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सुप्रीम कोर्ट का BCI पर कड़ा रुख: मनन मिश्रा के अधिकार छीने, चुनाव जल्द

SC ने BCI अध्यक्ष मनन मिश्रा को प्रो-टेम माना, नीतिगत फैसलों पर रोक; 'निष्पक्ष' शो में वरिष्ठ पत्रकार नीलू व्यास और एडवोकेट राजवेंद्र सिंह ने फैसले पर की विस्तृत चर्चा।


Nishpaksh: बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि मनन कुमार मिश्रा अब केवल एक 'प्रो-टेम' (कार्यवाहक) चेयरमैन के रूप में ही पद पर बने रहेंगे, जब तक कि राज्य बार काउंसिलों के चुनाव के बाद BCI के नए पदाधिकारियों का लोकतांत्रिक चुनाव पूरा नहीं हो जाता।

शीर्ष अदालत के निर्देशानुसार, मनन कुमार मिश्रा BCI के केवल दैनिक प्रशासनिक कामकाज की देखरेख कर सकते हैं, लेकिन उन्हें कोई भी बड़ा नीतिगत फैसला (Policy Decision) लेने का अधिकार नहीं होगा। अदालत ने तय किया कि BCI से जुड़े किसी भी बड़े नीतिगत निर्णय में भारत के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल (जो BCI के स्थायी पदेन सदस्य होते हैं) की सलाह अनिवार्य होगी।

द फ़ेडरल के शो 'निष्पक्ष' में चर्चा

'द फ़ेडरल देश' के शो निष्पक्ष में वरिष्ठ एंकर नीलू व्यास ने इस अहम कानूनी व प्रशासनिक घटनाक्रम पर विस्तार से चर्चा की। इस परिचर्चा में इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता और 'अधिवक्ता मंच इलाहाबाद' के संयोजक राजवेंद्र सिंह बतौर अतिथि शामिल हुए।

1. 12-14 वर्षों से पद पर काबिज होने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया रोकने का आरोप

शो में चर्चा की शुरुआत करते हुए एडवोकेट राजवेंद्र सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के रुख का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि BCI के चेयरमैन का कार्यकाल 5 वर्षों का होता है, लेकिन मनन कुमार मिश्रा पिछले 12 से 14 वर्षों से लगातार इस पद पर जमे हुए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्यों की बार काउंसिलों के चुनाव समय पर नहीं होने दिए गए, ताकि पुराना तंत्र ही सत्ता में बना रहे। अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा समयबद्ध चुनाव कराने के निर्देश से BCI में लोकतांत्रिक बहाली का रास्ता खुला है।

2. मुख्य जिम्मेदारियों से भटकाव और लीगल एजुकेशन की बदहाली

राजवेंद्र सिंह ने कहा कि BCI का प्राथमिक कर्तव्य देश भर में लीगल एजुकेशन (कानूनी शिक्षा) के मानक तय करना, लॉ कॉलेजों की निगरानी करना और वकीलों के पेशेवर कल्याण व एथिक्स की रक्षा करना है। लेकिन पिछले एक दशक में BCI ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि मानकों को ताक पर रखकर ऐसे लॉ कॉलेजों को मान्यता बांटी गई, जहां न पर्याप्त क्लासरूम हैं और न ही योग्य शिक्षक, जिससे वकालत के पेशे की साख गिरी है।

3. सरकार के साथ नजदीकी और तीन नए कानूनों पर विरोध दबाना

शो में एंकर नीलू व्यास ने मनन कुमार मिश्रा के राजनीतिक रसूख और उनके राज्यसभा सांसद बनने का उल्लेख किया। इस पर एडवोकेट राजवेंद्र सिंह ने कहा कि BCI चेयरमैन ने अपने पद का इस्तेमाल अधिवक्ताओं के हित में करने के बजाय सरकार के निकट जाने के लिए किया। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब देश भर में, खासकर दक्षिण भारत की राज्य बार काउंसिलों में तीन नए आपराधिक कानूनों के खिलाफ व्यापक असंतोष था और आंदोलन की तैयारी थी, तब BCI नेतृत्व ने पत्र जारी कर अधिवक्ताओं को प्रदर्शन करने से रोका और आंदोलन को शांत करा दिया।

4. संस्थागत अधिकारों का दुरुपयोग और असंतोष

परिचर्चा में यह तथ्य भी सामने आया कि BCI के भीतर ही मनन मिश्रा के खिलाफ भारी नाराजगी थी। साउथ से आने वाले BCI के को-चेयरमैन ने भी उनके इस्तीफे की मांग की थी। इसके अलावा, इलाहाबाद में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आयोजित वकीलों के सम्मेलन में शामिल होने पर पूर्व को-चेयरमैन एस.एन. त्रिपाठी को पद से हटा दिया गया था। सिंह ने आरोप लगाया कि BCI के फंड, ट्रस्ट और परिसंपत्तियों का प्रबंधन भी मनमाने ढंग से निजी नियंत्रण की तरह किया जा रहा था।

5. सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से वकीलों में नया विश्वास

चर्चा के अंत में यह निष्कर्ष निकला कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश बार काउंसिलों में लोकतंत्र और पारदर्शिता वापस लाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। प्रो-टेम चेयरमैन के रूप में मनन मिश्रा के अधिकार सीमित होने से अब कानूनी समुदाय में चुनाव को लेकर गति आएगी और वकीलों के कल्याण व कानूनी शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए नई राह खुलेगी।

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