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सपा का नया PDA फॉर्मूला: ब्राह्मणों को साधने की रणनीति कितनी कारगर?

'द फ़ेडरल देश' के शो 'निष्पक्ष' में नीलू व्यास के साथ देखिए सपा की नई ब्राह्मण आउटरीच रणनीति, अखिलेश यादव के 'पीडीए' के नए अर्थ और 2027 के सियासी समीकरण का विश्लेषण।


Nishpaksh: 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) ने अपनी राजनीतिक बिसात बिछानी शुरू कर दी है। 'छोटे लोहिया' के नाम से मशहूर जनेश्वर मिश्र की जयंती के बहाने सपा ने राज्य के ब्राह्मण मतदाताओं को साधने के लिए एक बड़ा 'मेगा आउटरीच' अभियान चलाया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने 'पीडीए' (PDA) फॉर्मूले को एक नया और भावनात्मक विस्तार दिया है, जिसने यूपी की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है।

'द फ़ेडरल देश' के खास कार्यक्रम 'निष्पक्ष' में एंकर नीलू व्यास ने इसी नए सियासी प्रयोग पर एक विस्तृत और बेबाक चर्चा की। इस चर्चा में समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता सर्वेश त्रिपाठी, और वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता व शाहिरा नईम शामिल हुईं, जिन्होंने इस पूरी रणनीति का हर पहलू से विश्लेषण किया।

एंकर नीलू व्यास: क्या रणनीति बदल रही है सपा?

चर्चा की शुरुआत करते हुए नीलू व्यास ने बताया कि जनेश्वर मिश्र की जयंती पर सपा ने लखनऊ में हजारों ब्राह्मणों को जुटाकर एक बड़ा शक्ति प्रदर्शन किया है।

अखिलेश यादव ने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नया अर्थ गढ़ते हुए इसे "P- प्रेम, D- दयावान और A- अपनापन" बताया है।

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यह महज एक आयोजन है या 2027 के लिए सपा की कोई सोची-समझी ब्राह्मण आउटरीच रणनीति है?

सपा का आक्रामक पलटवार: 'बीजेपी राज में ब्राह्मणों का हो रहा उत्पीड़न'

सपा प्रवक्ता सर्वेश त्रिपाठी ने पार्टी के इस कदम का पुरजोर बचाव किया और भाजपा पर बेहद गंभीर आरोप लगाए:

'बीजेपी डरी हुई है': उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा इस आयोजन से इतनी डरी हुई थी कि उसने जनेश्वर मिश्र पार्क में कार्यक्रम की अनुमति ही नहीं दी, जिसके कारण पार्टी कार्यालय पर यह आयोजन करना पड़ा।

'ब्राह्मणों का अपमान और एनकाउंटर': त्रिपाठी ने दावा किया कि योगी सरकार में ब्राह्मण समाज खुद को पूरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहा है। उन्होंने सीधा आरोप लगाया कि मुसलमानों के बाद यूपी में सबसे ज्यादा 'फर्जी एनकाउंटर' ब्राह्मणों के ही हुए हैं।

'नेताओं की अनदेखी': उन्होंने गोरखपुर के उपेंद्र शुक्ला, विनय शंकर तिवारी और पंडित हरिशंकर तिवारी जैसे कद्दावर ब्राह्मण नेताओं का उदाहरण देते हुए कहा कि भाजपा ने इन नेताओं और इनके परिवारों को हाशिए पर धकेल दिया। बनारस के एक पंडित जी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें झूठे मुकदमों में जेल तक भेज दिया गया।

'सपा दे रही असली सम्मान': त्रिपाठी ने कहा कि सपा ने माता प्रसाद पांडेय को नेता प्रतिपक्ष बनाकर ब्राह्मण समाज को असली सम्मान दिया है, जबकि भाजपा उन्हें केवल वोट बैंक समझती है।

वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता: 'ब्राह्मण ओपिनियन मेकर हैं, योगी सरकार से हैं नाराज़'

वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता ने इसे सपा की एक बेहद सोची-समझी और सधी हुई चुनावी तैयारी बताया:

'सत्ता में एक वर्ग का वर्चस्व': उन्होंने विश्लेषण किया कि वर्तमान योगी सरकार में ब्यूरोक्रेसी से लेकर सत्ता के गलियारों तक ठाकुरों का वर्चस्व माना जाता है, जिससे ब्राह्मण समुदाय खुद को उत्तर प्रदेश में 'आइसोलेटेड' (अलग-थलग) महसूस कर रहा है और उनमें गहरी नाराजगी है।

'माहौल बनाने की ताकत': सुमन गुप्ता ने स्पष्ट किया कि ब्राह्मणों का वोट प्रतिशत भले ही बहुत ज्यादा न हो, लेकिन वे समाज में 'ओपिनियन मेकर' (राय बनाने वाले) होते हैं। चाय की दुकानों से लेकर चौपालों तक चुनाव का 'नैरेटिव' सेट करने में इनकी अहम भूमिका होती है।

'2007 की सोशल इंजीनियरिंग': उन्होंने मायावती के 2007 के फॉर्मूले की याद दिलाते हुए कहा कि सपा अब उसी तर्ज पर 'दलित-पिछड़ा-ब्राह्मण' का एक नया गठजोड़ बनाने की कोशिश कर रही है।

वरिष्ठ पत्रकार शाहिरा नईम: 'यह अखिलेश के लिए एक टाइट रोप वॉक (कठिन डगर) है'

वरिष्ठ पत्रकार शाहिरा नईम ने सपा की इस रणनीति के राजनीतिक खतरों की ओर आगाह किया:

'वैचारिक टकराव': उन्होंने कहा कि सपा की मूल विचारधारा 'सामाजिक न्याय' (Social Justice) पर आधारित है। जब पीडीए (पिछड़े और दलित) के साथ सवर्ण (ब्राह्मण) जोड़े जाते हैं, तो पार्टी के भीतर वैचारिक विरोधाभास पैदा होने का खतरा रहता है।

'मूल वोटबैंक खिसकने का डर': शाहिरा नईम ने चेताया कि ब्राह्मणों को साधने की इस कोशिश में कहीं ऐसा न हो कि अखिलेश यादव का मूल वोटबैंक (पिछड़े और अल्पसंख्यक) डाइल्यूट (कमजोर) हो जाए।

उन्होंने इसे अखिलेश यादव के लिए एक 'टाइट रोप वॉक' (रस्सी पर चलने जैसा) बताया, जहां संतुलन जरा भी बिगड़ा तो राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

2027 की बिसात तैयार

'निष्पक्ष' शो की इस चर्चा से यह साफ है कि अखिलेश यादव अब केवल 'पीडीए' तक सीमित नहीं रहना चाहते। जनेश्वर मिश्र की जयंती के जरिए उन्होंने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि 2027 के चुनाव में वे योगी सरकार से नाराज सवर्णों, विशेषकर ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़कर एक अजेय सामाजिक गठबंधन बनाने की तैयारी में हैं। लेकिन क्या वे अपने मूल कोर वोटर्स और ब्राह्मणों के बीच संतुलन साध पाएंगे? यूपी का अगला विधानसभा चुनाव इसी 'सोशल इंजीनियरिंग' की सफलता या विफलता पर निर्भर करेगा।

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