संसद का मानसून सत्र स्वाहा: वाशआउट पर घिरी सरकार, राम मंदिर चंदा विवाद
'द फ़ेडरल देश' के शो 'निष्पक्ष' में नीलू व्यास और टी.के. राजलक्ष्मी की चर्चा। जानिए मानसून सत्र के धुले होने, राम मंदिर चंदा विवाद और BJP की चुनौतियों का सच।
Nishpaksh: 'द फ़ेडरल देश' के लोकप्रिय कार्यक्रम 'निष्पक्ष' में एंकर नीलू व्यास ने संसद के मानसून सत्र के हंगामेदार अंत और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सामने आने वाली आगामी राजनीतिक चुनौतियों पर वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक टी.के. राजलक्ष्मी के साथ विस्तार से चर्चा की। चर्चा का मुख्य केंद्र सरकार का बैकफुट पर होना, विपक्ष का आक्रामक रुख और राम मंदिर निर्माण में चंदा चोरी के आरोपों का आगामी चुनावों पर प्रभाव रहा।
संसद का सत्र धुला: सरकार और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप
शो की शुरुआत में नीलू व्यास ने बताया कि मानसून सत्र लगभग पूरी तरह से हंगामे की भेंट चढ़ गया। सत्र के आखिरी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सदन में आए, 'वंदे मातरम' में हिस्सा लिया और चले गए। इसके बाद संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर संसद न चलने का पूरा ठीकरा कांग्रेस और विपक्ष पर फोड़ दिया।
इस पर टी.के. राजलक्ष्मी ने स्पष्ट किया कि सरकार इस पूरे सत्र में 'बैकफुट' पर नजर आई। उन्होंने कहा कि 20 जुलाई को हुए पुलिस एक्शन (पैलेट गन के इस्तेमाल) और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर सरकार के पास कोई जवाब नहीं था। सरकार विपक्ष और 'जेन जी' (Gen Z) युवाओं द्वारा मांगे जा रहे स्पष्टीकरण से बचती रही और अंतिम समय में चर्चा के लिए तैयार होने का दिखावा किया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि चर्चा किस मुद्दे पर होगी।
विपक्ष का प्रतीकात्मक विरोध और आक्रामकता
नीलू व्यास ने सदन के भीतर हुए एक अनोखे विरोध का जिक्र किया, जहां कांग्रेस नेता पवन खेड़ा एक काले रंग का 'स्टफ्ड टॉय' (बंदर) लेकर आए थे। उन्होंने "56 इंच का छोटा बंदर, सदन के आओ अंदर" जैसे नारों के साथ सरकार पर तंज कसा। राजलक्ष्मी ने इसे विपक्ष की हताशा और सरकार द्वारा जवाबदेही से भागने का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि जब चेयर (पीठासीन अधिकारी) और सरकार विपक्ष की वाजिब मांगों को लगातार अनसुना करते हैं, तो ऐसे प्रतीकात्मक विरोध सामने आते हैं।
बीजेपी के लिए आगे की राह: चुनौतियां और संकट
चर्चा के दौरान बीजेपी के लिए आगामी चुनौतियों को लेकर कई गंभीर बिंदु सामने आए:
जनता के सवालों का सामना: जब सांसद अपने-अपने चुनाव क्षेत्रों में वापस लौटेंगे, तो उन्हें शिक्षा के बढ़ते निजीकरण, युवाओं पर कर्ज के बोझ और बेरोजगारी जैसे ज्वलंत मुद्दों पर जनता के गुस्से का सामना करना पड़ेगा।
राम मंदिर 'चंदा चोरी' का मुद्दा: राजलक्ष्मी ने इसे बीजेपी और आरएसएस के लिए एक बड़ा संकट बताया। उन्होंने कहा कि चंदा चोरी के आरोपों ने आस्थावान लोगों की भावनाओं को गहरी ठेस पहुंचाई है। इससे पार्टी का 'कोर नैरेटिव' कमजोर हुआ है और लोग महसूस कर रहे हैं कि भ्रष्टाचार निचले स्तर पर नहीं, बल्कि ऊपरी स्तर से हुआ है।
यूपी चुनाव और योगी आदित्यनाथ की चुप्पी: आगामी उत्तर प्रदेश चुनावों को लेकर राजलक्ष्मी ने कहा कि बीजेपी के लिए डैमेज कंट्रोल करना अब बहुत मुश्किल होगा। उन्होंने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की हालिया चुप्पी की ओर भी इशारा किया, जो केवल कुछ औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित नजर आ रहे हैं।
बिना चर्चा के पास हुए महत्वपूर्ण बिल
हंगामे के बावजूद सरकार ने कई महत्वपूर्ण बिल बिना किसी चर्चा के पास करा लिए। इनमें माइन्स एंड मिनरल्स, ट्रिब्यूनल बिल और जन्म-मृत्यु पंजीकरण संशोधन बिल शामिल हैं। एफसीआरए (FCRA) बिल को लेकर खुद बीजेपी के भीतर (विशेषकर नॉर्थ-ईस्ट के सांसदों द्वारा) और सहयोगियों द्वारा विरोध के बाद उसे जेपीसी (JPC) के पास भेजना पड़ा। राजलक्ष्मी ने इसे सरकार की डेलिकेट (नाजुक) स्थिति का प्रमाण बताया।
मीडिया की भूमिका पर सवाल
अंत में, टी.के. राजलक्ष्मी ने वर्तमान मीडिया की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने यूपीए (UPA) सरकार के दौर को याद करते हुए कहा कि उस समय पत्रकार सरकार से संसद चलाने की जिम्मेदारी पर सीधे सवाल करते थे। लेकिन आज, कोई भी पत्रकार सत्ता पक्ष से यह नहीं पूछता कि सदन को सुचारू रूप से चलाना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है, न कि केवल विपक्ष पर आरोप मढ़ना।
'निष्पक्ष' की इस चर्चा से यह निष्कर्ष निकलता है कि मानसून सत्र का बिना कामकाज के खत्म होना केवल एक संसदीय विफलता नहीं है, बल्कि यह सरकार की उस असहज स्थिति को दर्शाता है जहां वह जवाबदेही से बच रही है। शिक्षा, रोजगार और भ्रष्टाचार के मुद्दों को लेकर युवाओं और आम जनता में बढ़ता रोष आगामी राज्य चुनावों में बीजेपी के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होने वाला है।
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