
तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन को 'मान बहादुर सिंह लहक सम्मान 2026
भारतीय भाषा एकता मंच ने साहित्यकार मुरुगन को किया सम्मानित; ग्रामीण जनजीवन और सामाजिक ताने-बाने को अपनी कृतियों में बखूबी उकेरने के लिए मिला यह बड़ा पुरस्कार।
Man Bahadur Singh Lahak Samman 2026: प्रसिद्ध तमिल लेखक, विद्वान और साहित्यिक इतिहासकार पेरुमल मुरुगन को वर्ष 2026 के प्रतिष्ठित 'मान बहादुर सिंह लहक सम्मान' से नवाजा गया है. यह सम्मान उन्हें 'भारतीय भाषा एकता मंच' (ILUF) के संयुक्त तत्वावधान में प्रदान किया गया है. पेरुमल मुरुगन को समकालीन तमिल साहित्य की सबसे मजबूत और प्रभावशाली आवाजों में से एक माना जाता है. उनकी रचनाएं ग्रामीण तमिलनाडु के रहन-सहन, संस्कृति, जातिगत समीकरणों, सामाजिक दबावों और मानवीय संवेदनाओं को बेहद जीवंत और बेबाक तरीके से दुनिया के सामने रखती हैं.
सिनेमा थिएटर में सोडा बेचने वाले के घर हुआ था जन्म; ऐसा रहा प्रोफेसर मुरुगन का सफर
एक बेहद साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने वाले पेरुमल मुरुगन का जीवन और शैक्षणिक सफर बेहद प्रेरणादायक रहा है:
शुरुआती जीवन: मुरुगन का जन्म 15 अक्टूबर 1966 को तमिलनाडु के नामक्कल जिले में तिरुचेंगोडु के पास एक छोटे से किसान परिवार में हुआ था. उनके पिता एक किसान थे, जो अपनी आजीविका चलाने के लिए एक सिनेमा थिएटर में सोडे की दुकान भी चलाते थे.
उच्च शिक्षा और रिसर्च: उन्होंने इरोड से तमिल साहित्य में स्नातक और कोयंबटूर से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से एम.फिल. और पीएच.डी. की डिग्री हासिल की. उनका डॉक्टरेट शोध प्रसिद्ध लेखक आर. शणमुगासुंदरम पर केंद्रित था.
अध्यापन और लोक संस्कृति की खोज: मुरुगन ने नामक्कल, अत्तूर और चेन्नई के सरकारी कॉलेजों में तमिल साहित्य के प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं. उन्होंने कोंगू नाडु क्षेत्र की लोक संस्कृति, मुहावरों, लोककथाओं और शास्त्रीय तमिल ग्रंथों पर व्यापक शोध किया है.
12 उपन्यास, 6 कहानी संग्रह; अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों की लिस्ट में दर्ज है नाम
पेरुमल मुरुगन का साहित्यिक करियर बेहद समृद्ध रहा है। उन्होंने अब तक 12 उपन्यास, 6 लघु कहानी संग्रह, 6 कविता संग्रह और कई गैर-काल्पनिक (Non-fiction) विधाओं में किताबें लिखी हैं.
उनके प्रमुख उपन्यास और वैश्विक सम्मान:
चर्चित उपन्यास: उनके प्रमुख उपन्यासों में 'हरू वैयिल' (1991), 'निज़ल मुत्रम' (1993), 'कूलामादारी' (सीजन्स ऑफ द पाम - 2000), 'कंगनम' (2008), 'माधोरूभागन' (वन पार्ट वुमन - 2010), 'पूनची' (द स्टोरी ऑफ अ ब्लैक गोट - 2017), 'पुक्कुझी' (पायर - 2018) और 'कज़हीमुगम' (एस्तेयुरी) शामिल हैं.
पुरस्कारों की लंबी फेहरिस्त: उन्हें 2015 में 'आईएलएफ समन्यव भाषा सम्मान' और 2016 में 'साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार' से सम्मानित किया जा चुका है. इसके अलावा वे 'किरियामा प्राइज शॉर्टलिस्ट' (2005), 'नेशनल बुक अवार्ड लॉन्गलिस्ट' और 'इंटरनेशनल बुकर प्राइज लॉन्गलिस्ट' (2023) में अपनी जगह बना चुके हैं, जबकि 2023 में उन्होंने 'जेसीबी प्राइज फॉर लिटरेचर' भी जीता था.
विवादों से घिरे, की थी लेखन से संन्यास की घोषणा; हाई कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से की वापसी
मुरुगन का साहित्यिक सफर चुनौतियों से अछूता नहीं रहा है। साल 2014-15 में उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'माधोरूभागन' (One Part Woman) को लेकर कुछ रूढ़िवादी संगठनों द्वारा भारी विरोध प्रदर्शन किया गया था. इस विवाद से आहत होकर मुरुगन ने सोशल मीडिया पर बेहद भावुक पोस्ट लिखकर अपनी साहित्यिक मृत्यु और लेखन से हमेशा के लिए संन्यास लेने की घोषणा कर दी थी.
हालांकि, साल 2016 में मद्रास हाई कोर्ट ने अभिव्यक्ति की आज़ादी को सर्वोपरि रखते हुए उनके लिखने के अधिकार का ऐतिहासिक समर्थन किया. इस अदालती फैसले के बाद उन्होंने दोबारा कलम उठाई और अपने पाठकों के बीच लौटे.
मोहन वर्मा ने किया हिंदी में अनुवाद; उत्तर भारत के पाठकों में भी बढ़ी लोकप्रियता
मुरुगन की तमिल रचनाओं को हिंदी पट्टी के पाठकों तक पहुंचाने में अनुवादक मोहन वर्मा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. उनके द्वारा हिंदी में अनुवादित की गई प्रमुख कृतियां इस प्रकार हैं:
नर-नारीश्वर (माधोरूभागन का अनुवाद)
पोन्ना की अग्निपरीक्षा
पोन्ना का अभिशाप
छोटू और उसकी दुनिया (कूलामादारी का अनुवाद)
एक कापुरुष के गीत
वर्तमान में पेरुमल मुरुगन तमिलनाडु में रहते हैं और अध्यापन कार्य के साथ-साथ लगातार अपनी लेखनी से भारतीय साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं.
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