होर्मुज खाड़ी में बरपा बारूद: अमेरिका-ईरान में सीज़फायर टूटा, बढ़ा तनाव
Strait of Hormuz में अमेरिका की भीषण बमबारी के बाद ईरान का पलटवार; पश्चिम एशिया में युद्ध जैसे हालात से भारत के लिए भी बढ़ी कच्चे तेल और गैस की किल्लत की टेंशन।
Nishpaksh: पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में शांति की तमाम कोशिशों को बड़ा झटका लगा है। अमेरिका और ईरान के बीच हुआ सीज़फायर (संघर्षविराम) पूरी तरह टूट चुका है। ताजा घटनाक्रम में अमेरिका ने ईरान के करीब 90 सैन्य ठिकानों पर भीषण बमबारी की है, जिससे पूरे इलाके में युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं। इस बेहद गंभीर अंतरराष्ट्रीय संकट और इसके भारत पर पड़ने वाले असर को लेकर 'द फ़ेडरल देश' के शो 'निष्पक्ष' में एंकर नीलू व्यास ने अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों के साथ बेहद विस्तृत और 'निष्पक्ष' चर्चा की।
शो में 'हार्ड न्यूज़' के संपादक संजय कपूर और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ प्रो. आफ़ताब कमाल पाशा ने इस क्राइसिस के भू-राजनीतिक (Geopolitical) और आर्थिक (Economic) पहलुओं का बारीक विश्लेषण किया।
कैसे शुरू हुआ ताजा विवाद?
एंकर नीलू व्यास ने चर्चा की शुरुआत करते हुए बताया कि दोनों देशों के बीच तनाव तब चरम पर पहुंच गया जब होर्मुज की खाड़ी (Strait of Hormuz) में तेल टैंकरों पर मिसाइल हमले किए गए, जिसका आरोप ईरान पर लगा। इसके जवाब में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सीज़फायर खत्म करने का ऐलान कर दिया। अमेरिकी सेना ने उत्तरी ईरान में रसद पहुंचाने वाले रेलवे ब्रिज और मूसा द्वीप को निशाना बनाते हुए ताबड़तोड़ मिसाइलें दागीं।
पलटवार करते हुए ईरान ने भी बहरीन, कुवैत और कतर में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले किए हैं, जिसके बाद कुवैत में युद्ध के सायरन बजने की खबरें आ रही हैं। ईरान ने इस अमेरिकी कार्रवाई के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र (UN) में अपना कड़ा विरोध भी दर्ज कराया है।
ट्रम्प के दिल में ईरान का 'खौफ' और इजराइल की भूमिका
वरिष्ठ पत्रकार संजय कपूर ने इस पूरे घटनाक्रम को बेहद गंभीर मोड़ बताते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच हुए एमओयू (Memorandum of Understanding) को महज 60 दिन के भीतर ही खारिज कर दिया गया। उन्होंने एक दिलचस्प वाकया साझा करते हुए बताया:
"जब डोनाल्ड ट्रम्प अंकारा (तुर्की) से लौट रहे थे, तो उन्होंने कतर द्वारा दिए गए आधिकारिक विमान 'एयरफोर्स वन' को छोड़ दिया और अपने पुराने निजी विमान से सफर किया। ट्रम्प के दिल और उनके परिवार में यह खौफ बैठ गया है कि कोई ईरानी या शिया समूह उन पर जानलेवा हमला कर सकता है।"
संजय कपूर ने आगे विश्लेषण किया कि इस सीज़फायर के टूटने से सबसे ज्यादा खुशी इजराइल और उसके प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को है। इजराइल पहले से ही इस शांति समझौते के खिलाफ था क्योंकि इसमें लेबनान (हिज्बुल्लाह) का एंगल जुड़ा हुआ था। अब ट्रम्प के इस कड़े रुख से इजराइल को लगता है कि हालात फिर से उसके कंट्रोल में आ जाएंगे।
अमेरिका की रणनीति: ईरान के इंफ्रास्ट्रक्चर को तबाह करना
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ प्रो. आफ़ताब कमाल पाशा ने शो 'निष्पक्ष' में जुड़ते हुए कहा कि अमेरिका सीधे तौर पर किसी बहुत बड़ी जंग में नहीं कूद रहा है, बल्कि वह 'लो इंटेंसिटी कॉन्फ्लिक्ट' (कम तीव्रता वाले संघर्ष) की रणनीति पर काम कर रहा है।
प्रो. पाशा के अनुसार:
"अमेरिका का मकसद ईरान को बातचीत की मेज पर झुकने के लिए मजबूर करना है। इसीलिए वह ईरान के तेल इंफ्रास्ट्रक्चर, रेलवे लाइनों और पोर्ट सिटीज (बंदरगाहों) को निशाना बना रहा है। चाबहार पोर्ट के दो टर्मिनल्स और वहाँ से जुड़ने वाले रेलवे लिंक को भी अमेरिकी बमबारी में भारी नुकसान पहुंचा है।"
उन्होंने यह भी कहा कि ट्रम्प ने ईरान के लिए जिस तरह की अपमानजनक भाषा ('स्कम') का इस्तेमाल किया है, उससे ईरानियों का गुस्सा और भड़क गया है, जिसका नतीजा आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा।
भारत के लिए कितनी बड़ी मुसीबत?
शो 'निष्पक्ष' में एंकर नीलू व्यास ने सबसे महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि इस युद्ध जैसी स्थिति का भारत पर क्या असर होगा?
1. तेल और गैस की किल्लत:
संजय कपूर ने आगाह किया कि भारत के लिए एक बार फिर तेल और गैस की किल्लत बढ़ सकती है। हालांकि, भारत ने पिछले कुछ महीनों में अपनी रणनीति बदली है और हमारा सबसे ज्यादा तेल इंपोर्ट इस समय रूस (Russia) से हो रहा है। इसलिए अमेरिका के किसी भी दबाव के बावजूद भारत रूस से तेल खरीदना जारी रखेगा। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह होगी कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव बढ़ने के कारण भारत के कई व्यापारिक जहाज वहाँ फंस सकते हैं।
2. 1 करोड़ भारतीयों की सुरक्षा का संकट:
प्रो. आफ़ताब कमाल पाशा ने एक बेहद डरावनी स्थिति की ओर इशारा किया। उन्होंने बताया कि खाड़ी के देशों (UAE, सऊदी अरब आदि) में करीब 1 करोड़ भारतीय रहते हैं (अकेले UAE में करीब 35 लाख)। चूंकि अमेरिका खाड़ी देशों में बने अपने सैन्य अड्डों से ईरान पर हमले कर रहा है, इसलिए ईरान इन खाड़ी देशों के सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर को भी निशाना बना सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो वहाँ रह रहे लाखों-करोड़ों भारतीयों की जान पर बड़ा खतरा मंडरा सकता है और भारत के लिए उन्हें वहाँ से निकालना (Evacuate करना) बेहद मुश्किल हो जाएगा।
क्या रुख होगा संयुक्त राष्ट्र (UN) का?
प्रो. पाशा के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में इस मुद्दे पर चीन और रूस को ईरान के पक्ष में खड़ा होना पड़ेगा क्योंकि वे लगातार शांति की वकालत कर रहे थे। हालांकि, अगर सुरक्षा परिषद में अमेरिका के खिलाफ कोई प्रस्ताव आता है, तो अमेरिका उसे 'वीटो' कर देगा। लेकिन यदि यह मामला संयुक्त राष्ट्र महासभा (General Assembly) में जाता है, जहाँ 14 देश ईरान के समर्थन में आ सकते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमेरिका और इजराइल दोनों बुरी तरह अलग-थलग (Isolate) पड़ सकते हैं।
'निष्पक्ष' शो के विश्लेषण से यह साफ है कि होर्मुज की खाड़ी का यह संकट हर घंटे बदल रहा है। पश्चिम एशिया का यह तनाव सिर्फ दो देशों की जंग नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, तेल की कीमतों और खाड़ी में रहने वाले लाखों भारतीयों की सुरक्षा पर पड़ने वाला है। अब देखना यह होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार इस चौतरफा संकट से भारत को कैसे सुरक्षित निकालती है।
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