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डिटेंशन बना आन्दोलन को दबाने का नया टूल?

दिल्ली में प्रिवेंटिव डिटेंशन के नियमों की अनदेखी पर 'निष्पक्ष' चर्चा। अभिजीत दीपके को बेल, नेहा बोरा पर बर्बरता और ध्रुव राठी के इंटरनेशनल प्रोटेस्ट पर चर्चा।


Nishpaksh: राजधानी दिल्ली में नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों को लेकर पुलिसिया कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। 'लहरा दो तिरंगा' यात्रा के बाद हिरासत में लिए गए कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके को अदालत से जमानत मिलने और उनसे दोबारा बांड भरवाने के बाद यह बहस और तेज हो गई है। 'द फ़ेडरल देश' के प्रमुख परिचर्चा कार्यक्रम 'निष्पक्ष' में वरिष्ठ एंकर नीलू व्यास ने इस बात की पड़ताल की कि क्या कानूनी प्रावधानों और प्रिवेंटिव डिटेंशन को अब असहमति की आवाज़ दबाने और प्रदर्शनकारियों को थकाने के एक दमनकारी औजार में तब्दील कर दिया गया है।


इस विशेष चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार योगेश पवार, वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक टी.के. राजलक्ष्मी और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता आयुष्मान पांडे ने हिस्सा लिया।

1. दीपके को बेल, फिर बांड का शिकंजा; नेहा बोरा के साथ बर्बरता
शो की शुरुआत में एंकर नीलू व्यास ने बताया कि अभिजीत दीपके को 24 घंटे के भीतर कोर्ट में पेश किए जाने के बाद ज़मानत मिल गई है, लेकिन उनसे दोबारा 'पीस बांड' भरवाया गया है।

डिटेंशन का तरीका पीड़ादायक: नीलू व्यास ने सवाल उठाया कि पहले आम तौर पर प्रिवेंटिव डिटेंशन में 3 से 4 घंटे में लोगों को रिहा कर दिया जाता था, लेकिन अब हिरासत को ही सज़ा बना दिया गया है।

नेहा बोरा के साथ गैर-कानूनी रवैया: सामाजिक कार्यकर्ता नेहा बोरा को गर्दन से पकड़कर वैन में ठूंसने, रात 12-12:30 बजे तक अज्ञात स्थानों पर घुमाने, वकीलों से संपर्क न कराने और सूर्यास्त के बाद हिरासत से जुड़े नियमों की अनदेखी पर तीखी आपत्ति दर्ज की गई। हिरासत के दौरान भी नेहा बोरा लगातार मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करती रहीं।

2. 'द प्रोसेस इज़ द पनिशमेंट': योगेश पवार का गृह मंत्रालय पर निशाना
वरिष्ठ पत्रकार योगेश पवार ने पूरी प्रक्रिया को व्यवस्थागत प्रताड़ना करार दिया:

सज़ा बन चुकी प्रक्रिया: योगेश पवार ने कहा कि सामान्य लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायिक जांच के बाद दोष साबित होने पर सज़ा मिलती है, लेकिन यहां पुलिस द्वारा पकड़ लेना ही अपने आप में सज़ा बना दिया गया है।

वर्दी की आड़ में अराजकता: उन्होंने आरोप लगाया कि बिना नेमप्लेट या बैच के कर्मियों द्वारा लाठी-डंडों से बल प्रयोग करना यह दिखाता है कि दिल्ली पुलिस को गृह मंत्रालय के शीर्ष स्तर से मनमानी के स्पष्ट निर्देश मिले हुए हैं। उन्होंने कहा कि पुलिस का मूल ध्येय 'सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय' (सज्जनों की रक्षा, दुष्टों का दलन) अब बिल्कुल उलट चुका है।

कागजी सबूतों से बचाव: उन्होंने बताया कि लिखित आदेशों के बजाय वर्बल (मौखिक) आदेशों पर सब कुछ इसलिए चलाया जा रहा है ताकि भविष्य में कोई 'पेपर ट्रेल' न मिले और कानूनी जवाबदेही से बचा जा सके।

3. बीएनएसएस धारा 126 और 170 का दुरुपयोग: अधिवक्ता आयुष्मान पांडे
अधिवक्ता आयुष्मान पांडे ने प्रिवेंटिव डिटेंशन के कानूनी पहलुओं पर सरकार और पुलिस को कटघरे में खड़ा किया:

क्राइम क्या था?: आयुष्मान पांडे ने पूछा कि बीएनएसएस (BNSS) की धारा 126 और 170 के तहत प्रिवेंटिव एक्शन किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offense) को रोकने के लिए होता है। हाथ में तिरंगा लेकर सड़क पर चलना या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना कब से अपराध हो गया?

स्थायी धारा 144/163 का तमाशा: उन्होंने कहा कि लुटियंस दिल्ली में 2016 से लगातार निषेधाज्ञा (पहले 144, अब बीएनएसएस 163) के आदेशों को रिन्यू किया जा रहा है, जो लोकतांत्रिक अधिकारों का खुला मजाक है।

बांड की वैधता: उन्होंने स्पष्ट किया कि दबाव या ज़बरदस्ती में साइन करवाया गया बांड कानूनन लागू करने योग्य (Enforceable) नहीं होता। युवाओं ने अब यह तय कर लिया है कि वे बिना विरोध दर्ज कराए पुलिस की मनमानी बर्दाश्त नहीं करेंगे।

4. अपनी खाल बचाने के लिए धाराओं का खेल: टी.के. राजलक्ष्मी
वरिष्ठ पत्रकार टी.के. राजलक्ष्मी ने दिल्ली पुलिस की प्रक्रियागत खामियों को उजागर किया:

अरेस्ट मेमो और कानूनी अधिकार नदारद: उन्होंने कहा कि हिरासत के समय न तो अरेस्ट मेमो दिया जा रहा है और न ही डिटेन किए गए व्यक्ति को अपने वकील से बात करने दी जा रही है।

अकेले व्यक्ति से कैसा लॉ एंड ऑर्डर थ्रेट?: राजलक्ष्मी ने सवाल किया कि अभिजीत दीपके जब झंडेवालान से अकेले निकले थे, तो एक अकेला निहत्था व्यक्ति कानून-व्यवस्था के लिए खतरा कैसे बन सकता है? पुलिस केवल कोर्ट की फटकार से बचने के लिए कागजी कोरम पूरा करने हेतु बाद में ये धाराएं थोप देती है।

5. ध्रुव राठी का इंटरनेशनल डंका: एनआरआई और वैश्विक मंच पर एसआईआर का विरोध
परिचर्चा के अंतिम चरण में यूट्यूबर ध्रुव राठी द्वारा एंटी-एसआईआर (Anti-SIR) आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने के ऐलान पर मंथन हुआ:

वैश्विक पटल पर किरकिरी: ध्रुव राठी ने 2018 के एक पुराने मामले में समन जारी होने के बाद ऐलान किया है कि वे विदेशों में एनआरआई (NRI) समुदाय के बीच जाकर भारत में चल रही कथित 'वोट चोरी' और एसआईआर की विसंगतियों को उजागर करेंगे।

दांव उल्टा पड़ने का खतरा: पैनलिस्ट्स ने कहा कि सरकार जब भी ऐसे कदम उठाती है, तो वह दांव उसी पर उलटा पड़ता है। विदेशों में रहने वाले भारतीय जो वहां लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को करीब से देख रहे हैं, वे देश के मौजूदा हालात पर सवाल उठा रहे हैं। लंदन सहित कई वैश्विक शहरों में इस मुद्दे पर प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं।




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