मशहूर शायर बशीर बद्र का निधन, मखमली शायरी के जादुई युग का हुआ अंत
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मशहूर शायर बशीर बद्र का निधन, मखमली शायरी के जादुई युग का हुआ अंत

उर्दू अदब के मशहूर शायर बशीर बद्र का निधन, अमरोहा के मुशायरे से लेकर मेरठ दंगों के दर्द और अल्जाइमर से जंग तक, शांत हो गई आम आदमी की धड़कन बनी जुबान।


Bashir Badr's Demise: उर्दू गजल को आम आदमी की धड़कन बनाने वाले मशहूर शायर बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन से अदब की दुनिया में शोक की लहर दौड़ गई है। उन्होंने शायरी को भारी-भरकम शब्दों से बाहर निकालकर आम बोलचाल की भाषा दी थी। बशीर साहब का जाना उर्दू गजल के उस स्वर्ण युग का खामोश हो जाना है, जिसने पूरी दुनिया को मोहब्बत और बिछड़ने का मखमली मिजाज सिखाया था।


अमरोहा के मुशायरे की वो ऐतिहासिक रात
शायरी की दुनिया में उनकी मकबूलियत का अंदाजा साल 1994 के एक वाक्ये से लगाया जा सकता है। सर्दियों के दिनों में कमाल अमरोही के शहर अमरोहा में एक बड़ा मुशायरा हो रहा था। देश के कई नामचीन फनकार वहां जुटे थे। किसी वजह से बशीर साहब को मंच पर पहुंचने में थोड़ी देर हो गई। सामने बैठी बेताब भीड़ इस देरी पर जमकर शोर-शराबा करने लगी।

दो मिसरों से हुड़दंग को अनुशासन में बदला
आयोजक बेहद परेशान थे कि तभी बुजुर्ग शायर बशीर बद्र ने मंच संभाला। उन्होंने माइक संभालते ही अपनी गज़ल के कुछ मिसरे पढ़े। 'कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही कोई बेवफ़ा नहीं होता।' उनकी आवाज़ का जादू और अंदाज़ कुछ ऐसा था कि पल भर में पूरा शामियाना गूंज उठा। शोर मचाती भीड़ पल भर में सलीके से बैठ गई और हुड़दंग अनुशासन में बदल गया।

अलीगढ़ से शुरू हुई थी मखमली बगावत
बशीर बद्र का सफर साल 1965 के आस-पास शुरू हुआ था। वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कैंपस में प्रोफ़ेसर के रूप में आए थे। उस दौर में उर्दू अदब पर पारंपरिक और रूढ़िवादी सोच का कड़ा पहरा था। ऐसे माहौल में बशीर साहब ने कहा था कि शायरी को महलों की दासी बनने के बजाय उस आम आदमी की जुबान बनना होगा, जो सुबह लोकल ट्रेन पकड़कर दफ्तर जाता है।

रूढ़िवादी गलियारों को दिया करारा जवाब
पारंपरिक विचार के लोगों ने इसे उर्दू की तहजीब हल्की करने वाली बात माना था। लेकिन बशीर साहब अपनी बात पर पूरी तरह अडिग रहे। उन्होंने अपनी पीएचडी की थिसिस लिखकर एक नई बात साबित की। उन्होंने दुनिया को बताया कि उर्दू शायरी को अगर लंबी उम्र जीनी है तो बदलाव जरूरी है। इसके लिए शायरी को आम बोलचाल की हिंदुस्तानी भाषा को अपनाना ही होगा।

मेरठ के भीषण दंगों का वह गहरा जख्म
बशीर साहब सिर्फ एक उम्दा शायर ही नहीं थे, बल्कि वे इतिहास को सहेजने वाले इंसान थे। मेरठ में उनके घर में मीर और गालिब के दौर की दुर्लभ पांडुलिपियां थीं। सबसे बड़ा नुकसान यह था कि उनकी खुद की सैकड़ों गजलें वहां थीं, जो कभी छपी ही नहीं थीं। साल 1987 में मेरठ में हुए भीषण दंगों के दौरान दंगाइयों ने उनका आशियाना जला दिया।

राख के ढेर से उपजी दार्शनिक सोच
इस हादसे में बशीर साहब परिवार के साथ सिर्फ अपनी जान बचाकर भाग पाए थे। जब वे लौटे तो वहां सिर्फ काली राख बची थी। कहते हैं कि वे घंटों उस मलबे के सामने चुपचाप बैठे रहे। उनका मशहूर शेर 'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में' इसी हादसे की उपज था। इस सदमे के बाद उन्होंने यूपी छोड़ दिया और भोपाल चले गए।

डायरी और चिट्ठी को गजल में दी जगह
बशीर साहब ने गजल में उन चीजों को एंट्री दी जिसकी कल्पना पुराने पारखी नहीं करते थे। उन्होंने गजल में डायरी, चिट्ठी, ट्रेन की खिड़की और छतरी को जगह दी। वे मानते थे कि कोई आम इंसान प्रेमिका को खत लिखते समय भारी शब्द नहीं सोचेगा। वह बस उदास होगा। बशीर साहब ने इंसानी रिश्तों के उस बारीक मनोविज्ञान को पकड़ा जिसे लोग अक्सर छोड़ देते थे।

आखिरी दिनों में अल्जाइमर का क्रूर मजाक
जिस शख्स ने दुनिया को यादों को सहेजने का फलसफा दिया, समय ने सबसे पहले उसकी यादें ही छीन लीं। भोपाल में रहते हुए बशीर साहब अल्जाइमर (भूलने की बीमारी) के उस मुकाम पर पहुंच गए थे, जहां वे अपनी पत्नी अलका बद्र को भी नहीं पहचान पाते थे। आखिरी दिनों में जब कोई उनका ही पुराना शेर पढ़ता, तो वे बच्चों की तरह ताली बजाकर पूछते थे कि यह उम्दा शेर किसने लिखा है।


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