मुस्लिम वोट बैंक पर संकट! बंगाल-असम के नतीजों ने बढ़ाई अखिलेश की टेंशन
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मुस्लिम वोट बैंक पर संकट! बंगाल-असम के नतीजों ने बढ़ाई अखिलेश की टेंशन

बंगाल-असम के चुनावी नतीजों और वोटर लिस्ट से कटे 2 करोड़ नामों ने बढ़ाई विपक्ष की धड़कन। क्या यूपी में अखिलेश यादव का 'हनुमान भक्ति' प्रचार बचा पाएगा उनकी राजनीतिक जमीन?


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Politics Of Polarisation : पश्चिम बंगाल और असम के हालिया विधानसभा चुनाव परिणामों ने भारतीय राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। इन नतीजों ने उन राजनीतिक दलों की नींद उड़ा दी है जो अब तक केवल 'मुस्लिम वोट बैंक' के भरोसे अपनी चुनावी नैया पार लगाते आए थे। उत्तर प्रदेश, जहाँ 2027 की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहाँ के सियासी गलियारों में इन नतीजों का गहरा असर देखा जा रहा है। बंगाल और असम के रुझान बताते हैं कि अब मुस्लिम मतदाता न तो पूरी तरह एकजुट हैं और न ही किसी एक 'सेक्युलर' लेबल वाली पार्टी की जागीर।


वोटर लिस्ट से गायब हुए करोड़ों नाम
राजनीति की इस बिसात पर सबसे बड़ा फेरबदल मतदाता सूचियों में हुआ है। पश्चिम बंगाल में जहाँ 90 लाख नाम कटे, वहीं उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 2 करोड़ को पार कर गया है। यह सिर्फ एक सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक बड़ा सियासी झटका है। जानकारों का मानना है कि जिन इलाकों में विपक्षी दल मजबूत थे, वहाँ बड़ी संख्या में 'अयोग्य' मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। इस 'सर्जिकल स्ट्राइक' ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे दलों के चुनावी गणित को पूरी तरह बिगाड़ कर रख दिया है।

अखिलेश की 'हनुमान' भक्ति के मायने
बंगाल के नतीजों के बाद यूपी की राजनीति में एक दिलचस्प मोड़ आया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव, जो अब तक पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की बात कर रहे थे, अचानक हनुमान भक्ति में लीन नजर आ रहे हैं। सोशल मीडिया पर हनुमान चालीसा का पाठ और भगवान हनुमान की तस्वीर शेयर करना उनकी बदली हुई रणनीति का हिस्सा है। दरअसल, उन्हें डर है कि अगर मुस्लिम वोट बंटा और हिंदू वोट पूरी तरह बीजेपी के साथ रहा, तो 2027 की राह बहुत कठिन हो जाएगी।

ओवैसी फैक्टर और 'हुमायूं कबीर' मॉडल
बंगाल में हुमायूं कबीर की पार्टी ने दिखा दिया कि मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर टीएमसी को कैसे पटखनी दी जा सकती है। अब यही 'बंगाल मॉडल' यूपी में असदुद्दीन ओवैसी लागू करने की तैयारी में हैं। ओवैसी का सीधा तर्क है कि जब सेक्युलर पार्टियाँ मुसलमानों का भला नहीं कर पा रही हैं, तो वे अपना नेतृत्व खुद क्यों न चुनें। अगर यूपी का मुस्लिम युवा इस सोच के साथ आगे बढ़ता है, तो सपा का कोर वोट बैंक बिखर सकता है। इससे बीजेपी के लिए मुकाबला और भी आसान हो जाएगा।

बीजेपी की 'साइलेंट' जीत का फार्मूला
एक तरफ जहाँ विपक्ष वोट बचाने की जंग लड़ रहा है, वहीं बीजेपी अपनी रणनीति पर शांति से काम कर रही है। असम में परिसीमन के बाद मुस्लिम बाहुल्य सीटों को जिस तरह से दोबारा व्यवस्थित किया गया, उसने भगवा दल को बड़ी बढ़त दिला दी। बंगाल के मुस्लिम बाहुल्य जिलों जैसे मालदा और मुर्शिदाबाद में बीजेपी की जीत एक बड़ा संकेत है। बीजेपी अब उस 'कमजोरी' पर हमला कर रही है, जिसे विपक्ष अपनी सबसे बड़ी ताकत समझता था। 2027 की जंग अब इसी 'कमजोरी' को मैनेज करने पर टिकी है।

2027 की नई चुनौती
2027 का चुनाव अब सिर्फ रैलियों और नारों तक सीमित नहीं रहेगा। यह चुनाव डेटा, वोटर लिस्ट और माइक्रो-मैनेजमेंट का होगा। क्या अखिलेश यादव अपने 'हनुमान अवतार' से हिंदू और मुस्लिम दोनों को साध पाएंगे? या फिर ओवैसी का बढ़ता कद सेक्युलर खेमे में सेंध लगा देगा? बंगाल और असम ने यूपी के लिए एक बड़ा सबक छोड़ दिया है। अब देखना यह है कि उत्तर प्रदेश के 'सियासी सुल्तान' इस सबक से क्या सीख लेते हैं।


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