जन आंदोलन या किसी की जागीर? शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर बड़ा सवाल
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद CJP के आंदोलन वापसी पर भड़के एक्सपर्ट्स। जानिए निष्पक्ष शो में विशेषज्ञों का पूरा विश्लेषण।
Nishpaksh : देश भर के 100 से अधिक शहरों में फैले ऐतिहासिक 'जेनज़ी (GenZ) छात्र आंदोलन' के भारी दबाव के आगे झुकते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आखिरकार इस्तीफा दे दिया है। लेकिन इस्तीफे के तुरंत बाद जंतर-मंतर से कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा अचानक आंदोलन खत्म करने के ऐलान ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
क्या महज़ एक इस्तीफे से शिक्षा प्रणाली की सड़ांध खत्म हो जाएगी? क्या बिना लिखित गारंटी के आंदोलन वापस लेना सही है? इन्हीं सुलगते सवालों पर 'द फ़ेडरल देश' के खास शो 'निष्पक्ष' में एंकर नीलू व्यास ने देश के जाने-माने विशेषज्ञों के साथ गहन चर्चा की। इस पैनल में वरिष्ठ पत्रकार टीके राजलक्ष्मी और कोल्हापुर से सीधे आंदोलन के बीच से जुड़े पॉलिसी एक्सपर्ट पुष्पराज देशपांडे शामिल हुए।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा: ऐतिहासिक जीत या महज एक ट्रेलर?
शो की शुरुआत करते हुए एंकर नीलू व्यास ने कहा कि जिस दिन का इंतज़ार था, वह आ गया है। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा देश के जेनज़ी और आम छात्रों की बड़ी जीत है। लेकिन इस्तीफे के कुछ ही घंटों बाद टॉलस्टॉय मार्ग पर छात्रों पर हुए पुलिस लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोलों ने सरकार की नीयत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राहुल गांधी ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इसे छात्रों की जीत बताया और कहा कि 'पास्ट कैनॉट फाइट द फ्यूचर' (भूतकाल भविष्य से नहीं लड़ सकता), साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री से छात्रों से माफी मांगने की मांग की।
हालांकि, बहस का मुख्य केंद्र सीजेपी नेता अभिजीत दिपके का वह एकतरफा ऐलान रहा, जिसमें उन्होंने आंदोलन खत्म कर छात्रों से घर लौटने की अपील की।
"यह जन आंदोलन है, किसी के बाप की जागीर नहीं" - पुष्पराज देशपांडे
कोल्हापुर में सैकड़ों छात्रों के कैंडल मार्च के बीच से शो में जुड़े लेखक और पॉलिसी एक्सपर्ट पुष्पराज देशपांडे ने आंदोलन खत्म करने की घोषणा को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने तल्ख लहजे में कहा, "अभिजीत दिपके को इस जन आंदोलन को खत्म करने का ठेका किसने दिया है? यह भारत के करोड़ों छात्रों और जेनज़ी का आंदोलन है। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा केवल एक झांकी है, अभी नरेंद्र शाह (अमित शाह और मोदी) बाकी हैं।"
पुष्पराज ने स्पष्ट किया कि जब तक सरकार की ओर से तीन प्रमुख मांगें पूरी नहीं होतीं, यह क्रांति नहीं रुकेगी:
छात्रों पर लाठीचार्ज का आदेश देने वाले दिल्ली पुलिस कमिश्नर और गृह मंत्री की जवाबदेही तय हो।
जिन 20 से अधिक छात्रों ने इस पूरे घटनाक्रम और दबाव के चलते अपनी जान गंवाई है, उनके परिवारों को 1-1 करोड़ रुपये का मुआवजा मिले।
शिक्षा प्रणाली में आमूल-चूल और ढांचागत बदलाव किए जाएं।
"आंदोलन वापस लेने का फैसला अपरिपक्व और मूर्खतापूर्ण" - टीके राजलक्ष्मी
वरिष्ठ पत्रकार और पॉलिटिकल कमेंटेटर टीके राजलक्ष्मी ने इस पूरे घटनाक्रम को देश की राजनीति के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट (Turning Point) बताया। उन्होंने कहा, "पिछले कई सालों से देश के युवाओं में भारी मायूसी थी। लेकिन इस आंदोलन ने डी-पॉलिटिसाइज़्ड जेनज़ी (GenZ) युवाओं में एक नई राजनीतिक जागरूकता (Consciousness) पैदा कर दी है।"
अभिजीत दिपके द्वारा आंदोलन वापस लेने के फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए राजलक्ष्मी ने इसे 'अपरिपक्व' (Immature) करार दिया। उन्होंने कहा, "सिर्फ एक मंत्री के इस्तीफे से शिक्षा का निजीकरण, पेपर लीक और यूजीसी की फंडिंग में कटौती जैसी ढांचागत समस्याएं खत्म नहीं हो जाएंगी। बिना किसी लिखित गारंटी के आंदोलन वापस लेना निराशाजनक है। शिक्षा में जो 'सड़ांध' (Rot) आ चुकी है, उसे दूर करने के लिए नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) और नई शिक्षा नीति (NEP) को रद्द करना जरूरी है।"
राजलक्ष्मी ने भरोसा जताया कि यह आंदोलन अब सीजेपी या किसी एक व्यक्ति के हाथ से निकल चुका है और लेफ्ट, NSUI समेत कई अन्य क्रेडिबल छात्र संगठन इसे इसके तार्किक अंजाम (Logical Conclusion) तक ले जाएंगे।
आगे क्या? संसद सत्र पर टिकीं निगाहें
चर्चा के अंत में यह साफ निकलकर आया कि 'निष्पक्ष' के दोनों मेहमान इस बात पर एकमत थे कि यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। सरकार द्वारा बिना किसी लिखित आश्वासन के आंदोलनकारियों को खदेड़ने की कोशिश छात्रों के गुस्से को और भड़का रही है। पुष्पराज देशपांडे ने चेतावनी देते हुए कहा कि जो 1942 (भारत छोड़ो आंदोलन) में हुआ था, वही ऊर्जा आज की युवा पीढ़ी में है।
एंकर नीलू व्यास ने कार्यक्रम का समापन इस सवाल के साथ किया कि अब सोमवार से शुरू हो रहे संसद के हंगामेदार सत्र में विपक्ष और इंडिया अलायंस (INDIA Alliance) इस मुद्दे को कैसे उठाएगा? क्या सरकार मंगलवार को कोई लिखित गारंटी देगी या छात्रों का यह 'कैंडल मार्च' एक बड़े राष्ट्रव्यापी सैलाब में बदल जाएगा? यह देखना अभी बाकी है।
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