BRICS में पुतिन की जीत, क्या ग्लोबल साउथ का भरोसा खो चुका है भारत?
दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन। शो 'निष्पक्ष' में जानिए कैसे पुतिन की हुई कूटनीतिक जीत, अमेरिका का घटा दबदबा और इज़राइल के कारण भारत पर ICC केस का गंभीर खतरा।
Nishpaksh: पश्चिम एशिया में सुलगते युद्ध और वैश्विक कूटनीति के बदलते ध्रुवों के बीच नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन का आयोजन हो रहा है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की दिल्ली में मौजूदगी ने पूरी दुनिया को यह साफ संदेश दे दिया है कि ग्लोबल साउथ अब अमेरिका के इशारों पर नाचने को तैयार नहीं है। लेकिन इस कूटनीतिक जमावड़े के बीच भारत कहां खड़ा है?
'द फ़ेडरल देश' के शो 'निष्पक्ष' में एंकर नीलू व्यास और अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रखर विश्लेषक फिरोज़ ने ब्रिक्स के बंद कमरों में चल रही कूटनीति, भारत की विदेश नीति के गहरे संकट, अमेरिका की खोखली होती सामरिक ताकत और इज़राइल प्रेम के कारण भारत पर मंडरा रहे अंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल कोर्ट (ICC) के बड़े खतरे का परत-दर-परत और विस्तार से विश्लेषण किया है।
1. यूक्रेन का गायब होना: पुतिन की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत
ब्रिक्स सम्मेलन और इससे ठीक पहले हुए शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के संयुक्त बयानों (Joint Statements) से 'यूक्रेन युद्ध' का ज़िक्र पूरी तरह से गायब होना कोई संयोग नहीं है। विशेषज्ञ फिरोज़ के अनुसार, यह व्लादिमीर पुतिन के लिए एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक कूटनीतिक जीत है।
अमेरिका, नाटो (NATO) और पश्चिमी देशों ने रूस और ईरान की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने के लिए प्रतिबंधों (Sanctions) की पूरी ताकत झोंक दी थी। इसके बावजूद आज रूस मज़बूती से खड़ा है और ईरान पिछले 47 सालों के प्रतिबंधों को धता बताते हुए अमेरिका को सामरिक मोर्चों पर मात दे रहा है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) और यमन में हूतियों के सामने अमेरिका की जो फजीहत हुई है, उसने साबित कर दिया है कि अमेरिका अब एक 'लॉस्ट फोर्स' (Spent Force) या चुका हुआ मोहरा बन गया है। ऐसे में दिल्ली आकर पुतिन और शी जिनपिंग का डंके की चोट पर कूटनीतिक जीत का जश्न मनाना, ग्लोबल साउथ के नेतृत्व में आए ऐतिहासिक बदलाव का सीधा प्रमाण है।
2. क्या ग्लोबल साउथ का विश्वास वापस जीत पाएगा भारत?
शो 'निष्पक्ष' में भारत की मौजूदा विदेश नीति को लेकर सबसे गंभीर सवाल उठाए गए। एक दौर था जब भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) का निर्विवाद नेता था, लेकिन आज ब्रिक्स देशों और ग्लोबल साउथ को भारत पर भरोसा नहीं रहा।
इसका सबसे बड़ा कारण मोदी सरकार का अमेरिका और इज़राइल की तरफ अत्यधिक झुकाव है। जब ईरान गहरे युद्ध संकट में था, तब भारत ने अपने इस सबसे पुराने और रणनीतिक सहयोगी को किनारे कर दिया। यह वही ईरान है जिसने मनमोहन सिंह सरकार के दौरान अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भारत को कच्चा तेल दिया था, भले ही 2 बिलियन डॉलर का भुगतान अटका पड़ा था। लेकिन आज भारत की विदेश नीति 'इस्लामोफोबिक' मानसिकता और घोर दक्षिणपंथी विचारधारा (Extreme Right-wing) से प्रेरित नज़र आती है। फिरोज़ ने साफ कहा कि भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) खो दी है और आज ग्लोबल साउथ के देश भारत को अमेरिकी खेमे के एक 'संदिग्ध' साथी के रूप में देखते हैं। खोया हुआ यह भरोसा सिर्फ बयानों से नहीं, बल्कि ज़मीनी एक्शन से वापस आएगा।
3. इज़राइल को हथियारों की सप्लाई और ICC (अंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल कोर्ट) का आत्मघाती खतरा
विश्लेषण का सबसे खौफनाक और चौंकाने वाला हिस्सा गाज़ा युद्ध में भारत की भूमिका को लेकर था। भारत आज इज़राइल जैसे उस देश के साथ खड़ा है जो दुनिया का 'नंबर वन हेटेड कंट्री' (सबसे ज़्यादा नफरत किया जाने वाला देश) बन चुका है। अमेरिका खुद इज़राइल के कारण वैश्विक स्तर पर अलग-थलग पड़ रहा है।
'निष्पक्ष' में चेतावनी दी गई कि मोदी सरकार द्वारा गाज़ा में इस्तेमाल के लिए इज़राइल को घातक हथियारों की सप्लाई करना भारत के लिए आत्मघाती कदम साबित हो सकता है। निकारागुआ पहले ही जर्मनी के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल कोर्ट (ICC) में 'नरसंहार में मदद' (Complicity in Genocide) का केस दर्ज करा चुका है। एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International) की 40 पन्नों की रिपोर्ट के आधार पर यदि कल कोई देश भारत के खिलाफ ICC में मुकदमा ठोक देता है, तो 'मदर ऑफ डेमोक्रेसी' (Mother of Democracy) का दावा करने वाले भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पूरी तरह से मिट्टी में मिल जाएगी। क्या 90 लाख की आबादी वाले एक ऐसे देश के लिए भारत अपना पूरा कूटनीतिक इतिहास दांव पर लगा सकता है, जो खुद अमेरिका के रहमोकरम और लूटे हुए पैसों पर चल रहा है?
4. ट्रम्प के 100% टैरिफ की धमकी और 'दब्बू' कूटनीति
ब्रिक्स का सबसे अहम एजेंडा 'डीडॉलराइजेशन' (De-dollarization) और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार (Trade in National Currencies) है। डॉलर की बादशाहत खत्म होती देख अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने धमकी दी है कि जो भी देश डॉलर छोड़ेगा, उस पर 100% टैरिफ लगाया जाएगा।
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ब्राज़ील के राष्ट्रपति लूला डी सिल्वा ने इस धमकी का दो टूक जवाब देते हुए कहा है, "तुम्हें जो करना है कर लो।" लेकिन सवाल यह है कि क्या भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर या मोदी सरकार के कैबिनेट में इतनी हिम्मत है कि वे अमेरिका की आंखों में आंखें डालकर जवाब दे सकें?
फिरोज़ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत को अमेरिका के महंगे हथियारों, महंगी तकनीक या महंगे तेल की रत्ती भर भी ज़रूरत नहीं है। अमेरिका के हथियार मिडिल ईस्ट में बुरी तरह फेल साबित हुए हैं। अगर भारत को अपनी अर्थव्यवस्था बचानी है, तो उसे अमेरिका के सामने गिड़गिड़ाने के बजाय रूस, चीन और ईरान के साथ अपनी स्थानीय मुद्रा (रुपये) में व्यापार को मज़बूत करना होगा।
5. शिक्षा पर शून्य निवेश और उद्योगपतियों पर मेहरबानी का ज़मीनी सच
अमेरिका के 'एक्सपेंसिव मैन्युफैक्चरिंग' का मोह छोड़कर भारत को अपने घरेलू ढांचे पर ध्यान देने की सख्त ज़रूरत है। चीन आज इसलिए ताकतवर है क्योंकि उसने अपने देश में 1000 से ज़्यादा नई और उच्च गुणवत्ता वाली यूनिवर्सिटीज़ बनाई हैं और बच्चों के मिड-डे मील से लेकर एजुकेशन पर भारी निवेश किया है।
दूसरी तरफ भारत का हाल यह है कि सरकार शिक्षा पर जीडीपी का 6 से 6.5% खर्च करने को तैयार नहीं है। स्कूल बदहाल हैं और आज भी देश उन्हीं गिने-चुने IITs और संस्थानों के दम पर चल रहा है जो नेहरू युग में बने थे। मोदी सरकार के पास शिक्षा के लिए पैसा नहीं है, लेकिन देश के चंद उद्योगपतियों (जैसे सुभाष चंद्रा और अनिल अंबानी) का 22,000 करोड़ से लेकर 45,000 करोड़ रुपये का कर्ज़ माफ करने के लिए खज़ाने के दरवाज़े हमेशा खुले रहते हैं। असली विकास विदेशी हथियारों से नहीं, देश के नौजवानों, किसानों और मज़दूरों पर पैसा खर्च करने से आएगा।
6. चाबहार पोर्ट में चीन की एंट्री और भारत की सुस्ती
व्यापार और कनेक्टिविटी के मोर्चे पर भी भारत पिछड़ रहा है। इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC), जो मुंबई से ईरान के चाबहार होते हुए रूस के सेंट पीटर्सबर्ग तक जाता है, वह प्रोजेक्ट भारत की सुस्ती के कारण अधर में लटका है।
भारत के पीछे हटने का सीधा फायदा चीन को हुआ है। चीन अब पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के साथ-साथ ईरान के चाबहार में भी अपनी जड़ें जमा रहा है। ब्रिक्स में चीन के साथ संबंधों को 'रीसेट' (Reset) करने की जो बात हो रही है, वह भारत के लिए एक बड़ा मौका है। यदि भारत और चीन के रिश्ते सुधरते हैं, तो पुतिन और पेजेश्कियान की मध्यस्थता में भारत-पाकिस्तान के बीच भी बातचीत का रास्ता खुल सकता है, जो पूरे दक्षिण एशिया में शांति के लिए एक 'विन-विन' (Win-win) सिचुएशन होगी।
7. 'गवर्नेंस रिफॉर्म' का खोखलापन और घरेलू संस्थाओं का पतन
ब्रिक्स सम्मेलन में पीएम मोदी ने '12-पॉइंट ग्लोबल गवर्नेंस रिफॉर्म' का जो एजेंडा पेश किया, उसे विश्लेषकों ने सिरे से खारिज कर दिया। जिस देश के भीतर लोकतांत्रिक संस्थाओं का पूरी तरह से कबाड़ा हो चुका हो, वह दुनिया को गवर्नेंस का पाठ कैसे पढ़ा सकता है?
आज देश के चुनाव आयोग (Election Commission) पर किसी को भरोसा नहीं है; चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और सुप्रीम कोर्ट की स्वायत्तता सरकार के चंगुल में फंसी नज़र आती है। मुख्यधारा की मीडिया जिसे आज पूरी दुनिया 'गोदी मीडिया' (Godi Media) के नाम से जानती है, वह पूरी तरह से कोलैप्स (Collapse) हो चुकी है। ऐसे भयावह दौर में अगर भारत का लोकतंत्र बचा है, तो सिर्फ और सिर्फ सोशल मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारों (Independent Media) के दम पर, जिन्होंने गालियां, धमकियां और ट्रोलिंग सहकर भी सच को ज़िंदा रखा है।
इसके अलावा, अमेरिकी राजदूत (सर्जियो गोर) और अन्य विदेशी राजनयिकों का देश के सबसे संवेदनशील इलाकों (जैसे मणिपुर और नॉर्थ-ईस्ट) में बेरोकटोक घूमना भी भारत की संप्रभुता पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है।
'निष्पक्ष' शो का सार यही है कि ब्रिक्स का यह सफल आयोजन मोदी सरकार का सिर्फ एक 'इवेंट मैनेजमेंट' है। भारत की विदेश नीति को अगर अमेरिका की चापलूसी और 'हगिंग डिप्लोमेसी' (गले लगने की नीति) से बाहर आना है, तो उसे दोबारा नेहरू युग की उस स्वतंत्र और कद्दावर विदेश नीति (Strategic Autonomy) की तरफ लौटना होगा, जिसने आज़ादी के बाद से दुनिया भर में भारत का मान बढ़ाया था। राहुल गांधी और विपक्ष द्वारा बनाए जा रहे लगातार दबाव के कारण ही सही, लेकिन सरकार को यह 'कोर्स करेक्शन' (Course Correction) करना ही पड़ेगा, वरना ग्लोबल साउथ और ब्रिक्स में भारत सिर्फ एक दर्शक बनकर रह जाएगा।
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