राम मंदिर दान चोरी विवाद: क्या मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया?
क्या सिर्फ ड्राइवर पर दोष मढ़कर बंद कर दी गई जांच? जानिए कृष्ण मोहन की नियुक्ति, विपक्ष की रणनीति और 22 तारीख की बैठक के सियासी मायने।
Nishpaksh : अयोध्या के भव्य राम मंदिर में 'दान चोरी' और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर उपजा विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुँच गया है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारियों के इस्तीफे, नए चेहरो की बहाली और कानूनी कार्यवाहियों के बीच यह सवाल बड़ा हो गया है कि क्या इस पूरे प्रकरण का 'पटाक्षेप' कर दिया गया है या यह आने वाले समय में किसी बड़े राजनीतिक और सामाजिक तूफान की आहट है?
'द फ़ेडरल देश' के विशेष शो 'निष्पक्ष' में वरिष्ठ पत्रकार नीलू व्यास और अयोध्या की वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता के बीच इस विषय पर विस्तृत चर्चा हुई, जिसमें इस महाविवाद के कई ऐसे पहलू सामने आए हैं, जो जनता की आँखों से ओझल रखे जा रहे थे।
1. चंपत राय को 'क्लीन चिट' और सांगठनिक फेरबदल
विवाद के तूल पकड़ने के बाद ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और सदस्य अनिल मिश्रा के इस्तीफों की पुष्टि हो चुकी है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चंपत राय का खुलकर बचाव किया। गोविंद देव गिरि ने चंपत राय के साथ अपने दशकों पुराने संबंधों का हवाला देते हुए कहा कि यह केवल "अनदेखी" का मामला हो सकता है, लेकिन उनके योगदान की सराहना की जानी चाहिए।
इस बयान के साथ ही ट्रस्ट ने चंपत राय को एक तरह से 'क्लीन चिट' दे दी है। वहीं, अनिल मिश्रा के इस्तीफे को चुपचाप स्वीकार कर लिया गया, लेकिन सार्वजनिक रूप से उनके खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला गया।
किसे मिली क्या जिम्मेदारी?
कृष्ण मोहन: ट्रस्ट के नए अंतरिम महासचिव (जो इस पूरे मामले के मुख्य व्हिसलब्लोअर भी हैं)।
बजंरग बागड़: नए महासचिव (दोनों ही चेहरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ - RSS से जुड़े बताए जा रहे हैं)।
गोपाल राव: विशेष आमंत्रित सदस्य, जिन्हें अब ट्रस्ट की सूची से पूरी तरह बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है।
2. व्हिसलब्लोअर ही बने 'महासचिव': कृष्ण मोहन की भूमिका
इस पूरे मामले का सबसे दिलचस्प पहलू कृष्ण मोहन की नियुक्ति है। कृष्ण मोहन वही शख्स हैं जिन्होंने राम मंदिर के दानपात्र से करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और पैसे के साथ खिलवाड़ करने वाले चोरों के खिलाफ मोर्चा खोला था और मुख्य रूप से FIR दर्ज कराई थी। इन्हीं की FIR के आधार पर पुलिस ने अब तक 8 लोगों को गिरफ्तार किया है और चोरी की गई रकम की वसूली की जा रही है। अब उन्हें ही अंतरिम महासचिव बनाकर ट्रस्ट ने डैमेज कंट्रोल (नुकसान नियंत्रण) की कोशिश की है।
3. सारा दोष ड्राइवर 'टीनू यादव' पर?
'निष्पक्ष' शो के विश्लेषण के अनुसार, कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि की प्रेस कॉन्फ्रेंस का एक बड़ा एजेंडा ट्रस्ट के बड़े नामों को बचाना था। ट्रस्ट की ओर से सारा ठीकरा चंपत राय के ड्राइवर 'टीनू यादव' पर फोड़ दिया गया है।
आरोप लगाया गया है कि टीनू यादव के बाहरी आपराधिक तत्वों से संबंध थे और उसने ही दूसरे लोगों के साथ मिलकर ट्रस्ट के खिलाफ एक गहरा षड्यंत्र रचा। ट्रस्ट का यह नैरेटिव यह स्थापित करने की कोशिश कर रहा है कि शीर्ष स्तर पर सब 'पाक-साफ' हैं और जो कुछ भी हुआ, वह निचले स्तर के कर्मचारियों की मिलीभगत से हुआ।
4. 'सीईओ' (CEO) मॉडल की तैयारी और बद्रीनाथ का उदाहरण
ट्रस्ट के अंदर चल रही खींचतान के बीच नृपेंद्र मिश्रा ने पूरे सिस्टम को बदलने (Overhaul) की बात कही थी। अब खबर आ रही है कि ट्रस्ट में एक 'सीईओ' (मुख्य कार्यकारी अधिकारी) की तैनाती के लिए तीन सदस्यीय कमेटी बनाई गई है।
हालाँकि, इस पर भी सवाल उठ रहे हैं। बद्रीनाथ मंदिर का उदाहरण सामने रखते हुए वरिष्ठ पत्रकारों ने रेखांकित किया कि बद्रीनाथ में सरकारी सीईओ होने के बावजूद चोरी की खबरें आई थीं। लेकिन अयोध्या के मामले में, यह सीईओ सरकारी न होकर सीधे ट्रस्ट का अपना व्यक्ति होगा। यानी तीन सदस्यीय कमेटी अपने ही किसी करीबी का चयन करेगी, जिससे इस पूरे सिस्टम पर नियंत्रण सीधे तौर पर ट्रस्ट का ही बना रहे और बाहरी हस्तक्षेप न हो सके।
5. नृपेंद्र मिश्रा का भविष्य और प्राण प्रतिष्ठा के खर्चों की 'टाइमिंग'
प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के पूर्व अधिकारी और मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा पर सीधे तौर पर कोई आरोप नहीं हैं, इसलिए उन्हें भी क्लीन चिट मिलना तय माना जा रहा है। कयास लगाए जा रहे हैं कि मंदिर निर्माण का कार्य लगभग अंतिम दौर (फिनिशिंग वर्क) में होने के कारण नृपेंद्र मिश्रा को ही इस नए सीईओ पद की कमान सौंपी जा सकती है या उनकी पसंद का कोई व्यक्ति यहाँ बैठेगा।
इसी बीच, मीडिया में प्राण प्रतिष्ठा समारोह के खर्चों की बारीक जानकारियां (जैसे टेंट, फूल, और पूजा सामग्री का करोड़ों का खर्च) जानबूझकर सामने लाई जा रही हैं। जानकारों का मानना है कि यह जनता को यह दिखाने की कोशिश है कि जांच बहुत 'डिटेलिंग' के साथ हो रही है, जबकि वास्तव में यह अपनी सफाई पेश करने का एक तरीका है। दान में मिली चाँदी को लेकर भी ट्रस्ट ने साफ किया कि उसे गलाकर छड़ें बना दी गई हैं और आरबीआई (RBI) की कस्टडी में रख दिया गया है।
6. विपक्ष का नैरेटिव और ठंडे बस्ते में जाता विवाद
विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (संजय सिंह), इस मुद्दे को लेकर आक्रामक थे। संजय सिंह ने साल 2020-21 के जमीन खरीद घपले से लेकर हालिया दानपात्र चोरी तक के कई दस्तावेज़ एसआईटी (SIT) को सौंपे हैं। वर्तमान में कांग्रेस अयोध्या में 'सद्बुद्धि यात्रा' भी निकाल रही है।
लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी ने इस क्राइसिस (संकट) को बहुत ही शातिर तरीके से मैनेज कर लिया है। चूंकि आरोपियों को जेल भेजा जा चुका है और बड़े पदाधिकारियों के इस्तीफे हो चुके हैं, इसलिए बीजेपी अब जनता के बीच जाकर यह कहेगी कि "हमने कड़ा एक्शन लिया है।" ऐसे में विपक्ष के हाथ से यह बड़ा नैरेटिव फिसलता हुआ दिखाई दे रहा है।
'निष्पक्ष' निष्कर्ष:
22 तारीख को राम मंदिर ट्रस्ट की एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक होने जा रही है और उम्मीद है कि इससे पहले एसआईटी (SIT) की अंतिम रिपोर्ट भी आ जाएगी (चूँकि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में सीबीआई जांच की याचिकाएं पहले ही खारिज या लंबित हैं)।
फिलहाल ऐसा प्रतीत होता है कि इस महाविवाद को बहुत ही सलीके से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। जमीन घोटाले और मंदिर निर्माण की अन्य वित्तीय विसंगतियों पर अब कोई बात नहीं कर रहा है। यह मामला अब तभी दोबारा तूल पकड़ेगा जब उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव नजदीक आएंगे और विपक्ष कोई नया और चौंकाने वाला तथ्य सामने लाएगा। तब तक के लिए, ट्रस्ट ने खुद को इस संकट से बाहर निकाल लिया है।
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