊपर का लगातार ब्लड प्रेशर बना रहे तो हृदय पर अतिरिक्त दबाव का संकेत हो सकता है।


अब बात आती है हृदय की प्रत्यक्ष जांचों की...

यदि किसी डायबिटिक मरीज को सांस फूलने की समस्या,

असामान्य थकान

या पैरों में सूजन जैसे लक्षण हों

तो इकोकार्डियोग्राफी अत्यंत उपयोगी परीक्षण है। यह हृदय की पंपिंग क्षमता (Ejection Fraction) और डायस्टोलिक फंक्शन का आंकलन करती है। डायस्टोलिक डिसफंक्शन वही स्थिति है, जब दिल ढीला होने की अवस्था में ठीक से रिलैक्स नहीं कर पाता। यानी जब उसे रक्त भरना चाहिए, तब उसकी मांसपेशियां पर्याप्त रूप से नरम और लचीली नहीं रहतीं। कई अध्ययनों में पाया गया है कि लक्षण प्रकट होने से पहले भी डायबिटिक मरीजों में डायस्टोलिक डिसफंक्शन मौजूद हो सकता है, जो भविष्य के हार्ट फेल्योर का प्रारंभिक संकेत है।

उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों में NT-proBNP जैसे बायोमार्कर का उपयोग भी किया जा सकता है। यह रक्त परीक्षण हृदय पर बढ़ते दबाव का जैविक संकेत देता है। यदि इसका स्तर ऊंचा पाया जाए तो आगे की कार्डियक जांच की आवश्यकता होती है।

कुछ मामलों में, विशेषकर यदि छाती में अस्पष्ट असुविधा या परिश्रम पर सांस फूलने की शिकायत हो तो TMT (ट्रेडमिल टेस्ट) या स्ट्रेस इमेजिंग परीक्षण उपयोगी हो सकते हैं। डायबिटीज़ में साइलेंट इस्कीमिया की संभावना अधिक होने के कारण, केवल दर्द पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं माना जाता।

किडनी फंक्शन की जांच भी अप्रत्यक्ष रूप से हृदय जोखिम का संकेत देती है। सीरम क्रिएटिनिन और यूरिन एल्ब्यूमिन की जांच यह बताती है कि डायबिटिक नेफ्रोपैथी विकसित तो नहीं हो रही।


दिल और किडनी का कनेक्शन क्या है?

दिल और किडनी दोनों मिलकर शरीर में रक्त प्रवाह और द्रव संतुलन को नियंत्रित करते हैं। दिल का काम है रक्त को पंप करके पूरे शरीर (जिसमें किडनी भी शामिल है) तक पहुंचाना। और किडनी का काम है उस रक्त को छानना, अतिरिक्त पानी और अपशिष्ट पदार्थ बाहर निकालना, साथ ही नमक-पानी का संतुलन बनाए रखना।

अगर दिल कमजोर हो जाए और ठीक से रक्त पंप न कर पाए तो किडनी तक पर्याप्त रक्त नहीं पहुंचेगा। जब किडनी को कम रक्त मिलता है तो वह आपात स्थिति समझकर शरीर में नमक और पानी रोकने लगती है। ताकि रक्तचाप बना रहे। लेकिन इससे शरीर में सूजन बढ़ती है और दिल पर अधिक दबाव पड़ता है। यानी दिल की कमजोरी किडनी को प्रभावित करती है और किडनी की प्रतिक्रिया फिर दिल पर अतिरिक्त बोझ डाल देती है।

इसका ठीक उल्टा होना भी सच है। अगर किडनी ठीक से काम न करे तो शरीर में अतिरिक्त द्रव और विषैले पदार्थ जमा होने लगते हैं। रक्तचाप बढ़ सकता है। उच्च रक्तचाप दिल की मांसपेशियों को मोटा और कठोर बना सकता है, जिससे हार्ट फेल्योर का जोखिम बढ़ता है।

इसके अलावा, दोनों अंग एक ही हार्मोनल प्रणाली से जुड़े हैं, जिसे रेनिन-एंजियोटेंसिन-एल्डोस्टेरोन प्रणाली कहा जाता है। यह प्रणाली रक्तचाप और द्रव संतुलन नियंत्रित करती है। किडनी में गड़बड़ी होने पर यह प्रणाली अधिक सक्रिय हो सकती है, जिससे रक्तचाप और हृदय पर दबाव बढ़ जाता है।

दिल और किडनी एक टीम की तरह काम करते हैं। अगर टीम का एक सदस्य कमजोर हो जाए तो दूसरे पर अतिरिक्त बोझ आ जाता है। यही कारण है कि किडनी और हृदय की बीमारियां अक्सर साथ-साथ देखी जाती हैं।


डिसक्लेमर- यह आर्टिकल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी सलाह को अपनाने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें।

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