अमेरिका का दबाव या सरकार की रणनीति? FCRA पर बड़ा खेल
एंकर नीलू व्यास और वरिष्ठ पत्रकार जावेद अंसारी का विश्लेषण: जानिए आखिर क्यों अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच FCRA संशोधन बिल को JPC के पास भेजना पड़ा और क्यों संसद के मानसून सत्र में 1952 के बाद ऐसी अनोखी स्थिति बनी
Nishpaksh: संसद का मानसून सत्र हंगामे, वॉकआउट और गंभीर राजनीतिक गतिरोध के बीच समाप्त होने की ओर बढ़ रहा है। द फ़ेडरल देश के शो निष्पक्ष में एंकर नीलू व्यास के साथ विशेष चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार जावेद अंसारी ने संसद के भीतर सरकार की बदलती रणनीतियों, विपक्ष के रुख, एफसीआरए (FCRA) संशोधन बिल और देश में गरमाते छात्र आंदोलनों पर एक विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
संसद में सरकार की रणनीति और विपक्ष का आक्रामक रुख
चर्चा की शुरुआत करते हुए एंकर नीलू व्यास ने ध्यान दिलाया कि गृह मंत्री अमित शाह ने पहले संसद में विपक्ष के सवालों का जवाब देने की बात कही थी, लेकिन जब सदन की कार्यवाही शुरू हुई, तो सरकार ने विवादित एफसीआरए (FCRA) संशोधन बिल को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने का प्रस्ताव रख दिया।
इसके जवाब में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी छात्रों पर हुई पुलिसिया कार्रवाई और पैलेट गन चलाए जाने के मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए सरकार से सीधे और स्पष्ट जवाब की मांग की।
FCRA संशोधन बिल: अंतराष्ट्रीय दबाव और जेपीसी (JPC) का दांव
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस सांसद के. सी. वेणुगोपाल जैसे विपक्षी नेताओं ने FCRA संशोधन बिल को अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से ईसाई समुदाय के संस्थानों को लक्षित करने वाला बताते हुए इसे पूरी तरह वापस लेने की मांग की।
वरिष्ठ पत्रकार जावेद अंसारी ने इस कदम के पीछे के राजनीतिक और कूटनीतिक कारणों को उजागर करते हुए बताया कि सरकार द्वारा बिल को जेपीसी में भेजने का एक बड़ा कारण अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU, UK) जैसे पश्चिमी देशों का कूटनीतिक दबाव हो सकता है। यह बिल मुख्य रूप से ईसाई समुदाय द्वारा संचालित सामाजिक और शैक्षणिक संस्थानों को प्रभावित करता है।
छात्र आंदोलन और उत्तर प्रदेश की राजनीति
जावेद अंसारी के अनुसार, दिल्ली से लेकर रांची और यूपी तक प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली, पेपर लीक (जैसे यूपी दरोगा भर्ती और रेलवे) और छात्रों पर हुआ लाठीचार्ज अब एक बड़ा राष्ट्रव्यापी राजनीतिक मुद्दा बन चुके हैं। आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में एफसीआरए बिल की तुलना में छात्रों का असंतोष, बेरोजगारी और 'चंदा चोरी' जैसे मुद्दे जनता के बीच अधिक प्रभाव डालेंगे।
1952 के बाद पहली बार: सदन से शीर्ष नेताओं की अभूतपूर्व अनुपस्थिति
विपक्षी नेताओं जयराम रमेश और गौरव गोगोई का हवाला देते हुए चर्चा में यह गंभीर मुद्दा उठाया गया कि 1952 के बाद यह पहला अवसर है जब देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री दोनों पूरे मानसून सत्र के दौरान लोकसभा या राज्यसभा की कार्यवाही में उपस्थित नहीं रहे।
जावेद अंसारी ने इसे भारतीय संसदीय इतिहास की एक अजीबोगरीब स्थिति करार देते हुए कहा कि शीर्ष नेता संसद परिसर में मौजूद रहने के बावजूद सदन के भीतर विपक्ष के तीखे सवालों का सामना करने नहीं आए।
महिला आरक्षण और परिसीमन (Delimitation)
चर्चा में महिला आरक्षण और परिसीमन के मुद्दे पर भी बात हुई। जावेद अंसारी का मानना है कि यह मुद्दा फिलहाल ठंडे बस्ते में चला गया है, क्योंकि जब तक देश में आगामी जनगणना (Census) की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक परिसीमन और महिला आरक्षण को व्यावहारिक रूप से लागू करना संभव नहीं है।
विभिन्न मुद्दों पर सरकार और विपक्ष का रुख
1. छात्रों पर हुई कार्रवाई का मुद्दा:
इस मुद्दे पर विपक्ष की स्थिति स्पष्ट थी; राहुल गांधी ने सदन में पैलेट गन चलाने और बर्बरता करने वालों पर सीधी जवाबदेही तय करने की मांग की। वहीं दूसरी तरफ, सरकार ने इस मुद्दे पर सीधा जवाब देने से परहेज किया।
2. FCRA संशोधन बिल:
विपक्षी दलों ने इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताते हुए बिल को पूरी तरह वापस लेने की मांग उठाई। चौतरफा विपक्षी हमले और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच सरकार ने बिल को JPC के पास भेजने का कदम उठाया।
3. संसदीय उपस्थिति का मुद्दा:
विपक्ष ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की सदन से लगातार अनुपस्थिति पर गंभीर सवाल उठाए। इसके जवाब में सत्ता पक्ष के शीर्ष नेता संसद परिसर में तो मौजूद रहे, लेकिन वे सदन की मुख्य चर्चा में भाग लेने नहीं आए।
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