'गुमराह बच्चे' और 'कल्चरल शौक': पीएम मोदी के बयान पर तीखा पलटवार
द फ़ेडरल देश के शो 'निष्पक्ष' में एंकर नीलू व्यास के साथ देखिए जंतर-मंतर मामले में 15 साल की नाबालिग छात्रा के माफ़ीनामे, PM मोदी की रील और JJ Act के उल्लंघन पर पूरी विस्तृत चर्चा।
Nishpaksh: दिल्ली के जंतर-मंतर पर शिक्षा व्यवस्था, पेपर लीक और छात्र समस्याओं को लेकर चल रहे युवाओं (GenZ) के आंदोलन के दौरान एक नया और गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाली जिस लड़की की उम्र पहले सोशल मीडिया और मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 25 साल बताई जा रही थी, उसने अब सामने आए एक नए वीडियो में खुद खुलासा किया है कि वह महज 15 साल की नाबालिग छात्रा (10वीं कक्षा) है।
गाजियाबाद की एक महिला वकील द्वारा दर्ज कराई गई 'Zero FIR' और भारी पुलिस दबाव के बाद उस 15 साल की बच्ची से जबरन 'वीडियो अपोलॉजी' (वीडियो माफ़ीनामा) शूट कराया गया। इस वीडियो में बिना चेहरा ब्लर किए छात्रा की पहचान सार्वजनिक कर दी गई, जिसके बाद अब देश भर में कानूनी विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट (JJ Act) के खुले उल्लंघन और सरकार की कार्रवाई पर तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं।
डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के चर्चित शो 'निष्पक्ष' में वरिष्ठ पत्रकार और एंकर नीलू व्यास ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता राजवेंद्र तिवारी, रामजस कॉलेज (दिल्ली यूनिवर्सिटी) के प्रोफेसर तनवीर एजाज और वरिष्ठ पत्रकार टी.के. राजलक्ष्मी के साथ इस पूरे घटनाक्रम का हर पहलू से गहन और विस्तृत विश्लेषण किया।
1. 15 साल की नाबालिग का चेहरा वायरल: जुवेनाइल जस्टिस एक्ट (JJ Act) की धज्जियां किसने उड़ाईं?
शो की शुरुआत करते हुए एंकर नीलू व्यास ने सबसे बड़ा सवाल यही उठाया कि एक 10वीं क्लास की 15 साल की नाबालिग बच्ची, जिसे बोर्ड परीक्षा देनी है, उसका चेहरा बिना ब्लर किए पूरे देश और दुनिया के सामने क्यों चलाया जा रहा है?
इस पर कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता राजवेंद्र तिवारी ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट (JJ Act) की धारा 74 का ब्योरा दिया:
Section 74 of JJ Act का सीधा उल्लंघन: कानून के मुताबिक, अगर कोई नाबालिग किसी परिस्थिति में कानून के उल्लंघन में आ भी जाता है, तो उसकी पहचान, नाम, स्कूल या चेहरा किसी भी कीमत पर उजागर नहीं किया जा सकता। कानून का मकसद बच्चे को मानसिक आघात और जीवन भर के कलंक (trauma) से बचाना है।
6 महीने की जेल और 1 लाख जुर्माना: धारा 74(3) के अनुसार, जो भी मीडिया चैनल, सोशल मीडिया हैंडलर या संस्था किसी नाबालिग की पहचान उजागर करती है, उसके खिलाफ 6 महीने तक की सजा और 1 लाख रुपये के जुर्माने का कानूनी प्रावधान है।
पुलिस की दोहरी भूमिका पर सवाल: राजवेंद्र तिवारी ने सवाल उठाया कि जब गाजियाबाद पुलिस एक महिला वकील की शिकायत पर बच्ची के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने में तत्परता दिखा सकती है, तो क्या वही पुलिस उन आईटी सेल के ट्रोल्स और चैनल्स पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर कार्रवाई करेगी जिन्होंने इस नाबालिग बच्ची का चेहरा सार्वजनिक कर उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया है?
2. PM मोदी की इंस्टाग्राम रील और 'दांत-जीभ' वाली एनालॉजी: उदारता या राजनीतिक डैमेज कंट्रोल?
नाबालिग के वीडियो माफीनामे के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक रील पोस्ट की। रील में पीएम मोदी ने कहा कि "कुछ गुमराह बच्चों ने मेरी मां और मुझे गाली दी, लेकिन मैं उन्हें माफ करता हूं।" उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि गलती से अगर दांत जीभ को काट ले तो दांत उखाड़कर नहीं फेंका जाता, अब सबको साथ चलने की जरूरत है। पीएम ने यह भी कहा कि लड़कियों के मुंह से ऐसी भाषा सुनना उनके लिए एक 'कल्चरल शौक' (सांस्कृतिक झटका) था।
इस पर वरिष्ठ पत्रकार टी.के. राजलक्ष्मी ने शो में सरकार की नीयत पर हमला बोलते हुए कहा:
डर और दबाव में माफ़ीनामा: 15 साल की बच्ची और उसके माता-पिता बेहद डर गए होंगे कि एफआईआर के बाद बच्ची का करियर और बोर्ड एग्जाम खराब हो जाएंगे। इसी दबाव का फायदा उठाकर यह वीडियो शूट करवाया गया।
माफ किया तो एफआईआर वापस क्यों नहीं? टी.के. राजलक्ष्मी ने पूछा कि जब प्रधानमंत्री रील बनाकर बच्चों को माफ करने की बात कर रहे हैं, तो क्या गाजियाबाद पुलिस में दर्ज एफआईआर (FIR) और रुचिका सिंह समेत अन्य छात्रों पर दर्ज मुकदमे वापस लिए जाएंगे?
संस्कार का दोहरा पैमाना: राजलक्ष्मी ने आरोप लगाया कि जब सत्ताधारी दल के सांसद संसद के भीतर अमर्यादित भाषा बोलते हैं या ट्रोल्स महिलाओं के खिलाफ भद्दी टिप्पणी करते हैं, तब कोई एफआईआर नहीं होती। लेकिन जब एक छात्रा व्यवस्था से तंग आकर नारेबाजी करती है, तो पूरा तंत्र उसके पीछे पड़ जाता है।
3. 'कैरोट एंड स्टिक' पॉलिसी: क्या लाठी, एफआईआर और रील से शांत होगा GenZ का गुस्सा?
दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज के प्रोफेसर तनवीर एजाज ने शो में युवाओं की मानसिकता और सरकार के रुख का गहरा विश्लेषण किया:
असली मुद्दा शिक्षा और 40% बेरोजगारी: प्रोफेसर एजाज ने स्पष्ट किया कि जंतर-मंतर पर जुटे युवा किसी के बहकावे में नहीं आए हैं। युवाओं का गुस्सा पेपर लीक, नीट (NEET) धांधली, 40% से अधिक पहुंच चुकी बेरोजगारी और अंधकारमय भविष्य को लेकर है।
'कैरोट एंड स्टिक' नीति बेअसर: सरकार एक तरफ पुलिस, आंसू गैस और एफआईआर के जरिए छात्रों को डरा रही है (Stick), तो दूसरी तरफ इंस्टाग्राम रील बनाकर प्यार और दुलार (Carrot) जताने का नाटक कर रही है।
जेन-जी (GenZ) पीछे हटने वाली नहीं: युवाओं को रील या गोलमोल बयानों की नहीं, बल्कि अपनी नौकरियों और पारदर्शी परीक्षा तंत्र के ठोस लिखित जवाब की जरूरत है। जब तक सरकार उनकी मांगों का समाधान नहीं करेगी, यह गुस्सा शांत होने वाला नहीं है।
4. UPA दौर की तुलना: राजनीति में 'थिक स्किन' की जरूरत
चर्चा के अंत में विशेषज्ञों ने याद दिलाया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नेताओं और मुख्यमंत्रियों-प्रधानमंत्री को आलोचना सुनने के लिए अपनी चमड़ी मोटी (Thick Skin) रखनी पड़ती है। यूपीए सरकार के दौर में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तीखी आलोचनाएं और कार्टून बनते थे, लेकिन कभी किसी 15 साल के बच्चे के खिलाफ एफआईआर दर्ज करके इस तरह का सार्वजनिक माफीनामा शूट कराने का उदाहरण नहीं देखने को मिला।
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