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SP और CJP साथ आए तो यूपी में क्या होगा? 2027 चुनाव पर बड़ा विश्लेषण

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और अखिलेश यादव की मुलाकात के क्या हैं सियासी मायने? 'द फ़ेडरल देश' पर देखिए कैसे सपा ने यूपी में कांग्रेस से पहले मारी बाजी।


Nishpaksh: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव भले ही दूर हों, लेकिन राजनीतिक गोटियां अभी से बिछनी शुरू हो गई हैं। रोजगार और शिक्षा के मुद्दे पर पूरे देश में तहलका मचाने वाली 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के नेता आशुतोष रंका और सपा प्रमुख अखिलेश यादव की हालिया मुलाकात ने यूपी की राजनीति में गर्मी ला दी है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यूपी में बीजेपी को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए सपा, कांग्रेस और सीजेपी की साझा ताकत मैदान में उतरेगी?


'द फ़ेडरल देश' के शो निष्पक्ष में वरिष्ठ पत्रकार नीलू व्यास के साथ हुई खास चर्चा में यह संकेत मिले कि अखिलेश यादव ने इस मामले में राहुल गांधी से पहले बाजी मार ली है। आइए इस पूरे सियासी खेल को एकदम आसान भाषा में समझते हैं:

1. अखिलेश की फुर्ती और कांग्रेस की सुस्ती
इस पूरी चर्चा का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि अखिलेश यादव ने राजनीतिक चतुराई दिखाते हुए 'फर्स्ट मूवर एडवांटेज' (सबसे पहले कदम उठाने का फायदा) ले लिया है।

वरिष्ठ पत्रकार नवीन निगम के मुताबिक, सीजेपी का आंदोलन युवाओं और नौकरी चाहने वालों का आंदोलन है। जो युवा सत्ता (बीजेपी) से नाराज है, वह स्वाभाविक रूप से विपक्ष के पास ही जाएगा।

राहुल गांधी अभी सोच ही रहे थे कि इस युवा आक्रोश को कैसे अपने पक्ष में किया जाए, तब तक अखिलेश यादव ने सीजेपी नेताओं से मुलाकात कर यह संदेश दे दिया कि यूपी में 'बड़े भाई' वही हैं।

यह मुलाकात बीजेपी के खिलाफ कम, बल्कि चुनाव से पहले कांग्रेस पर 'सीट-शेयरिंग' का दबाव बनाने का एक बड़ा कूटनीतिक दांव है। अखिलेश ने यह जता दिया है कि यूपी के युवाओं की पहली पसंद सपा है।

2. '1 और 1 ग्यारह' का फॉर्मूला और डिंपल यादव का रोल
समाजवादी पार्टी इस नए युवा संगठन (CJP) के समर्थन को लेकर बेहद उत्साहित है। सपा इस बात से बिल्कुल नहीं डर रही है कि सीजेपी उनका क्रेडिट ले लेगी।

सपा प्रवक्ता मनोज यादव ने साफ कहा कि राजनीति में 'एक और एक मिलकर ग्यारह' भी होते हैं।

जब सीजेपी के छात्र जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे थे, तब डिंपल यादव खुद वहां पहुंची थीं। उन्होंने लाठीचार्ज में घायल छात्रों के इलाज, दवाइयों और उन्हें थाने से छुड़वाने तक का जिम्मा उठाया था।

सपा का मानना है कि 'स्कूल ठीक करो' अभियान हो या 26 हजार स्कूलों के बंद होने का मुद्दा, सीजेपी और सपा की वैचारिक लड़ाई एक ही है— नौजवानों का हक।

3. 'मोदी नहीं तो कौन?' का भ्रम टूटा!
इस चर्चा में सबसे बड़ी बात यह निकलकर आई कि सीजेपी के आंदोलन ने देश के उस नैरेटिव को तोड़ दिया है, जिसमें कहा जाता था कि 'मोदी है तो मुमकिन है' या 'मोदी नहीं तो देश का क्या होगा?'

अब देश का जेन-जी (Gen-Z) युवा ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी की जगह अपनी शिक्षा, नौकरी और जर्जर स्कूलों पर सवाल पूछ रहा है।

सपा प्रवक्ता ने यह भी बड़ा दावा (ब्रेकिंग) किया कि जैसे 2022 में सपा ने बीजेपी के कई मंत्रियों और विधायकों को तोड़ा था, 2027 में सपा इतने बड़े पैमाने पर बीजेपी को तोड़ेगी कि सत्ताधारी दल यूपी में खड़ा भी नहीं हो पाएगा।

निष्कर्ष:
कुल मिलाकर, यूपी की राजनीति में सीजेपी की एंट्री ने विपक्ष की ताकत बढ़ा दी है। अखिलेश यादव ने समय रहते इस युवा लहर को अपने पाले में कर लिया है। अब देखना यह है कि जब राहुल गांधी भी आने वाले दिनों में सीजेपी से मुलाकात करेंगे, तो यूपी में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन की रस्साकशी क्या नया मोड़ लेगी।


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