लाल किले से PM मोदी का भाषण: क्या है राजनीतिक मायने?
पीएम मोदी के लगभग 75 मिनट के इस भाषण में उन्होंने कई मुद्दों पर बात की लेकिन कई मुद्दों पर चुप्पी भी साधी। क्या उनके भाषण में कुछ नयापन था या सिर्फ घिसीपिटी बातें।
NISPAKSH: 80वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले के प्राचीर से अपना 13वां भाषण दिया। लगभग 75 मिनट लंबे इस संबोधन पर डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म ‘द फ़ेडरल देश’ के विशेष शो ‘निष्पक्ष’ में बेहद अहम और गहन चर्चा हुई। वरिष्ठ एंकर नीलू व्यास ने दो विशेष मेहमानों—आयुष्मान पांडे (डॉ. मनमोहन सिंह फेलो) और सिद्धार्थ आनंद (राजनीतिक विश्लेषक)—के साथ प्रधानमंत्री के भाषण के मायने, कही-अनकही बातों और उसके राजनीतिक संदेश की विस्तृत वैचारिक समीक्षा की।
एंकर नीलू व्यास का प्रारंभिक अवलोकन
चर्चा की शुरुआत में नीलू व्यास ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि प्रधानमंत्री के भाषण में कुछ भी नया नहीं था। फिर भी उन्होंने कुछ ऐसी बातें कही जो मोदी सरकार की मंशा के बारे में साफ संकेत देती हैं। प्रधानमंत्री ने ‘दिमागी नक्सलियों’ की चर्चा करते हुए कहा कि उन्हें पहचानना होगा और अलग-थलग करना होगा। महिला आरक्षण बिल पर बात करते हुए उन्होंने राजनीतिक दलों से सहयोग की अपील की और इस तरह महिला आरक्षण की जिम्मेदारी विपक्ष के कंधों पर डाल दी। इस भाषण को कुछ समकालीन घटनाओं के साथ जोड़कर देखना भी जरूरी है—शनिवार सुबह ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का इंस्टाग्राम अकाउंट ब्लॉक कर दिया गया, वहीं सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपक ने अपनी घोषणा के मुताबिक ‘स्कूल ठीक करो’ कैंपेन लॉन्च कर दिया।
आयुष्मान पांडे (डॉ. मनमोहन सिंह फेलो) का विश्लेषण
75 मिनट के भाषण के दौरान भाजपा के नेताओं की बॉडी लैंग्वेज ढीली-ढाली नजर आ रही थी। आम धारणा यह थी कि प्रधानमंत्री उन सवालों को खारिज करेंगे जो उनसे या गृहमंत्री अमित शाह से पूछे जा रहे थे। लेकिन मोदी ने किसी भी विवादास्पद मुद्दे का सीधा जवाब नहीं दिया और 2047 तक भारत को विकसित बनाने के लक्ष्य पर बात करते रहे। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया। इसका अंग्रेजी अनुवाद ‘Intellectual Naxal’ होता है—यानी वे कह रहे हैं कि बौद्धिक नक्सली युवाओं को भटका रहे हैं। भाषण के अंत में उन्होंने सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल और पंडित नेहरू के विजन को आगे बढ़ाने की बात कही। आयुष्मान पांडे के अनुसार, यह दिखाता है कि उनके पास कहने के लिए नया कुछ नहीं बचा है। अब उनका एकमात्र फोकस ‘इंटेलेक्चुअल नक्सल’ (जिसका अर्थ शायद लेफ्ट से है) का दमन करना रह गया है। आज के भाषण में उनकी निराशा साफ झलक रही थी और इस सरकार की साख खत्म होने का खतरा बढ़ता दिख रहा है।
सिद्धार्थ आनंद (राजनीतिक विश्लेषक) का विश्लेषण
पिछले डेढ़ महीने में जेन-जी आंदोलन ने भाजपा को भ्रम की स्थिति में ला दिया है और यही भ्रम प्रधानमंत्री के भाषण में साफ दिखाई दिया। यह स्वतंत्रता दिवस 140 करोड़ भारतीयों का है। सवाल यह है कि आप सभी भारतीयों की बात करेंगे या सिर्फ कुछ ‘नक्सलियों’ की? इसका मतलब साफ है कि सरकार को स्थिति समझ नहीं आ रही। सच्ची स्वतंत्रता का मतलब आज हमें जेन-जी ने बताया है। आज की तारीख में जेन-जी अगर कोई बात उठाती है तो उसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। कॉकरोच पार्टी के संस्थापक ने स्कूल में जाकर झंडा फहराया और ‘स्कूल ठीक करो’ कार्यक्रम किया। पार्टी की तरफ से किया गया उसका ट्वीट तीन घंटे में लाखों लोगों तक पहुंच गया, जबकि भारत के प्रधानमंत्री का भाषण उनके अपने यूट्यूब चैनल पर 40 हजार लोग भी नहीं देख पाए।

