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नीट केस: छात्रों पर FIR वापसी की गुहार, राहत या सरकार का नया पैंतरा?

'द फ़ेडरल देश' के शो निष्पक्ष में नीट प्रदर्शनकारियों पर दर्ज FIR वापसी पर चर्चा। विशेषज्ञों ने इसे 5 सितंबर के मार्च को रोकने का सरकारी ड्रामा और छलावा करार दिया।


Nishpaksh: नीट (NEET) पेपर लीक मामले में सड़क पर उतरे छात्रों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द करने के लिए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है। सरकार की इस पहल को एक तरफ जहां छात्रों के लिए राहत माना जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ इसे 5 सितंबर को इंडिया गेट पर होने वाले बड़े विरोध मार्च को कमज़ोर करने की साजिश भी करार दिया जा रहा है।

'द फ़ेडरल देश' के खास शो 'निष्पक्ष' में एंकर नीलू व्यास ने इसी ज्वलंत मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की। इस चर्चा में राजनीतिक विश्लेषक आयुष्मान पांडेय और इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता राजवेंद्र सिंह ने सरकार की मंशा और इस कानूनी दांव-पेंच की पोल खोली।


क्या बैकफुट पर है सरकार?


चर्चा की शुरुआत करते हुए नीलू व्यास ने सवाल उठाया कि क्या सरकार अब बैकफुट पर है और 5 सितंबर के प्रस्तावित मार्च से घबरा गई है? इस पर राजनीतिक विश्लेषक आयुष्मान पांडेय ने कहा कि सरकार पूरी तरह से बैकफुट पर है और हताश नज़र आ रही है। उन्होंने कहा, "यह कदम केवल एक दिखावा है। सरकार सुप्रीम कोर्ट का सहारा लेकर अपनी छवि सुधारने की कोशिश कर रही है और 5 सितंबर के प्रदर्शन को 'डाइल्यूट' (कमज़ोर) करना चाहती है। यदि सरकार सच में छात्रों के प्रति संवेदनशील होती, तो वह एफआईआर दर्ज ही नहीं करती।"


'मुकदमे वापस लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने की ज़रूरत नहीं'


कानूनी पेचीदगियों को स्पष्ट करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता राजवेंद्र सिंह ने सरकार की नीयत पर तीखे सवाल खड़े किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार या पुलिस के पास यह अधिकार होता है कि वे जन-आंदोलनों में दर्ज मुकदमों को खुद वापस ले सकें।

राजवेंद्र सिंह ने उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा, "2017 में जब यूपी में बीजेपी की सरकार आई, तो उन्होंने अपने नेताओं और खुद मुख्यमंत्री के ऊपर दर्ज दर्जनों मुकदमे बिना सुप्रीम कोर्ट जाए वापस ले लिए थे। ऐसे में नीट के छात्रों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने का क्या औचित्य है? यह केवल गुमराह करने और समय काटने की एक चाल है।" उन्होंने आगे बताया कि क्रिमिनल मामलों में स्टेट प्रॉसिक्यूशन के पास केस वापस लेने का अधिकार होता है, जिसके लिए अदालत से सिर्फ औपचारिक सहमति (Formal Consent) लेनी होती है।


लोकतंत्र में विरोध के अधिकार पर प्रहार

पैनलिस्टों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना युवाओं का मौलिक अधिकार है। मिड-डे मील की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों से लेकर स्कूल की बदहाली दिखाने वालों पर एफआईआर दर्ज करने का ज़िक्र करते हुए राजवेंद्र सिंह ने कहा कि मौजूदा दौर में एफआईआर का इस्तेमाल आवाज़ दबाने के हथियार के रूप में हो रहा है।


निष्कर्ष


'निष्पक्ष' की इस चर्चा से यह साफ उभर कर आया कि केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करना कानूनी मज़बूरी कम और राजनीतिक पैंतरेबाज़ी ज़्यादा है। जानकारों का मानना है कि 'जेन-ज़ी' (Gen-Z) और युवा वोटर अब इन चालों को समझ रहे हैं। अब सबकी नज़रें 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई और 5 सितंबर को छात्रों द्वारा प्रस्तावित इंडिया गेट मार्च पर टिकी हैं।


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