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सोनम वांगचुक की बिगड़ती हालत; इस आंदोलन से क्यों कटी है कांग्रेस?

17 दिनों से अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक की हालत बेहद नाजुक, मानसून सत्र के पहले दिन 'संसद घेराव' की तैयारी; लेकिन इस पूरे छात्र आंदोलन से आखिर क्यों दूर है कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के अधिकतर दल?


Nishpaksh: जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी का आन्दोलन जारी है और इसके समर्थन में देश के जाने माने शिक्षाविद, पर्यावरणविद और समाजसेवी सोनम वांगचुक 17 दिनों से अनशन पर बैठे हैं। 'द फ़ेडरल देश' के लोकप्रिय शो निष्पक्ष में एंकर नीलू व्यास ने देश के एक बेहद संवेदनशील और गंभीर मुद्दे पर चर्चा की। इस चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार टीके राजलक्ष्मी और मशहूर यूट्यूबर व 'हल्ला बोल' के रिसर्चर अंचल गुप्ता ने बतौर अतिथि भाग लिया और इस ज्वलंत विषय पर अपने महत्वपूर्ण विचार साझा किए।


सोनम वांगचुक का अनशन और गिरता स्वास्थ्य
शो की शुरुआत करते हुए एंकर नीलू व्यास ने बताया कि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के विरोध प्रदर्शन का आज 25वां दिन है, जबकि पर्यावरणविद् और शिक्षाविद सोनम वांगचुक के अनशन का आज 17वां दिन हो चुका है। वांगचुक का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता जा रहा है; उनका ब्लड शुगर लेवल काफी कम हो गया है, बॉडी में मसल लॉस (मांसपेशियों का नुकसान) तेजी से हो रहा है और ब्लड प्रेशर भी खतरनाक स्तर तक नीचे गिर गया है। स्थिति इतनी गंभीर है कि दो-तीन दिनों के भीतर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ सकता है।

20 जुलाई को 'संसद चलो मार्च' की तैयारी
नीलू व्यास ने बताया कि सीजेपी और अभिजीत दिपके की ओर से आगामी 20 जुलाई को एक विशाल 'संसद चलो मार्च' का आयोजन करने की अपील की गई है, जो जंतर-मंतर से शुरू होकर संसद भवन तक जाएगा। आंदोलनकारियों का स्पष्ट कहना है कि यदि सरकार उनसे बात करने नहीं आती, तो वे खुद सरकार से बात करने संसद की ओर बढ़ेंगे। इस मुद्दे पर कई राजनीतिक और सामाजिक हस्तियां जैसे अरुंधति रॉय, महुआ मोइत्रा और नसीरुद्दीन शाह भी समर्थन में आगे आए हैं।

दोनों अतिथियों के विचार और चर्चा का विस्तार
1. टीके राजलक्ष्मी (वरिष्ठ पत्रकार) का दृष्टिकोण:
वरिष्ठ पत्रकार टीके राजलक्ष्मी ने इस पूरे घटनाक्रम पर सरकार की संवेदनहीनता और मुख्यधारा की मीडिया के रुख पर गहरी चिंता व्यक्त की:

विपक्ष और कांग्रेस की भूमिका: राजलक्ष्मी ने कहा कि शिक्षा और छात्रों से जुड़ा यह मुद्दा बेहद गंभीर है। नीट (NEET) पेपर लीक जैसी घटनाओं के कारण लगभग 20 छात्रों ने अपनी जान गंवाई है, जो एक बड़ा और डरावना आंकड़ा है। उन्होंने सवाल उठाया कि जहाँ अन्य विपक्षी दल इस आंदोलन को समर्थन दे रहे हैं, वहीं कांग्रेस पार्टी ने इससे एक अजीब सी दूरी बनाई हुई है, जो समझ से परे है। उन्हें भी खुलकर छात्रों और सोनम वांगचुक के समर्थन में आना चाहिए।

सोनम वांगचुक का कद: उन्होंने रेखांकित किया कि सोनम वांगचुक एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखने वाले पर्यावरणविद् और शिक्षाविद हैं। उनके इस आंदोलन में शामिल होने से सीजेपी के इस मूवमेंट को एक मजबूत नैतिक वैधता (Legitimacy) और वजन मिला है।

सरकारी तंत्र और एसओपी (SOP): 20 जुलाई के मार्च पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि दिल्ली पुलिस और प्रशासन का यह एक मानक संचालन तरीका (SOP) रहा है कि वे संसद तक पहुँचने से बहुत पहले ही भारी बैरिकेडिंग कर देते हैं या धारा 144 लागू कर प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक नजरबंदी) के तहत प्रदर्शनकारियों को वाहनों में भरकर हटा देते हैं। सरकार इस आंदोलन के सामने इसलिए भी नहीं झुकना चाहती क्योंकि वह खुद को कमजोर दिखाना पसंद नहीं करती।

2. अंचल गुप्ता (यूट्यूबर और रिसर्चर) का दृष्टिकोण:
यूट्यूबर अंचल गुप्ता ने इस आंदोलन को जमीनी स्तर पर व्यापक बनाने और सरकार की लोकतांत्रिक नैतिकता पर अपने विचार रखे:

संगठन की कमी और स्वतःस्फूर्त आंदोलन: अंचल ने कहा कि जमीनी स्तर पर सीजेपी का कोई बहुत बड़ा कैडर या ढांचागत संगठन नहीं है, यह एक स्वतःस्फूर्त (Spontaneous) आंदोलन है जहाँ लोग खुद-ब-खुद जुड़ रहे हैं। हालांकि, वामपंथी छात्र संगठन (Left Student Organizations) शुरू से ही इस तरह के प्रगतिशील मुद्दों पर सबसे आगे रहे हैं और इस बार भी वे मजबूती से खड़े हैं।

व्यापक जन-आंदोलन की आवश्यकता: उन्होंने तर्क दिया कि जब तक देश के अलग-अलग राज्यों की राजधानियों में एक ही समय पर हजारों लोग सड़कों पर नहीं उतरेंगे, तब तक इस सरकार पर बड़ा दबाव बनाना मुश्किल है। जब हर राज्य की राजधानी में लोग बीजेपी दफ्तरों या केंद्रीय सचिवालयों के बाहर प्रदर्शन करेंगे, तभी यह आंदोलन एक निर्णायक मोड़ लेगा।

लोकतांत्रिक मूल्यों में गिरावट: अंचल ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दौर का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले की सरकारों में एक लोकतांत्रिक मर्यादा और नैतिकता होती थी, जहाँ विरोध प्रदर्शनों का सम्मान किया जाता था (जैसे जेएनयू में विरोध के बावजूद छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों को स्वीकार किया गया था)। लेकिन वर्तमान सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों और नैतिकता से काफी दूर नजर आती है। ऐसे में यदि सोनम वांगचुक बेहोश होते हैं, तो सरकार उनके परिवार पर दबाव बनाकर अनशन तुड़वाने का प्रयास कर सकती है।

शो के अंत में एंकर नीलू व्यास ने इस बात पर जोर दिया कि 20 जुलाई को संसद का मानसून सत्र भी शुरू हो रहा है और उसी दिन 'संसद चलो मार्च' भी है। अब यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि सरकार का रुख इस आंदोलन के प्रति क्या रहता है और सबसे बढ़कर, सोनम वांगचुक के गिरते स्वास्थ्य को लेकर आने वाले दिनों में क्या परिस्थितियां बनती हैं।



(शो में शामिल अतिथियों की राय उनकी स्वयं की है, द फ़ेडरल देश एक मंच है, जो अपनी बात रखने का मौका देता है लेकिन उनकी राय से सहमती हो ये जरुरी नहीं है।)


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