जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन: पेपर लीक के खिलाफ फूटा युवाओं का गुस्सा
द फेडरल देश के शो 'निष्पक्ष' में एक्सपर्ट्स ने जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन, पुलिस लाठीचार्ज और पेपर लीक मामलों को लेकर मोदी सरकार पर तीखे सवाल उठाए।
Nishpaksh: देश में लगातार सामने आ रहे पेपर लीक मामलों, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली और बढ़ती बेरोजगारी के खिलाफ देश के कोने-कोने से आए छात्रों और युवाओं ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक ऐतिहासिक और विशाल प्रदर्शन किया। इस बड़े आंदोलन और इसके बाद उपजे हालातों पर 'द फेडरल देश' के लोकप्रिय शो 'निष्पक्ष' में वरिष्ठ पत्रकार और एंकर नीलू व्यास ने विशेषज्ञों के साथ बेहद तीखी और गंभीर चर्चा की।
चर्चा में दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेवानिवृत्त प्रोफेसर शशि शेखर सिंह और कांग्रेस के प्रवक्ता प्रबल प्रताप शाही ने हिस्सा लिया और सरकार की नीतियों व पुलिसिया कार्रवाई पर कई गंभीर सवाल खड़े किए।
12 सालों में पहली बार दिखा ऐसा 'ऑर्गेनिक क्राउड'
शो की शुरुआत करते हुए एंकर नीलू व्यास ने बताया कि जंतर-मंतर और उसके आसपास के इलाकों में पिछले 12 सालों में ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा गया। उन्होंने कहा:
"यह कोई लाई गई या भाड़े की भीड़ नहीं थी। यह पूरी तरह से एक 'ऑर्गेनिक क्राउड' (स्वतः स्फूर्त भीड़) था, जिसमें झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे विभिन्न राज्यों से युवा और छात्र अपने अभिभावकों के साथ पहुंचे थे। भीड़ इतनी बड़ी थी कि उसे संभालने में दिल्ली पुलिस के भी पसीने छूट गए।"
शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिस की बर्बरता: प्रो. शशि शेखर सिंह
दिल्ली यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफेसर शशि शेखर सिंह ने आंदोलन का आंखों देखा हाल बयां करते हुए दिल्ली पुलिस और पैरामिलिट्री फोर्सेस की कार्रवाई की कड़ी निंदा की। उन्होंने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा:
मेट्रो स्टेशन किए गए बंद: छात्रों को रोकने के लिए प्रशासन ने पटेल चौक, जनपथ और केंद्रीय सचिवालय जैसे प्रमुख मेट्रो स्टेशनों को बंद कर दिया ताकि युवा प्रदर्शन स्थल तक न पहुंच सकें।
शांतिपूर्ण आंदोलन पर दमन: प्रोफेसर सिंह ने बताया कि इतनी उमस और भीषण गर्मी के बावजूद देश के कोने-कोने से आए 98% से अधिक युवा बेहद अनुशासित और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें रख रहे थे। वे इंकलाब जिंदाबाद और भारत माता की जय के नारे लगा रहे थे, लेकिन पुलिस ने उन पर बेरहमी से लाठियां बरसाईं और आंसू गैस के गोले छोड़े। यहाँ तक कि बैरिकेड्स पर कथित रूप से करंट तक दौड़ाने की कोशिश की गई।
अधिकारियों को चेताया: उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के बयान का हवाला देते हुए कहा कि आंदोलन करना छात्रों का संवैधानिक और मौलिक अधिकार है। सत्ता हमेशा एक जैसी नहीं रहती, इसलिए जो अधिकारी आज छात्रों पर लाठियां चला रहे हैं, कल उनकी भी जवाबदेही तय की जाएगी।
"यह सरकार युवा और छात्र विरोधी है" : कांग्रेस प्रवक्ता
चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस के प्रवक्ता प्रबल प्रताप शाही ने पुलिस की इस कार्रवाई को अमानवीय कृत्य करार दिया। उन्होंने कहा:
छात्रों को आई गंभीर चोटें: पुलिस के लाठीचार्ज में कई छात्र-छात्राओं के सिर फट गए हैं और कइयों के हाथ फ्रैक्चर हो गए हैं। यहाँ तक कि 14-15 साल के बच्चों को भी नहीं बख्शा गया।
नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग: शाही ने कहा कि यह सरकार हर साल 2 करोड़ रोजगार देने का वादा करके सत्ता में आई थी, लेकिन आज युवाओं को सिर्फ पेपर लीक (NEET, CBSE आदि) मिल रहा है। उन्होंने कहा कि अब सिर्फ शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से काम नहीं चलेगा, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुद अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए।
गोदी मीडिया पर फूटा गुस्सा: उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रदर्शन स्थल पर बिना नेम प्लेट के कुछ संदिग्ध लोग भी पुलिस के भेष में घूम रहे थे, जो आरएसएस के हो सकते हैं। शाही ने कहा कि आज युवाओं का गुस्सा उस 'गोदी मीडिया' पर भी फूटा जो छात्रों की असल समस्याओं को दिखाने के बजाय सरकार का बचाव कर रही है।
जेपी नड्डा से मुलाकात पर उठे सवाल
शो के दौरान इस बात पर भी चर्चा हुई कि कॉकरोच जनता पार्टी (CGP) की टीम से आशुतोष रंका और सौरभ दास को भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से मिलने का समय मिला, जहाँ उन्होंने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर एक ज्ञापन सौंपा। हालांकि, प्रो. शशि शेखर सिंह ने इस मुलाकात के औचित्य पर सवाल उठाते हुए कहा कि कैबिनेट में जेपी नड्डा की क्षमता सिर्फ एक मंत्री जैसी है, उनके पास फैसले लेने का कोई अधिकार नहीं है। छात्रों को अपनी बात सीधे गृह मंत्री अमित शाह या प्रधानमंत्री के सामने रखनी चाहिए थी।
आंदोलन रुकने वाला नहीं, आगे बढ़ेगी लड़ाई
चर्चा के अंत में पैनलिस्टों ने इस बात पर सहमति जताई कि भले ही कुछ छात्र संगठनों का अनशन डॉक्टरों और वरिष्ठों की सलाह पर स्वास्थ्य कारणों से समाप्त करा दिया गया हो, लेकिन युवाओं के भीतर का आक्रोश खत्म नहीं हुआ है। सोनम वांगचुक और अन्य छात्र नेता अस्पताल में रहने के बावजूद अपने संकल्प पर टिके हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस आंदोलन ने अब व्यापक रूप ले लिया है और आने वाले दिनों में यह सरकार की छात्र विरोधी नीतियों के खिलाफ एक बहुत बड़े राष्ट्रव्यापी आंदोलन का रूप अख्तियार करेगा।

