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चीनी संकट: इथेनॉल नीति और सट्टेबाजी का कच्चा चिट्ठा

'निष्पक्ष' में नीलू व्यास संग विजय जावंधिया और इंद्रजीत सिंह का विश्लेषण: चीनी के ₹75 पार होने, ₹36000 करोड़ घोटाले के आरोप और E20 इथेनॉल नीति का सच।


Nishpaksh: त्योहारी सीजन के मुहाने पर खड़े देश में आम आदमी की रसोई पर महंगाई का सबसे करारा प्रहार हुआ है। रक्षाबंधन से लेकर होली तक चलने वाले इस लंबे त्योहारी दौर में, जिस चीनी के बिना हर घर की मिठास अधूरी रहती है, वही चीनी आज 40 रुपये से उछलकर 75 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है। देश में गहराते इस चीनी संकट, आसमान छूती कीमतों और इसके पीछे की सरकारी नीतियों की विफलता पर डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के विशेष शो 'निष्पक्ष' में एंकर नीलू व्यास ने एक बेहद सघन और विश्लेषणात्मक चर्चा की।


इस गहन चर्चा में महाराष्ट्र के वरिष्ठ किसान नेता विजय जावंधिया और अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष इंद्रजीत सिंह ने हिस्सा लिया। इस चर्चा में चीनी बाजार के गणित, इथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) नीति की खामियों, आयात-निर्यात के विरोधाभास और सट्टेबाजी के खेल का जो कच्चा चिट्ठा खोला गया, उसका विस्तृत और गहन विश्लेषण नीचे प्रस्तुत है।

1. ₹36,000 करोड़ के घोटाले का आरोप: त्योहारी सीजन और किल्लत का गणित
शो में कांग्रेस महासचिव रणदीप सुरजेवाला की प्रेस कॉन्फ्रेंस के आंकड़ों का हवाला देते हुए इस पूरे संकट के पीछे के आर्थिक गणित को समझाया गया:

खपत और मुनाफे का समीकरण: अगस्त से नवंबर (त्योहारी सीजन) के बीच देश भर में लगभग 120 लाख टन (12 मिलियन टन) चीनी की खपत होती है। बाजार में चीनी के दाम में प्रति किलो 30 से 35 रुपये की सीधी वृद्धि की गई है। इस गणित के हिसाब से त्योहारी सीजन के दौरान आम जनता की जेब से सीधे तौर पर 36,000 करोड़ रुपये निकालकर बड़े जमाखोरों और मिल मालिकों की झोली में डाले जा रहे हैं।

जानबूझकर पैदा की गई कृत्रिम किल्लत: चर्चा में यह गंभीर आरोप सामने आया कि सरकार को अप्रैल 2026 से ही चीनी के संभावित उत्पादन घाटे और शॉर्टेज की जानकारी थी। इसके बावजूद जमाखोरों और कालाबाजारियों पर नकेल कसने के बजाय लगभग 32% गन्ने के स्टॉक को ई-20 (E20) फ्यूल के तहत इथेनॉल उत्पादन में झोंक दिया गया, जिससे घरेलू बाजार में चीनी की भारी किल्लत पैदा हो गई।

2. विजय जावंधिया का विश्लेषण: क्रोनी कैपिटलिज्म और सरकारी नियंत्रण की नाकामी
महाराष्ट्र से वरिष्ठ किसान नेता विजय जावंधिया ने इस पूरे संकट के लिए सीधे तौर पर केंद्र सरकार के शीर्ष नेतृत्व और नीतियों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने बिंदुवार प्रशासनिक कमियों को उजागर किया:

फ्री मार्केट का भ्रम और बफर स्टॉक का अभाव
जावंधिया ने स्पष्ट किया कि 1990-91 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भी चीनी उद्योग कभी 'फ्री मार्केट' का हिस्सा नहीं रहा। इसका संपूर्ण नियंत्रण आज भी केंद्र सरकार के हाथ में है:

सरकार ही गन्ने का न्यूनतम बिक्री मूल्य (MSP - फिलहाल ₹31) तय करती है और मिलों के लिए मासिक रिलीज कोटा (जैसे 22 लाख टन) जारी करती है।

सवाल: जब सरकार देश में खाद्यान्न सुरक्षा के लिए गेहूं और चावल का बफर स्टॉक बनाती है, तो चीनी जैसी अति-आवश्यक वस्तु का बफर स्टॉक क्यों नहीं बनाया गया?

निर्यात का गलत फैसला और रुपये का अवमूल्यन
गलत समय पर निर्यात: पिछले दो वर्षों से अल-नीनो और अनिश्चित मानसून के कारण गन्ने का उत्पादन लगातार घट रहा था। इसकी जानकारी होने के बावजूद सरकार ने 2022 में चीनी मिलों को भारी सब्सिडी देकर 110 लाख टन चीनी का निर्यात करने की छूट दी।

रुपये की गिरावट और महंगा आयात: वर्तमान में डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया गिरकर 96 रुपये के स्तर तक पहुंच गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी का भाव लगभग 560 डॉलर प्रति टन है। इस स्थिति में यदि आज चीनी आयात की जाती है, तो वह भारत में लैंडिंग के बाद 65 रुपये प्रति किलो से कम में नहीं पड़ेगी।

रॉ शुगर आयात का खेल: सरकार ने 10 लाख टन 'रॉ शुगर' (कच्ची चीनी) को 0% कस्टम ड्यूटी पर आयात करने की अनुमति तो दी, लेकिन आम जनता के खाने योग्य 'सफेद चीनी' (White Sugar) के आयात की अनुमति नहीं दी। इसका सीधा फायदा देश की बड़ी रिफाइनरियों और कारखानों को कच्चे माल के रूप में मिला, न कि आम उपभोक्ता को।

इथेनॉल नीति: ब्राज़ील की अंधी नकल और नितिन गडकरी की बलि
जावंधिया ने इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति को मूल रूप से भारतीय परिस्थितियों के विपरीत बताया:

सिंचाई बनाम बारिश: ब्राज़ील में गन्ने की खेती पूरी तरह से प्राकृतिक बारिश पर निर्भर है, जबकि भारत में गन्ने की फसल सिंचाई (भूजल व नहरों) पर अत्यधिक निर्भर है। दोनों देशों के कृषि मॉडल की तुलना नहीं की जा सकती।

वादे बनाम हकीकत: 2018 में 'बायोफ्यूल डे' पर प्रधानमंत्री ने 10,000 करोड़ रुपये के निवेश, 12 नए एथेनॉल कारखाने खोलने और 5 लाख रोजगार पैदा करने का वादा किया था। आज जब यह नीति चीनी उत्पादन पर भारी पड़ रही है, तो सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को बलि का बकरा (Scapegoat) बनाया जा रहा है।

3. इंद्रजीत सिंह का पक्ष: आम आदमी की बेबसी और वायदा व्यापार का सट्टा
अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष इंद्रजीत सिंह ने संकट के सामाजिक, ढांचागत और किसान केंद्रित पहलुओं को सामने रखा।

PDS से चीनी गायब और 'वायदा व्यापार' का खेल
गरीबों की ऊर्जा पर डाका: देश की 80 करोड़ आबादी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के राशन पर निर्भर है, लेकिन चीनी को इस प्रणाली से बाहर कर दिया गया है। इंद्रजीत सिंह ने कहा कि संपन्न वर्ग भले ही आधा चम्मच चीनी खाए, लेकिन दिनभर शारीरिक श्रम करने वाले मजदूर और गरीब परिवार के लिए 4 चम्मच चीनी ऊर्जा (कार्बोहाइड्रेट) का सबसे सस्ता साधन है।

वायदा व्यापार (Derivative Trading): उन्होंने कमोडिटी मार्केट में चीनी के वायदा व्यापार पर तत्काल रोक लगाने की मांग की। सट्टेबाज बिना किसी वास्तविक गोदाम स्टॉक के केवल कागजों पर चीनी की खरीद-फरोख्त (Paper Trading) करते हैं, जिससे बाजार में पैनिक और कृत्रिम किल्लत बनती है और दाम अनियंत्रित हो जाते हैं।

मंत्रालयों में तालमेल की कमी
इथेनॉल और चीनी से जुड़े तमाम बड़े नीतिगत फैसले पेट्रोलियम मंत्रालय और सड़क परिवहन मंत्रालय द्वारा लिए जा रहे हैं, जबकि गन्ने का मूल उत्पादक 'कृषि मंत्रालय' इस पूरी नीतिगत प्रक्रिया से पूरी तरह गायब है।

किसानों की बढ़ती लागत और सहकारिता पर कॉरपोरेट कब्जा
लागत का बोझ: गन्ना 11 महीने में तैयार होने वाली फसल है। हरियाणा व यूपी जैसे राज्यों में खाद, बीज, बिजली और मजदूरी की लागत काफी बढ़ चुकी है, लेकिन गन्ने के खरीद मूल्य (SAP/FRP) में बमुश्किल 10 रुपये प्रति क्विंटल की मामूली बढ़ोतरी की गई है।

NCDC Act की आलोचना: इंद्रजीत सिंह ने नए सहकारिता कानून (NCDC Act) को राज्यों के अधिकारों का हनन बताया। उनका आरोप है कि किसानों के लोकतांत्रिक सहकारिता (Cooperative) ढांचे को कॉरपोरेट शेयरहोल्डर्स के फायदे के लिए बदला जा रहा है। यदि किसानों को C2+50% के फार्मूले पर लाभकारी मूल्य नहीं मिला, तो वे गन्ने की खेती छोड़ देंगे, जिससे भविष्य में और बड़ा संकट खड़ा होगा।

'निष्पक्ष' शो की पूरी बहस का लब्बोलुआब यह रहा कि देश में वर्तमान चीनी संकट कोई कुदरती आपदा या अचानक आई कमी नहीं है, बल्कि यह कॉरपोरेट घरानों, निजी मिल मालिकों और सट्टेबाजों को फायदा पहुंचाने के लिए एक सुनियोजित ढांचागत विफलता (Structural Failure) है। सरकार की 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) नीति से पेट्रोल का दाम 1 रुपया भी कम नहीं हुआ, लेकिन इसने देश के 140 करोड़ नागरिकों की थाली और चाय से चीनी की मिठास जरूर छीन ली है।


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