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बंदूक के साए में छात्र: क्या देश में 'पुलिस स्टेट' लागू है?

बंदूक के साए में छात्र: पुलिस की बर्बरता और सत्ता के अहंकार की पूरी कहानी। जानिए क्या देश में 'पुलिस स्टेट' लागू हो चुका है?


Nishpaksh: देश भर में चल रहे छात्र आंदोलनों को दबाने के लिए पुलिस द्वारा अपनाए गए हिंसक और बर्बर तरीकों ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे निहत्थे छात्रों पर दिल्ली में पेलेट गन (Pellet Gun) और बिहार में AK-47 जैसे घातक हथियारों का इस्तेमाल महज़ कानून-व्यवस्था का मसला नहीं रह गया है, बल्कि यह लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन का एक बड़ा सवाल बन गया है। इसी सुलगते मुद्दे पर 'द फ़ेडरल देश' के खास शो 'निष्पक्ष' में एंकर नीलू व्यास ने देश के जाने-माने विशेषज्ञों के साथ गहन और बेबाक चर्चा की।


शो में मुख्य रूप से बीएसएफ के पूर्व एडीजी (Ex-ADG BSF) संजीव सूद और वरिष्ठ पत्रकार टीके राजलक्ष्मी ने हिस्सा लिया और पुलिसिया तंत्र, सरकार की मंशा तथा लोकतांत्रिक ढांचे पर मंडराते खतरे पर अपनी विस्तृत राय रखी।

संसद से सड़क तक पुलिस की बर्बरता की गूंज
शो की शुरुआत करते हुए एंकर नीलू व्यास ने मौजूदा हालात की गंभीरता को सामने रखा। उन्होंने बताया कि पुलिस की इस बर्बर कार्रवाई के कारण ही आज संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही ठप रही। इंडियन एक्सप्रेस में छपी सीआरपीएफ (CRPF) की जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया कि दिल्ली में छात्रों पर 7 राउंड पेलेट गन से फायर किए गए। वहीं, बिहार से 500 से अधिक छात्रों को हॉस्टल से उठाने और सीवान जैसे इलाकों में पुलिस द्वारा AK-47 तानने की खौफनाक तस्वीरें सामने आई हैं। इन घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्त टिप्पणी करते हुए 'नेशनल प्रोटोकॉल फॉर प्रोटेस्ट' बनाने की बात कही है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने भी सीधे तौर पर गृह मंत्री अमित शाह से इस पुलिसिया क्रूरता पर जवाब मांगा है।

"नक्सलियों से लड़ने वाले हथियार छात्रों पर क्यों?"
पुलिस की इस हिंसक कार्यप्रणाली पर पूर्व एडीजी संजीव सूद ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने इस पूरी कार्रवाई को घोर गैर-जिम्मेदाराना करार देते हुए कहा कि निहत्थे और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ 'ब्रूट फोर्स' (Brute Force) और AK-47 जैसे ऑटोमैटिक हथियारों का इस्तेमाल किसी भी सूरत में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने 'मिनिमम फोर्स' के प्रोटोकॉल को समझाते हुए स्पष्ट किया कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पहले वॉटर कैनन, आंसू गैस और लाठी (बिना कील वाली) का इस्तेमाल होना चाहिए। गोली चलाने की नौबत आने पर भी पहले हवा में फायर किया जाता है और यदि पेलेट गन चलानी ही हो, तो उसे घुटनों के नीचे (Lower Limbs) मारा जाना चाहिए ताकि वाइटल ऑर्गन्स (महत्वपूर्ण अंगों) को नुकसान न पहुंचे। संजीव सूद ने साफ कहा कि इस तरह के आदेश देने वाले स्थानीय कमांडर और जिले के एसपी (SP) की जवाबदेही तुरंत तय होनी चाहिए।

सरकार की मंशा और पुलिस का 'रिएक्शनरी रिस्पॉन्स'
शो में वरिष्ठ पत्रकार टीके राजलक्ष्मी ने इस पुलिसिया बर्बरता को राज्य के 'क्लासिक रिएक्शनरी रिस्पॉन्स' (Classic Reactionary Response) का हिस्सा बताया। उन्होंने बिहार के संदर्भ में कहा कि चूंकि कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है, इसलिए इसकी पूरी जिम्मेदारी राज्य के गृह मंत्री की बनती है। उन्होंने पुलिस की उस क्रूर मानसिकता को भी उजागर किया जहां केवल प्रदर्शनकारी ही नहीं, बल्कि उनकी मदद करने वाले आम नागरिकों को भी निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने जुनैद नाम के उस युवक का उदाहरण दिया जिसे पुलिस ने सिर्फ इसलिए परेशान किया क्योंकि वह प्रदर्शनकारियों को पकोड़े तलकर खिला रहा था।

राजलक्ष्मी ने यह भी स्पष्ट किया कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) जैसे संगठनों ने सरकार के लिखित आश्वासन के वादे पर अपना आंदोलन वापस तो लिया है, लेकिन सरकार अब 'वेट एंड वॉच' (Wait and Watch) का खेल खेल रही है। सरकार को लगता है कि एक बड़े मंत्री का इस्तीफा दे देना ही बहुत बड़ी रियायत है, इसलिए वह छात्रों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने में आनाकानी कर रही है, जिसके चलते अब छात्र संगठनों ने कानूनी रास्ता अपनाने की चेतावनी दी है।

'1984' की याद और लोकतंत्र पर मंडराता खतरा
शो का सबसे अहम और चिंताजनक पहलू तब सामने आया जब पूर्व एडीजी संजीव सूद ने जाने-माने लेखक जॉर्ज ओरवेल (George Orwell) के प्रसिद्ध उपन्यास '1984' का ज़िक्र किया। उन्होंने एक बेहद गंभीर चेतावनी देते हुए कहा कि ओरवेल ने जिस 'पुलिस स्टेट' (Police State) की कल्पना 1984 तक के लिए की थी, भारत आज बहुत तेज़ी से उसी राह पर बढ़ रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब कोई लोकतांत्रिक देश अपने ही नागरिकों, अपने ही युवाओं को 'दुश्मन' (Enemy) की तरह ट्रीट करने लगे और उन पर बिना किसी जवाबदेही के घातक हथियारों का इस्तेमाल करने लगे, तो यह समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र पर एक बहुत बड़ा और भयंकर खतरा मंडरा रहा है।
'निष्पक्ष' की यह चर्चा इस बात को साफ तौर पर स्थापित करती है कि सरकार द्वारा नंदन नीलेकणि के नेतृत्व में टास्क फोर्स बनाना या एंटी-पेपर लीक बिल लाना तब तक बेमानी है, जब तक छात्रों की आवाज़ को बंदूकों के दम पर कुचला जाता रहेगा। विपक्ष का संसद में हंगामा और सड़कों पर छात्रों का गुस्सा इस बात का संकेत है कि बिना ठोस जवाबदेही तय किए, सरकार इस मुद्दे से आसानी से पल्ला नहीं झाड़ सकती।


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