रामपुर जेल में अखिलेश-आजम की मुलाकात, 1 घंटे तक दोनों के बीच क्या हुई बात?
रामपुर जेल में अखिलेश यादव और सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान के बीच हुई एक घंटे लंबी मुलाकात पर विस्तृत चर्चा की। यह बैठक 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। क्या है इस मुलाकात के मायने चलिए जानते हैं?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर रामपुर केंद्र बिंदु बन गया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव रामपुर जेल पहुंचे और वहां बंद पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल आजम खान से मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच करीब एक घंटे तक बंद कमरे में बातचीत हुई।
जेल से बाहर आने के बाद जब मीडिया ने अखिलेश यादव से सवाल पूछे, तो उन्होंने बेहद आक्रामक अंदाज में कहा— "आदरणीय आजम खान साहब से मिलकर आ रहा हूं। आजम थे, आजम हैं, और आजम रहेंगे। किसी भी राजनीतिक परिवार पर इतना अन्याय नहीं हुआ होगा जितना आजम साहब के परिवार पर हुआ है।" अखिलेश यादव ने स्पष्ट किया कि आजम खान ने चुनाव लड़ने के लिए कोई सीट नहीं मांगी है, बल्कि पार्टी को मजबूत करने के लिए अहम सुझाव दिए हैं।
2027 के चुनावों और मुस्लिम वोट बैंक पर नजर
'द फेडरल देश' के खास कार्यक्रम में एंकर नीलू व्यास ने वरिष्ठ पत्रकारों और विशेषज्ञों के साथ इस मुलाकात के राजनीतिक निहितार्थों का बारीकी से विश्लेषण किया। विशेषज्ञों के अनुसार, इस मुलाकात के मुख्य रूप से तीन बड़े आयाम हैं:
1. 2027 विधानसभा चुनाव का गणित: यूपी में 2027 के चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। समाजवादी पार्टी को बखूबी अहसास है कि राज्य में अपनी सरकार बनाने या बीजेपी को सीधी टक्कर देने के लिए उसे अपने कोर 'एम-वाई' (मुस्लिम-यादव) और पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) वोट बैंक को हर हाल में एकजुट रखना होगा।
2. ओवैसी के हमलों का जवाब: हाल ही में एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने रामपुर में रैली कर अखिलेश यादव पर सीधे हमले बोले थे। ओवैसी ने आरोप लगाया था कि सपा ने संकट के समय आजम खान और उनके परिवार की अनदेखी की। अखिलेश की इस जेल यात्रा को ओवैसी के नैरेटिव को काटने के रूप में देखा जा रहा है।
3. अंदरूनी मतभेद और गिले-शिकवे दूर करना: आजम खान लंबे समय से जेल में हैं और उनके समर्थकों में यह भावना पनप रही थी कि सपा नेतृत्व उनके लिए सड़कों पर उस तरह नहीं उतरा जैसा उतरना चाहिए था। अखिलेश यादव ने रामपुर पहुंचकर संदेश दिया कि सपा नेतृत्व आजम खान के साथ पूरी ताकत से खड़ा है।
पश्चिमी यूपी का समीकरण और आजम खान का राजनीतिक कद
वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरोन और सुमन गुप्ता का मानना है कि आजम खान भले ही जेल में हों, लेकिन रामपुर, मुरादाबाद, बरेली, बिजनौर और आसपास के जिलों में आज भी उनका राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाताओं के बीच आजम खान की एक खास पहचान रही है। जब भी चुनाव आते हैं, प्रत्याशियों के चयन और टिकट वितरण में आजम खान की राय काफी मायने रखती है। रामपुर सदर, स्वार और कुंदरकी जैसी सीटों पर हुए उपचुनावों में भले ही बीजेपी ने सेंध लगाई हो, लेकिन मुख्य चुनाव में स्थानीय समीकरण काफी बदल जाते हैं। माना जा रहा है कि इस मुलाकात में आजम खान के बेटे अदीब और परिवार के अन्य सदस्यों के राजनीतिक भविष्य और टिकट बंटवारे पर भी अनौपचारिक चर्चा हुई है।
कानूनी दांव-पेंच और बीजेपी का हमला
अखिलेश यादव ने मीडिया से बात करते हुए राज्य की बीजेपी सरकार पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि आजम खान और उनके परिवार पर दर्जनों फर्जी मुकदमे दर्ज किए गए। विश्वविद्यालय (जौहर यूनिवर्सिटी) के निर्माण से लेकर बकरी चोरी और छोटे-मोटे मामलों तक में उन्हें उलझाकर रखा गया, जो पूरी तरह से राजनीतिक प्रतिशोध की भावना को दर्शाता है।
दूसरी तरफ, बीजेपी का तर्क है कि आजम खान पर लगे मुकदमे अदालत और कानूनी प्रक्रियाओं का हिस्सा हैं और कानून सबके लिए बराबर है। बीजेपी इस मुलाकात को 'अपराधियों और भ्रष्टाचारियों को संरक्षण' देने के पुराने ढर्रे के रूप में प्रचारित करने की कोशिश कर रही है।
क्या कारगर होगी अखिलेश की यह पहल?
हाईकोर्ट के अधिवक्ता और राजनीतिक विश्लेषक राजवेंद्र सिंह का कहना है कि सिर्फ जेल में मुलाकात कर लेने से या सलाह ले लेने से चुनाव नहीं जीते जा सकते। सत्तारूढ़ पार्टी की पूरी मशीनरी और पोलराइजेशन की राजनीति का मुकाबला करने के लिए सपा को धरातल पर मजबूत कैडर तैयार करना होगा। इसके अलावा, पोलिंग के दिन मुस्लिम मतदाताओं को बिना किसी बाधा के बूथों तक पहुंचाना और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित कराना भी सपा के लिए बड़ी चुनौती होगी।
अखिलेश यादव और आजम खान की यह रामपुर जेल मुलाकात केवल एक औपचारिक हाल-चाल नहीं थी, बल्कि यह उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के लिए बिछाई जा रही बिसात की एक महत्वपूर्ण चाल थी। अखिलेश यादव ने यह साबित करने की कोशिश की है कि सपा अपने पुराने सहयोगियों को भूली नहीं है। अब देखना यह होगा कि क्या यह मुलाकात सपा के पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक में भरोसा वापस बहाल कर पाती है या ओवैसी और बीजेपी मिलकर इस समीकरण को साधने में कामयाब रहते हैं।

