झारखंड में JPSC पर फूटा गुस्सा: ब्लैकलिस्टेड एजेंसी और होटल का खेल बेनकाब
'द फ़ेडरल देश' के शो 'निष्पक्ष' में एंकर नीलू व्यास के साथ जानिए JPSC परीक्षा धांधली, ब्लैकलिस्टेड कंपनी TDPL और OMR शीट घोटाले की पूरी जमीनी पड़ताल।
Nishpaksh: झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षाओं को लेकर राज्य में उपजा जनाक्रोश और असंतोष का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर विभिन्न राज्यों के प्रतियोगी छात्रों के आंदोलनों के बाद अब इस विरोध का मुख्य केंद्र झारखंड की राजधानी रांची बन गया है। डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के विशेष शो 'निष्पक्ष' में वरिष्ठ एंकर नीलू व्यास ने झारखंड के दो वरिष्ठ पत्रकारों मनोज प्रसाद (संपादक, झारखंड स्टेट न्यूज़ व पूर्व पत्रकार, इंडियन एक्सप्रेस) और शाहनवाज़ हसन के साथ इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दे पर गहन पड़ताल की।
15 दिनों से सड़कों पर छात्र: अनशन, डर और डराने का आरोप
वरिष्ठ पत्रकार शाहनवाज़ हसन ने जमीनी हकीकत बयां करते हुए बताया कि राज्य भर के अभ्यर्थी और प्रतियोगी छात्र पिछले 15 दिनों से लगातार आंदोलनरत हैं। कई मेधावी छात्र आमरण अनशन और भूख हड़ताल पर बैठे हुए हैं।
छात्रों की मुख्य माँगे और शिकायतें निम्नलिखित हैं:
14वीं JPSC परीक्षा का रद्दकरण: प्रारंभिक परीक्षा (PT) में बड़े पैमाने पर हुई गड़बड़ियों और धांधलियों के उजागर होने के बाद इसे पूरी तरह रद्द करने की मांग।
CBI व ED द्वारा स्वतंत्र जांच: राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष CID जांच प्रक्रिया से छात्र आश्वस्त नहीं हैं। छात्रों का तर्क है कि जब घोटाले के तार अंतरराज्यीय नेटवर्क, बड़े वित्तीय लेनदेन और भू-माफिया/रिश्वतखोरी से जुड़े हैं, तो निष्पक्षता के लिए केंद्रीय जांच एजेंसियों (CBI और ED) की दखल अनिवार्य है।
बंद कमरों में डराने-धमकाने का आरोप: शाहनवाज़ हसन ने खुलासा किया कि अधिकारियों और मंत्रियों के साथ हुई वार्ताओं के दौरान प्रतिनिधिमंडल में शामिल छात्रों को बंद कमरों में कथित तौर पर डराया और धमकाया गया। इसी भय के कारण छात्रों को वार्ता टेबल पर अपने साथ पत्रकारों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं को ले जाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
ब्लैकलिस्टेड एजेंसी TDPL की नियुक्ति: OMR शीट और होटलों से खेला गया खेल
वरिष्ठ पत्रकार मनोज प्रसाद ने आयोग और परीक्षा संचालन प्रक्रिया की अंदरूनी परतों को खोलते हुए बताया कि यह मामला केवल किसी एक पर्चे के लीक होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक संगठित संस्थागत अपराध है।
मनोज प्रसाद के विश्लेषणात्मक बिंदु:
काली सूची में दर्ज एजेंसी को ठेका: JPSC बोर्ड और चयन समिति ने प्रारंभिक परीक्षा के संपादन का जिम्मा TDPL (टीडीपीएल) नामक एजेंसी को सौंपा। चौंकाने वाली बात यह है कि यह एजेंसी पहले से ही उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे पड़ोसी राज्यों में विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में घपले-घोटालों के चलते ब्लैकलिस्टेड (काली सूची में दर्ज) थी।
OMR शीट में दोहरे स्तर का हेरफेर: जांच और सीआईडी द्वारा जब्त दस्तावेजों के अनुसार, परीक्षार्थियों की ऑप्टिकल मार्क रिकग्निशन (OMR) शीट को स्कैन करने में बड़ा फर्जीवाड़ा हुआ। थ्री-स्टार और टू-स्टार होटलों के कमरों को ठिकाना बनाकर खाली छोड़ी गई OMR शीट को भरा गया और अंकों में मैन्युपुलेशन (हेरफेर) किया गया।
करोड़ों का बाजार और भूमि हस्तांतरण: परीक्षा में अनुचित लाभ पहुँचाने के बदले अभ्यर्थियों से ₹25 लाख से लेकर ₹40 लाख तक की भारी-भरकम रिश्वत मांगी गई। कई मामलों में नकद राशि के अलावा रिश्वत के रूप में जमीनों के दस्तावेज तक लेने की बात सामने आई है।
संवैधानिक खामियाँ: अनुच्छेद 315-316 और 'गणेश परिक्रमा' की संस्कृति
चर्चा के दौरान मनोज प्रसाद ने देश के भर्ती आयोगों के संवैधानिक ढांचे पर भी बड़ा सवाल खड़ा किया। उन्होंने भारतीय संविधान के भाग 14 (अध्याय 2) के अंतर्गत अनुच्छेद 315 और 316 का उल्लेख करते हुए बताया कि संघ और राज्य लोक सेवा आयोगों के अध्यक्षों एवं सदस्यों की नियुक्ति के लिए कोई ठोस, पारदर्शी और न्यूनतम शैक्षिक/प्रशासनिक मापदंड तय नहीं किया गया है।
राजनीतिक नियुक्तियाँ: राज्य सरकारों और मुख्यमंत्रियों को यह सर्वाधिकार मिला हुआ है कि वे 62 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को आयोग का अध्यक्ष या सदस्य नियुक्त कर दें। इसके कारण योग्यता और क्षमता के बजाय 'राजनीतिक व निष्ठावान परिक्रमा' (गणेश परिक्रमा) करने वाले लोगों को इन पदों पर बैठा दिया जाता है।
अस्थाई व अनुभवहीन नेतृत्व: कई सेवानिवृत्त नौकरशाहों को महज 1 से 2 साल के कार्यकाल के लिए अध्यक्ष बनाया जाता है। इतने कम समय में वे संस्थागत सुधार करने के बजाय केवल औपचारिकता पूरी करते हैं या विवादों से घिर जाते हैं।
इतिहास का काला पन्ना: झारखंड गठन के 26 वर्षों में JPSC बमुश्किल 7 से 8 बार ही परीक्षाएं संचालित कर पाया है, जबकि नियमानुसार यह प्रक्रिया प्रतिवर्ष आयोजित होनी चाहिए।
व्यवस्था की सड़न: शिक्षकों से लेकर क्लर्क बहाली तक में दुकानें
वरिष्ठ पत्रकार शाहनवाज़ हसन ने कहा कि यह असंतोष केवल JPSC सिविल सेवा परीक्षा तक सीमित नहीं है। राज्य में चाहे प्राथमिक/माध्यमिक शिक्षकों की बहाली हो, क्लर्क-स्टेनोग्राफर की परीक्षा हो या फिर JSSC द्वारा आयोजित अन्य तकनीकी परीक्षाएं—हर जगह "नौकरी की दुकानें" खुली हुई हैं, जहाँ 5 लाख से 20 लाख रुपये की बोलियाँ लगती हैं।
सालों-साल तैयारी करने वाले कई प्रतिभावान छात्र 50-55 वर्ष की आयु सीमा पार कर अवसाद (डिप्रेशन) का शिकार हो चुके हैं और उनका भविष्य अंधकारमय हो गया है।
आगे की राह: क्या हेमंत सोरेन सरकार दिखाएगी राजनीतिक इच्छाशक्ति?
कार्यक्रम के अंत में एंकर नीलू व्यास ने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि जब तक शीर्ष स्तर पर व्यापक सुधार नहीं होंगे, तब तक केवल अध्यक्षों को बदलने या गिरफ्तारियाँ करने से व्यवस्था की सड़न खत्म नहीं होगी।
प्रमुख आवश्यकताएँ:
राजनीतिक इच्छाशक्ति (Political Will): सत्ता पक्ष और विपक्ष को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर मेधावी युवाओं के हित में कठोर कदम उठाने होंगे।
स्वायत्त और सक्षम आयोग: JPSC बोर्ड में केवल उच्च योग्यता, सत्यनिष्ठा और प्रशासनिक दक्षता वाले व्यक्तियों की निष्पक्ष आधार पर नियुक्ति हो।
पारदर्शी और डिजिटल प्रक्रिया: भविष्य की सभी परीक्षाओं के संचालन के लिए सख्त नीतियाँ और फुल-प्रूफ पारदर्शी तंत्र विकसित किया जाए।

