वांगचुक का अनशन: शिक्षा संकट पर घिरी मोदी सरकार, कांग्रेस बैकफुट पर क्यों?
जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक के अनशन का 5वां दिन; 'निष्पक्ष' में बोले विशेषज्ञ- जब तक छोटे शहरों के दलित-ओबीसी छात्र नहीं जुड़ेंगे, आंदोलन का टिकना होगा मुश्किल.
Nishpaksh: दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का विरोध प्रदर्शन जारी है, जिसे अब मशहूर क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक के अनशन से एक नया मोमेंटम (गति) मिला है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और देश की शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलावों की मांग को लेकर सोनम वांगचुक के अनशन का आज पांचवां दिन है। इस आंदोलन और इसके व्यापक राजनीतिक निहितार्थों को लेकर डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के लोकप्रिय शो 'निष्पक्ष' में सीनियर जर्नलिस्ट नीलू व्यास ने जेएनयू (JNU) के प्रोफेसर अजय गुडावर्ती और वरिष्ठ पत्रकार टी.के. राजलक्ष्मी के साथ एक बेहद गंभीर और विश्लेषणात्मक चर्चा की।
चर्चा के दौरान यह बात सामने आई कि CJP के फाउंडर अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर सोनम वांगचुक के गिरते स्वास्थ्य (लो ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल) को लेकर गहरी चिंता जताई है और साफ कहा है कि यदि उनकी स्थिति बिगड़ती है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी केंद्र सरकार की होगी।
'एजुकेशन' अब बना बड़ा राजनीतिक मुद्दा; बैकफुट पर कांग्रेस?
शो 'निष्पक्ष' में बातचीत करते हुए वरिष्ठ पत्रकार टी.के. राजलक्ष्मी ने इस बात को रेखांकित किया कि अब सभी राजनीतिक दलों को यह अहसास हो चुका है कि वे देश के युवाओं और उनके मुद्दों को ज्यादा समय तक नजरअंदाज नहीं कर सकते। उन्होंने बताया कि वामपंथी दलों (CPI-M और CPI-ML) और उनके छात्र संगठनों ने इस आंदोलन को शुरू से ही बहुत मजबूती और सक्रियता के साथ अपना समर्थन दिया है।
हालांकि, इस चर्चा में एक बेहद दिलचस्प पहलू यह भी सामने आया कि देश की मुख्य विपक्षी पार्टी 'कांग्रेस' इस पूरे मामले में कहीं न कहीं असमंजस या बैकफुट पर दिखाई दे रही है। राजलक्ष्मी के अनुसार, हालांकि राहुल गांधी 'छात्रों की गूंज' जैसे कार्यक्रमों के जरिए युवाओं से जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस इस जंतर-मंतर के आंदोलन को पूरी तरह और खुलकर सपोर्ट करने से बच रही है। इसके पीछे का मुख्य कारण यह माना जा रहा है कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में निजीकरण (Privatization) और जो कमियां हैं, उनकी जड़ें साल 2014 से पहले के दौर (कांग्रेस शासनकाल) से भी जुड़ी हुई हैं। ऐसे में कांग्रेस के लिए इस मुद्दे पर बहुत ज्यादा आक्रामक होना रणनीतिक रूप से कठिन हो रहा है।
प्रोफेसर अजय गुडावर्ती का बड़ा सवाल: क्या यह केवल 'मेट्रोपॉलिटन' आंदोलन बनकर रह जाएगा?
आंदोलन के भविष्य और उसकी दिशा को लेकर जेएनयू के प्रोफेसर अजय गुडावर्ती ने शो 'निष्पक्ष' में कई बेहद तीखे और गहरे सवाल उठाए। प्रोफेसर गुडावर्ती का मानना है कि आज के दौर में किसी भी बड़े जन-आंदोलन को खड़ा करना और उसे लंबे समय तक बनाए रखना बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया है, क्योंकि लोक-लुभावन (Populist) सरकारें खुद आंदोलनों के प्रतीकों को अपना लेती हैं।
प्रोफेसर गुडावर्ती ने आंदोलन के सामाजिक चरित्र (Social Character) पर सवाल उठाते हुए कहा:
"वर्तमान में यह आंदोलन मुख्य रूप से अर्बन (शहरी), अपर-क्लास और मिडिल-क्लास तक ही सीमित दिखाई दे रहा है। जबकि शिक्षा का सबसे बड़ा संकट और 'एग्जाम लीक' का सबसे बुरा असर टियर-2 और टियर-3 शहरों, छोटे कस्बों और पहली पीढ़ी के शिक्षार्थियों (दलित और ओबीसी समुदाय के छात्रों) पर पड़ता है। जब तक यह आंदोलन उन तक नहीं पहुंचेगा, तब तक इसकी व्यापक सफलता संदिग्ध रहेगी।"
उन्होंने किसान आंदोलन (Farmers Protest) और सीएए-विरोधी आंदोलनों (Anti-CAA Protest) का उदाहरण देते हुए कहा कि वे आंदोलन इसलिए लंबे चले और सफल रहे क्योंकि वे दिल्ली की सीमाओं से निकलकर देश के छोटे-छोटे कस्बों और आम जनता की चेतना से जुड़ गए थे। लेकिन इस छात्र आंदोलन में फिलहाल वह व्यापक जन-आधार (Mass Base) गायब दिख रहा है।
सरकार की 'क्लोज वॉच' और आंदोलन के सामने भविष्य की चुनौती
शो 'निष्पक्ष' में यह भी उजागर किया गया कि सरकार इस पूरे आंदोलन पर बेहद बारीक और कड़ी नजर रख रही है। सीआईडी (CID) और खुफिया तंत्र की रिपोर्ट्स लगातार सरकार के पास जा रही हैं। कयास यह भी लगाए जा रहे हैं कि यदि यह आंदोलन दिल्ली के बाहर फैलने लगा, तो सरकार इसे किसी न किसी बहाने या सोनम वांगचुक को जबरन अस्पताल भेजकर डिफ्यूज (कमजोर) करने की कोशिश कर सकती है।
चर्चा के अंत में विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि आगामी मॉनसून सत्र (Parliament Session) में यदि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और 'एनटीए' (NTA) को भंग करने जैसी ठोस मांगों पर संसद में गंभीर बहस होती है, तभी इस आंदोलन को एक तार्किक परिणति (Logical Conclusion) मिल पाएगी। अन्यथा, सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे जैसे एकल मुद्दे पर टिके रहने और आम जनता (विशेषकर ग्रामीण युवाओं) को साथ न जोड़ पाने की स्थिति में यह आंदोलन अपनी धार खो सकता है।
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