बुलडोजर नीति और ध्रुवीकरण: क्या यूपी चुनाव 2027 की यही है असली स्क्रिप्ट?
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बुलडोजर नीति और ध्रुवीकरण: क्या यूपी चुनाव 2027 की यही है असली स्क्रिप्ट?

उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले फिर गरमाया '80 बनाम 20' और बुलडोजर मॉडल का मुद्दा. बुनियादी मुद्दों के बदले ध्रुवीकरण और घटते मुस्लिम प्रतिनिधित्व पर छिड़ी बहस.


UP Assembly Elections 2027: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब एक साल से भी कम का समय बचा है. सूबे में सियासी पारा अभी से तेजी से चढ़ने लगा है. राज्य की राजनीतिक लड़ाई पूरी तरह धर्म और पहचान के मुद्दों पर सिमटती दिख रही है. विपक्षी दल लगातार सत्तारूढ़ योगी आदित्यनाथ सरकार पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं. विपक्ष का कहना है कि सरकार असल मुद्दों से ध्यान भटका रही है.


बुनियादी मुद्दों से दूरी का आरोप

विपक्ष के मुताबिक राज्य में बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दे बेहद गंभीर हैं. धीमा विकास और भ्रष्टाचार जनता को परेशान कर रहा है. लेकिन सरकार इन समस्याओं को हल करने के बजाय केवल ध्रुवीकरण पर ध्यान केंद्रित कर रही है. विपक्ष का आरोप है कि जानबूझकर ऐसे मुद्दों को हवा दी जा रही है जिससे समाज का बंटवारा हो.



बुलडोजर मॉडल पर तीखी बहस

इस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति में 'बुलडोजर मॉडल' सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है. प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में इसकी खूब चर्चा होती है. आलोचकों का साफ कहना है कि कानून-व्यवस्था के नाम पर की जा रही यह कार्रवाई एकतरफा है. इसके जरिए एक विशेष समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है. यह मॉडल अब एक बड़ा चुनावी हथियार बन चुका है.


क्या यह एक चुनावी रणनीति है

राजनीतिक गलियारों में अब यह सवाल खुलकर उठने लगा है. क्या बड़े चुनावों से ठीक पहले मुस्लिम विरोधी बयानों को जानबूझकर हवा दी जाती है. क्या यह वोट हासिल करने की एक सोची-समझी चुनावी रणनीति है. नमाज पर पाबंदी, राष्ट्रवाद और पहचान की राजनीति से जुड़े मुद्दे अचानक तेज हो गए हैं. विश्लेषक मानते हैं कि 2027 के चुनाव तक यही माहौल रहेगा.


80 बनाम 20 का पुराना नैरेटिव

साल 2022 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक बड़ा बयान दिया था. उन्होंने इस चुनावी जंग को '80 बनाम 20' की लड़ाई बताया था. इस बयान को सीधे तौर पर हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण से जोड़कर देखा गया था. मुख्यमंत्री ने कहा था कि 80 फीसदी लोग राष्ट्रवाद, सुशासन और विकास के साथ हैं जो भाजपा को वोट देंगे.


माफिया समर्थकों पर साधा था निशाना

मुख्यमंत्री ने अपने बयान में विपक्ष और एक खास वर्ग को घेरा था. उन्होंने कहा था कि बाकी बचे 15 से 20 फीसदी लोग विकास के विरोधी हैं. ये लोग माफिया और अपराधियों के मददगार हैं और इनका रास्ता पूरी तरह अलग है. उन्होंने दावा किया था कि इस 80 और 20 की लड़ाई में जीत सिर्फ भाजपा की ही होगी.


पश्चिमी यूपी का चुनावी गणित

भाजपा ने पिछले चुनावों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश को विशेष तवज्जो दी थी. वहां के चुनावी अभियानों में कानून-व्यवस्था को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया गया था. पलायन और घुसपैठ जैसी बातों को सीधे तौर पर मुस्लिम समुदाय से जोड़ा गया. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में भी खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संपत्तियों के बंटवारे को लेकर तीखा बयान दिया था.


मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी ताकत

उत्तर प्रदेश की कुल आबादी में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी करीब 20 फीसदी है. राज्य में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 3.85 करोड़ है. सूबे की कुल 403 विधानसभा सीटों में से 143 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम आबादी 20 फीसदी से अधिक है. इन सीटों पर यह समुदाय बेहद निर्णायक भूमिका में रहता है.


सीटों का पूरा समीकरण समझिए

इन 143 सीटों का सियासी समीकरण बेहद दिलचस्प है. करीब 70 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम आबादी 20 से 30 फीसदी के बीच है. इसके अलावा 43 सीटें ऐसी हैं जहां यह संख्या 30 से 40 फीसदी तक जाती है. वहीं राज्य की 30 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की तादाद 40 फीसदी से भी ज्यादा है.


लोकसभा में भी मजबूत मौजूदगी

लोकसभा चुनाव के लिहाज से भी यह आबादी बहुत मायने रखती है. उत्तर प्रदेश की 80 संसदीय सीटों में से 36 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटर्स 20 फीसदी से ज्यादा हैं. इतनी मजबूत जनसांख्यिकीय मौजूदगी के बाद भी एक हैरान करने वाला ट्रेंड दिख रहा है. भाजपा शासन के दौरान मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व में भारी कमी आई है.


प्रतिनिधित्व में दर्ज हुई बड़ी गिरावट

मायावती के नेतृत्व वाली बसपा सरकार के दौरान रिकॉर्ड 58 मुस्लिम विधायक चुनकर आए थे. इसके बाद जब अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी सत्ता में आई तो यह संख्या बढ़कर 68 हो गई. लेकिन साल 2017 में भाजपा की सरकार बनते ही यह आंकड़ा सीधे 24 पर गिर गया. साल 2022 में यह थोड़ा सुधरा और 34 तक पहुंचा.


लोकसभा चुनाव का पुराना रिकॉर्ड

संसदीय चुनावों में भी मुस्लिम प्रतिनिधित्व का ग्राफ काफी नीचे गिरा है. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से एक भी मुस्लिम सांसद नहीं जीत पाया था. जानकारों का मानना है कि बहुसंख्यक मतों के ध्रुवीकरण की राजनीति भाजपा के पक्ष में बहुत कारगर साबित होती रही है.


मदरसे और जनसांख्यिकी पर बहस

जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, पुराने मुद्दों को दोबारा हवा दी जा रही है. मस्जिदों, मदरसों, बदलती आबादी और राष्ट्रवाद से जुड़े मुद्दे फिर से सुर्खियों में हैं. राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि प्रचार तेज होते ही ये मुद्दे और आक्रामक हो जाएंगे. इसका सीधा फायदा उठाने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं.


विपक्ष के सामने खड़ी बड़ी चुनौती

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों के लिए यह रास्ता आसान नहीं है. विश्लेषकों के मुताबिक विपक्ष को सिर्फ सरकार के बयानों का जवाब देने से बचना होगा. उन्हें मुस्लिम और अन्य पिछड़े समाजों के लिए एक ठोस नीतिगत एजेंडे के साथ सामने आना होगा. अक्सर चुनाव आते ही इन मुद्दों को सिर्फ वोट बैंक तक सीमित कर दिया जाता है.


डर या विकास, क्या चुनेगी जनता

सोशल मीडिया के इस दौर में भड़काऊ भाषण और वीडियो बहुत तेजी से फैलते हैं. इससे समाज में डर और असुरक्षा का माहौल पैदा होता है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 2027 में भी ध्रुवीकरण का फॉर्मूला ही काम करेगा. या फिर उत्तर प्रदेश की जनता इस बार रोजगार, महंगाई और विकास को चुनकर राजनीति का रुख बदलेगी.


(ऊपर दिया गया कंटेंट एक फाइन-ट्यून्ड AI मॉडल का इस्तेमाल करके वीडियो से ट्रांसक्राइब किया गया है। एक्यूरेसी, क्वालिटी और एडिटोरियल इंटीग्रिटी पक्का करने के लिए, हम ह्यूमन-इन-द-लूप (HITL) प्रोसेस का इस्तेमाल करते हैं। AI शुरुआती ड्राफ्ट बनाने में मदद करता है, जबकि हमारी अनुभवी एडिटोरियल टीम पब्लिकेशन से पहले कंटेंट को ध्यान से रिव्यू, एडिट और बेहतर बनाती है। द फेडरल में, हम भरोसेमंद और इनसाइटफुल जर्नलिज़्म देने के लिए AI की एफिशिएंसी को ह्यूमन एडिटर्स की एक्सपर्टीज़ के साथ मिलाते हैं।)

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