राम मंदिर दान घोटाले पर घेराबंदी, अखिलेश बोले- 'डोनेशन फ़र्स्ट' है भाजपा
2024 लोकसभा चुनाव के परिणामों पारंपरिक गढ़ में घट रही भाजपा की बढ़त, चुनावी राजनीति से इतर अब सीधे राम भक्तों की आस्था और श्रद्धा से जुड़ गया है यह पूरा मामला.
Nishpaksh: अयोध्या के राम मंदिर में सामने आए चढ़ावा चोरी (गबन) के मामले ने अब उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश की राजनीति में एक नया मोड़ ले लिया है. डिजिटल न्यूज़ प्लेटफ़ॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के विशेष शो 'निष्पक्ष' में वरिष्ठ पत्रकार नीलू व्यास और अयोध्या से जमीनी नजर रखने वालीं वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता के बीच हुई विस्तृत चर्चा में इस मुद्दे के कई राजनीतिक और सामाजिक पहलुओं को उजागर किया गया है.
विपक्ष इस पूरे मामले को लेकर केंद्र और उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर हमलावर है और इसे सीधे तौर पर करोड़ो राम भक्तों की आस्था से जुड़ा हुआ विषय बता रहा है.
अखिलेश यादव का 'भारतीय चीटिंग पार्टी' वाला तंज़
शो 'निष्पक्ष' में हुई चर्चा के अनुसार, समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस घटना को लेकर भाजपा पर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला है. अखिलेश यादव ने भाजपा पर तंज़ कसते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी को अब अपना नाम बदलकर 'भारतीय चीटिंग पार्टी' रख लेना चाहिए.
सपा सुप्रीमो ने अपने बयान में आगे कहा:
"जो लोग भगवान के मंदिर का चढ़ावा और दान चुरा सकते हैं, वे चुनाव में जनता का वोट और सांसद भी आराम से चुरा सकते हैं।"
इसके साथ ही उन्होंने भाजपा को 'नेशन फ़र्स्ट' (राष्ट्र पहले) की नहीं, बल्कि 'डोनेशन फ़र्स्ट' (दान पहले) की पार्टी करार दिया और आरोप लगाया कि भाजपा ने राम भक्तों की आस्था और देश के संविधान के साथ बड़ा खिलवाड़ किया है.
अयोध्या में बढ़ी राजनीतिक सरगर्मी
शो के दौरान अयोध्या से जुड़ीं वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता ने बताया कि इस समय उत्तर प्रदेश की सियासत बेहद गर्म है. समाजवादी पार्टी और भाजपा के बीच आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर अभी से ही 'वन-टू-वन' (आमने-सामने) की जंग शुरू हो चुकी है.
इस मामले में कांग्रेस भी पूरी तरह सक्रिय है. हाल ही में कांग्रेस की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष अजय राय और पार्टी के अन्य सांसदों-विधायकों द्वारा अयोध्या में दर्शन का एक कार्यक्रम बनाया गया था, जिसके बाद प्रशासन द्वारा उन्हें रात में ही नज़रबंद (हाउस अरेस्ट) कर दिया गया. हालांकि, बाद में प्रशासन को झुकना पड़ा और उन्हें दर्शन की अनुमति देनी पड़ी. जानकारों का मानना है कि इस नज़रबंदी की वजह से इस मुद्दे को और अधिक तूल मिल गया और यह अब एक बड़ा राजनीतिक हथियार बन चुका है.
क्या ठंडे बस्ते में चला जाएगा मामला?
शो 'निष्पक्ष' में इस बात पर भी गंभीर विमर्श हुआ कि क्या भाजपा इस मामले को धीरे-धीरे दबाने या ठंडे बस्ते में डालने का प्रयास कर रही है? सुमन गुप्ता के विश्लेषण के अनुसार, वर्तमान में इस मामले में 8 लोगों की गिरफ़्तारी हो चुकी है और ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के इस्तीफ़े को लेकर भी कई तरह की मजबूरियों और चर्चाओं का बाज़ार गर्म है. फैजाबाद (अयोध्या) के वकीलों द्वारा चंपत राय को अयोध्या छोड़ने का अल्टीमेटम भी दिया गया था.
हालांकि, जमीनी स्तर पर यह आशंका भी जताई जा रही है कि जाँच एजेंसियां केवल सुरक्षाकर्मियों या छोटे स्तर के कर्मचारियों (छोटी मछलियों) पर कार्रवाई करके मामले को रफ़ा-दफ़ा कर सकती हैं और इस घोटाले की आँच संगठन के बड़े चेहरों तक पहुँचने की संभावना बेहद कम दिखाई देती है. दूसरी ओर, भाजपा के ही सहयोगी और समर्थक माने जाने वाले संत, जैसे धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री और विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के कुछ पदाधिकारी भी अब दबे सुरों में इस बात को उठा रहे हैं कि 'बड़ी मछलियों' पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है.
अयोध्या के वोटर्स का बदलता मिजाज और 2027 का चुनाव
वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता ने शो में एक बेहद महत्वपूर्ण विश्लेषण साझा किया. उन्होंने बताया कि अयोध्या पारंपरिक रूप से भाजपा का सबसे मजबूत गढ़ रहा है, जहाँ से पार्टी को इतनी बड़ी लीड (बढ़त) मिलती थी कि विपक्ष के अन्य क्षेत्रों की बढ़त यहाँ आकर शून्य हो जाती थी. लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव (2024) के आंकड़ों को देखें तो अयोध्या विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की बढ़त जो कभी 30 से 40 हज़ार वोटों की हुआ करती थी, वह घटकर मात्र 3 से 4 हज़ार वोटों पर सिमट कर रह गई थी.
यह गिरावट इस बात का संकेत है कि अयोध्या के मतदाताओं और राम भक्तों में एक तरह की उदासीनता या असंतोष पनप रहा है. भले ही लोग विपक्ष के पाले में न जाएँ, लेकिन अपने ही दल के प्रति उत्साह का कम होना भाजपा के लिए आने वाले समय में एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकता है.
राम मंदिर दान घोटाले का यह मुद्दा अब सिर्फ़ सोशल मीडिया या बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह जनता के बीच सुगबुगाहट का एक बड़ा कारण बन चुका है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का 'इंडिया गठबंधन' इस मुद्दे को सड़क पर लाकर 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ़ एक निर्णायक बढ़त बना पाता है या नहीं.
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