जंतर मंतर पैलेट गन विवाद: संसद में घिरे अमित शाह, SC पहुंचा मामला
जंतर-मंतर पर छात्रों पर पैलेट गन हमले को लेकर विपक्ष हमलावर है। सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई जारी है। 'द फ़ेडरल' पर विशेषज्ञों ने पुलिस कार्रवाई पर उठाए सवाल।
Nishpaksh: 'द फ़ेडरल देश' के शो 'निष्पक्ष' में वरिष्ठ पत्रकार और एंकर नीलू व्यास ने पुलिसिया कार्रवाई और सरकार की चुप्पी पर तीखे सवाल उठाए हैं।
20 जुलाई को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस द्वारा पैलेट गन के इस्तेमाल का मुद्दा अब देश की राजनीति के केंद्र में आ गया है। विपक्ष लगातार संसद में इस मुद्दे को उठा रहा है और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से जवाब मांग रहा है। वहीं, यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक भी पहुंच चुका है।
इस बेहद संवेदनशील मुद्दे और पुलिसिया कार्रवाई की खामियों पर 'द फ़ेडरल' की वरिष्ठ पत्रकार और एंकर नीलू व्यास ने खास चर्चा की। इस पूरी घटना के प्रशासनिक, कानूनी और राजनीतिक पहलुओं का बारीकी से विश्लेषण करने के लिए सीमा सुरक्षा बल (BSF) के पूर्व एडीजी (ADG) संजीव कृष्ण सूद और 'हार्ड न्यूज़' के संपादक व वरिष्ठ पत्रकार संजय कपूर ने बतौर विशेषज्ञ इस चर्चा में हिस्सा लिया।
संसद में विपक्ष का हंगामा और अमित शाह की चुप्पी
चर्चा की शुरुआत करते हुए एंकर नीलू व्यास ने बताया कि 'इंडिया' गठबंधन के नेता लगातार मांग कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सदन में आकर छात्रों पर हुए इस बर्बर पुलिस क्रैकडाउन का जवाब दें। राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कड़े शब्दों में कहा, "छात्रों पर पैलेट गन चलाई गई... किसी की आंख गई, किसी का कान गया, किसी का पैर टूटा... इसका जिम्मेदार कौन है?" कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्पष्ट किया है कि गृह मंत्री को इस मुद्दे पर जवाब देना ही होगा और विपक्ष इस लड़ाई से पीछे हटने वाला नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका: 'पैलेट गन का युग खत्म होना चाहिए'
इस बीच, पूर्व आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आजाद ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर पैलेट गन के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध (Blanket Ban) लगाने की मांग की है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पूर्ण प्रतिबंध लगाने से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता से याचिका में संशोधन कर इसे 'रेगुलेट' (Regulate) करने की मांग जोड़ने को कहा है।
पूर्व ADG संजीव कृष्ण सूद का विश्लेषण: "SOP और नियमों की उड़ी धज्जियां"
पुलिस कार्रवाई की तकनीकी और जमीनी हकीकत पर रोशनी डालते हुए बीएसएफ के पूर्व एडीजी संजीव कृष्ण सूद ने पुलिस लीडरशिप को कटघरे में खड़ा किया:
'मिनिमम फोर्स' का उल्लंघन: श्री सूद ने स्पष्ट किया कि सीआरपीसी (CrPC) और नए बीएनएसएस (BNSS) के तहत किसी भी प्रदर्शन को रोकने के लिए 'न्यूनतम बल' (Minimum Force) के इस्तेमाल का सिद्धांत है। इसमें पहले चेतावनी देना, फिर वॉटर कैनन और आंसू गैस का इस्तेमाल करना शामिल है। पैलेट गन का इस्तेमाल सीधे तौर पर गैर-जरूरी और असंवैधानिक था।
कमांड की विफलता: उन्होंने कहा कि मजिस्ट्रेट के बिना आदेश के फायरिंग नहीं की जा सकती। इतने बड़े वीवीआईपी इलाके में जहां 17-18 साल के मासूम छात्र प्रदर्शन कर रहे थे, वहां सीधे पैलेट गन चलाना पुलिस लीडरशिप के 'टोटल एबडिकेशन ऑफ ड्यूटी' (कर्तव्य से पूरी तरह भागने) को दर्शाता है।
हथियारों का गलत इस्तेमाल: उन्होंने बताया कि कश्मीर जैसे संवेदनशील इलाकों में भी पैलेट गन कमर से नीचे चलाने के सख्त निर्देश हैं, ताकि वाइटल ऑर्गन (Vital Organ) को नुकसान न पहुंचे। लेकिन जंतर-मंतर पर छात्रों के चेहरे, आंख और कान पर सीधे प्रहार किए गए, जो पुलिस की ट्रेनिंग और मंशा दोनों पर सवाल खड़े करता है।
वरिष्ठ पत्रकार संजय कपूर की राय: "नैरेटिव खो चुकी है सरकार"
वरिष्ठ पत्रकार संजय कपूर ने इस पूरे घटनाक्रम को सरकार की राजनीतिक विफलता से जोड़ा:
सरकार के पास जवाब नहीं: श्री कपूर ने कहा कि गृह मंत्री अमित शाह का संसद में इस मुद्दे पर जवाब न देना उनकी घबराहट और बचाव की मुद्रा को दर्शाता है। सरकार को समझ नहीं आ रहा है कि वे इस 'अभूतपूर्व' क्रैकडाउन को कैसे सही ठहराएं।
डराने की राजनीति विफल: उन्होंने जोर देकर कहा कि लोगों को डराने-धमकाने और बल प्रयोग से नैरेटिव सेट करने का जो फॉर्मूला अब तक काम कर रहा था, वह अब पूरी तरह विफल हो चुका है। देश का युवा अब सवाल पूछ रहा है और विपक्ष भी आक्रामक है, ऐसे में सरकार के लिए जवाबदेही से बचना अब मुमकिन नहीं है।
जंतर-मंतर पर छात्रों पर हुआ यह पुलिसिया प्रहार महज एक 'लॉ एंड ऑर्डर' का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह देश के युवाओं के 'फ्रीडम ऑफ स्पीच' और पुलिसिया तंत्र की क्रूरता से जुड़ा एक बड़ा राष्ट्रीय सवाल बन गया है। अब देखना यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर कोई सख्त गाइडलाइन तय करता है, और क्या मानसून सत्र के दौरान सरकार इस मुद्दे पर अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करेगी।
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