वोटर लिस्ट से लाखों नाम गायब: क्या पर्दे के पीछे चल रहा है कोई बड़ा खेल?
दिल्ली और पंजाब में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के नाम पर कटे लाखों वोट। नीलू व्यास के शो 'निष्पक्ष' में वरिष्ठ पत्रकार प्यारेलाल गर्ग ने खोला बड़ा राज।
Nishpaksh: देश में चुनावों से ठीक पहले मतदाता सूचियों में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया पर एक बड़ा राजनीतिक और तकनीकी विवाद खड़ा हो गया है। आम आदमी पार्टी (AAP) के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज द्वारा चुनाव आयोग और भाजपा पर लगाए गए गंभीर आरोपों के बाद 'द फ़ेडरल देश' के शो 'निष्पक्ष' में एंकर नीलू व्यास ने इस मुद्दे पर देश के जाने-माने इलेक्शन डेटा साइंटिस्ट डॉ. प्यारेलाल गर्ग के साथ एक विस्तृत और विचारोत्तेजक चर्चा की।
क्या हैं आम आदमी पार्टी के आरोप?
शो की शुरुआत में एंकर नीलू व्यास ने बताया कि सौरभ भारद्वाज ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए आरोप लगाया है कि दिल्ली में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही करीब 14 लाख मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं। 'आप' का आरोप है कि इस प्रक्रिया के तहत जानबूझकर गरीबों, झुग्गीवासियों और पूर्वांचल के प्रवासी मतदाताओं को निशाना बनाया जा रहा है, जो अक्सर सत्ताधारी दल के खिलाफ वोट करते हैं। इसके अलावा, लोगों को 'एनुमरेशन फॉर्म' (Enumeration Form) न मिलने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं।
केवल दिल्ली नहीं, पंजाब और अन्य राज्यों में भी बड़ा खेल: डॉ. गर्ग
जब नीलू व्यास ने पूछा कि क्या यह तिड़म केवल दिल्ली तक सीमित है, तो डॉ. प्यारेलाल गर्ग ने चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे। उन्होंने बताया कि यह समस्या केवल दिल्ली की नहीं बल्कि पूरे देश की है।
"दिल्ली में करीब 2.5 करोड़ की आबादी पर पौने दो करोड़ (17 मिलियन) वोटर हैं, जिसमें से 14 लाख नाम कटे हैं। लेकिन पंजाब में स्थिति इससे भी ज्यादा गंभीर है। पंजाब की आबादी सवा तीन करोड़ है और वहां 2 करोड़ 14 लाख वोटर हैं, लेकिन वहां प्री-SIA और मैपिंग के नाम पर 30 लाख वोट काट दिए गए हैं।"
- डॉ. प्यारेलाल गर्ग, इलेक्शन डेटा साइंटिस्ट
डॉ. गर्ग ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग जिसे 'प्री-SIA' कह रहा है, तकनीकी भाषा में उसे 'मैपिंग' कहा जाता है। इस मैपिंग के दौरान यदि किसी का घर बंद मिलता है या कोई अस्थायी रूप से शिफ्ट हुआ है, तो बिना उचित प्रक्रिया के उसका नाम काट दिया जा रहा है।
वोटर रजिस्ट्रेशन नियम 18 और 21 का उल्लंघन
डॉ. गर्ग ने नियमों का हवाला देते हुए बताया कि मतदाता पंजीकरण नियम (Registration of Electors Rules) के नियम 18 और 21 के तहत यह स्पष्ट है कि किसी का भी नाम काटने या संशोधित करने से पहले उसकी पूरी सुनवाई होनी चाहिए। उन्होंने कहा, "पिछले 20-22 सालों में लोगों ने मकान बदले हैं, लोग किराए के घरों में रहते हैं। अकेले मैंने चंडीगढ़ में 16 मकान बदले हैं। ऐसे में सिर्फ घर बंद होने या पता बदलने के आधार पर वोट काट देना असंवैधानिक है। चुनाव आयोग को चाहिए था कि वह फॉर्म नंबर 8 के जरिए लोगों को अपना पता सुधरवाने का मौका देता, न कि उनका नाम ही लिस्ट से गायब कर देता।"
राजनीतिक दलों की दोहरी नीति और ढोंग
चर्चा के दौरान एंकर नीलू व्यास ने एक बेहद तीखा और महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि यह पूरा मामला एक 'ढोंग' (Show-off) जैसा क्यों लगता है? उन्होंने पूछा कि जहाँ 'आप' की सरकार नहीं है (जैसे दिल्ली), वहाँ वे शोर मचा रहे हैं, लेकिन जहाँ उनकी अपनी सरकार है (जैसे पंजाब), वहाँ वे 30 लाख वोट कटने पर भी चुप हैं। यही स्थिति कांग्रेस और भाजपा की भी है - जहाँ जिसकी सरकार है, वहाँ की गड़बड़ियों पर सबने चुप्पी साध रखी है।
इस पर सहमति जताते हुए डॉ. गर्ग ने कहा कि राजनीतिक दल अक्सर केवल अपने फायदे के लिए ही आवाज उठाते हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा कि जब वहाँ भाजपा के अपने कार्यकर्ताओं के वोट कटे थे, तब स्थानीय स्तर पर विरोध हुआ था। राजनीतिक पार्टियां जनता के वास्तविक अधिकारों के लिए नहीं, बल्कि अपनी चुनावी गुणा-भाग के लिए लड़ती हैं।
वोट कटने का दूरगामी परिणाम: नागरिकता पर संकट!
डॉ. गर्ग ने इस प्रक्रिया के पीछे एक बेहद गंभीर अंदेशा जताया। उन्होंने चेतावनी दी कि यह केवल वोट कटने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह NRC और CAA को पिछले दरवाजे से लागू करने जैसी सोची-समझी रणनीति हो सकती है।
उन्होंने विस्तार से समझाया कि:
सरकारी योजनाओं से वंचित होना: जिसका वोट कट गया, उसे धीरे-धीरे सभी सरकारी योजनाओं के लाभ से बाहर कर दिया जाएगा।
पहचान पर संकट: आगे चलकर यह कहा जा सकता है कि आपके पास वोटिंग राइट्स नहीं हैं, इसलिए आप देश के वैध नागरिक नहीं हैं।
पासपोर्ट और प्रॉपर्टी पर रोक: नागरिकता पर सवाल उठते ही पासपोर्ट जारी होना बंद हो जाएगा और संपत्ति खरीदने या नौकरी करने के अधिकार भी छीने जा सकते हैं।
जनता की अदालत ही आखिरी रास्ता
चर्चा के अंत में जब नीलू व्यास ने पूछा कि क्या अदालतें इसमें हस्तक्षेप करेंगी, तो डॉ. गर्ग ने निराशा जताते हुए कहा कि कई बार संस्थान और ब्यूरोक्रेसी इस पर आंखें मूंद लेते हैं। ऐसे में अब केवल 'जनता की अदालत' ही एकमात्र रास्ता बची है। जब देश के आम लोग जागरूक होंगे और स्थानीय स्तर पर इसके खिलाफ आवाज उठाएंगे, तभी इस संस्थागत विफलता को रोका जा सकता है। उन्होंने प्रभावित लोगों से अपील की कि वे एकजुट होकर चुनाव अधिकारियों (AERO) को पत्र लिखें और नियम 18 व 21 के तहत अपनी सुनवाई की मांग करें।
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