राहुल गांधी का मास्टर स्ट्रोक या सियासी दांव? सुप्रीम कोर्ट मार्च से दिल्ली में मचा हड़कंप
राहुल गांधी के नेतृत्व में दिल्ली में निकाले गए सुप्रीम कोर्ट मार्च ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR प्रक्रिया के विवाद को राष्ट्रीय स्तर पर एक नया मोड़ दे दिया है। बाराखंभा रोड से सुप्रीम कोर्ट तक हुए इस प्रदर्शन में कांग्रेस, सपा और अन्य विपक्षी दलों के दिग्गज एक बस में सवार होकर शामिल हुए।
दिल्ली की सड़कों पर आज जो राजनीतिक बवंडर उठा, उसने देश की सियासत का तापमान अचानक कई डिग्री बढ़ा दिया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष के सुप्रीम कोर्ट मार्च ने चुनाव आयोग के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शन को एक नए और निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या राहुल गांधी का यह कदम कोई बड़ा राजनीतिक मास्टर स्ट्रोक साबित होगा, जो आने वाले दिनों में सत्ता के गलियारों में बड़े बदलाव लाएगा?
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और एसआईआर (SIR) प्रक्रिया में हुई कथित धांधली को लेकर विपक्ष अब पूरी आक्रामक मुद्रा में है। दिल्ली के बाराखंभा रोड से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक निकाले गए इस मार्च ने साबित कर दिया है कि विपक्षी गठबंधन अब इस मुद्दे को इतनी आसानी से छोड़ने वाला नहीं है। राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और कई अन्य दिग्गज नेताओं का एक ही बस में सवार होकर सड़क पर उतरना इस बात का साफ संकेत है कि विपक्षी दल इस लड़ाई को पूरी एकजुटता के साथ लड़ रहे हैं।
SIR प्रक्रिया पर उठ रहे गंभीर सवाल और बढ़ता दबाव
इस पूरे सियासी संग्राम के केंद्र में एसआईआर (SIR) प्रक्रिया और मतदाता सूचियों में कथित अनियमितताएं हैं। विपक्ष लगातार यह आरोप लगा रहा है कि चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता से गंभीर खिलवाड़ किया जा रहा है। विपक्षी नेताओं का साफ कहना है कि देश के लोकतंत्र की रक्षा के लिए यह जरूरी है कि चुनाव आयोग पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से काम करे। जब मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली पर ही बड़े सवालिया निशान खड़े होने लगें, तो जनता का लोकतंत्र से भरोसा उठने लगता है।
हालांकि, इन राजनीतिक आरोपों और दावों की जमीनी हकीकत अपनी जगह है, लेकिन जिस तरह से देश के अलग-अलग राज्यों—राजस्थान, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर से हजारों कार्यकर्ता दिल्ली पहुंचे हैं, उसने सरकार और आयोग की मुश्किलें जरूर बढ़ा दी हैं। 'वोट चोर' के नारों और हाथों में संविधान की प्रतियां लेकर सड़कों पर उतरे कार्यकर्ताओं ने यह दिखा दिया है कि उनका यह आक्रोश अब थमने वाला नहीं है।
सड़क से अदालत तक: क्या सरकार झुकेगी?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी इस लड़ाई को सड़क से लेकर अदालत के चौखट तक ले जाकर सरकार और चुनाव आयोग को घेरने में पूरी तरह कामयाब हो पाएंगे? सुप्रीम कोर्ट प्रशासन की ओर से भले ही याचिका दाखिल करने की बात कही गई हो, लेकिन विपक्षी नेताओं ने साफ कर दिया है कि वे कानूनी दांव-पेच के साथ-साथ जनआंदोलन का दबाव भी बनाए रखेंगे।
विपक्ष ने दो टूक कह दिया है कि जब तक ज्ञानेश कुमार अपने पद से इस्तीफा नहीं देते, उनका यह विरोध प्रदर्शन जारी रहेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रदर्शन सिर्फ एक व्यक्ति के इस्तीफे की मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाले चुनावी मैदान में एक बड़े नैरेटिव को सेट करने की कोशिश है। अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि सरकार और चुनाव आयोग इस भारी राजनीतिक दबाव के आगे क्या रुख अपनाते हैं और क्या CEC की कुर्सी पर वाकई कोई संकट मंडरा रहा है।

