PM के जन्मदिन पर दीये गिन रहे DM? कांग्रेस का बड़ा हमला!
'द फ़ेडरल देश' के शो निष्पक्ष में देखिए: क्या पीएम मोदी के जन्मदिन पर शिक्षकों और DM का पीआर इवेंट्स में इस्तेमाल करना लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ है?
Nishpaksh: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिन और सार्वजनिक जीवन के 25 साल पूरे होने पर भाजपा द्वारा देश भर में चलाए जा रहे 'सेवा संकल्प अभियान' और 'आशीर्वाद का दिया' कार्यक्रम ने एक बड़े राजनीतिक और संवैधानिक विवाद को जन्म दे दिया है।
क्या किसी नेता का जन्मदिन मनाने के लिए सरकारी मशीनरी, स्कूली शिक्षकों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और जिलाधिकारियों (DM) का इस्तेमाल किया जा सकता है? 'द फ़ेडरल देश' के शो 'निष्पक्ष' में एंकर नीलू व्यास ने कांग्रेस प्रवक्ता प्रबल प्रताप शाही और वरिष्ठ पत्रकार टी.के. राजलक्ष्मी के साथ इसी ज्वलंत मुद्दे पर तीखी परिचर्चा की। चर्चा में सामने आया कि कैसे जहानाबाद के एक स्कूल सर्कुलर और उज्जैन कलेक्टर के बयानों ने इस पूरे अभियान पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
1. सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग और प्रशासनिक नाकामी (टी.के. राजलक्ष्मी)
वरिष्ठ पत्रकार टी.के. राजलक्ष्मी ने इस पूरे अभियान को लोकतंत्र और संवैधानिक ढांचे के लिए खतरनाक बताया।
प्राथमिकताओं का विचलन: उन्होंने तीखा सवाल उठाया कि जब कई जिलों में बाढ़, कानून-व्यवस्था का संकट और बुनियादी नागरिक समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं, तब एक आईएएस अधिकारी (DM) का पूरा ध्यान सिर्फ इस बात पर कैसे हो सकता है कि जिले में कितने हज़ार दीये जल रहे हैं? यह पूरी तरह से प्रशासनिक प्राथमिकताओं की अनदेखी है।
शिक्षकों और आंगनवाड़ी का उत्पीड़न: जहानाबाद (बिहार) में शिक्षकों को दीया जलाने और रील बनाकर वायरल करने का सर्कुलर जारी किया गया है। राजलक्ष्मी ने कहा कि शिक्षा और कल्याणकारी कार्यों से जुड़े लोगों (जिनमें से कई सिर्फ मानदेय पर काम करते हैं) पर इस तरह का पीआर (PR) और इवेंटबाज़ी थोपना सरासर अनुचित है।
छवि चमकाने की कोशिश: उनका मानना है कि पेपर लीक, छात्र आंदोलनों और सत्यनिकेतन जैसे हादसों के बाद सरकार अपनी गिरती साख को बचाने के लिए यह आक्रामक इवेंटबाज़ी कर रही है।
2. कांग्रेस का पलटवार: 'जनता के ज़ख्मों पर नमक छिड़कने जैसा' (प्रबल प्रताप शाही)
कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रबल प्रताप शाही ने सरकार और इस पूरे आयोजन को कटघरे में खड़ा कर दिया।
बाढ़ और आत्महत्याओं के बीच जश्न: शाही ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि बिहार, असम, बंगाल और यूपी के कई इलाके इस समय भीषण बाढ़ में डूबे हैं। जब किसान आत्महत्या कर रहे हों, दलित छात्रों का वज़ीफ़ा लटका हो और मिड-डे मील का बुरा हाल हो, ऐसे में सरकारी खज़ाने के सैकड़ों-हजारों करोड़ रुपये खर्च कर जश्न मनाना, सीधे तौर पर जनता के ज़ख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है।
संविधान बनाम पार्टी निर्देश: शाही ने आरोप लगाया कि भाजपा शासित राज्यों में सरकारी दफ्तर अब संविधान की 'रूल बुक' से नहीं, बल्कि सीधे पार्टी मुख्यालय के निर्देशों से चल रहे हैं। उन्होंने इसे एक तानाशाही (अधिनायकवादी) रवैया करार दिया, जहाँ सत्ता के शीर्ष नेता के महिमामंडन के लिए पूरे प्रशासनिक तंत्र को झोंक दिया गया है।
युवाओं के मुद्दों पर चुप्पी: उन्होंने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर लाठीचार्ज और बेरोज़गारी जैसे बुनियादी सवालों पर सरकार की चुप्पी को लेकर भी तीखा हमला बोला।
एंकर नीलू व्यास ने चर्चा को समेटते हुए स्पष्ट निष्कर्ष निकाला कि किसी नेता का जन्मदिन मनाना या जनसेवा करना कोई गलत बात नहीं है। लेकिन जब संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारी, डीएम और पूरा सरकारी अमला अपने नागरिक कर्तव्यों को छोड़कर महज़ इवेंटबाज़ी और 'रील बनाने' में जुट जाए, तो यह सीधे तौर पर टैक्सपेयर्स के पैसे और देश की लोकतांत्रिक मर्यादाओं के साथ खिलवाड़ है।
Next Story

