
योगी कैबिनेट का महाविस्तार: मिशन 2027 के लिए बीजेपी का 'सोशल रिसेट'
यूपी चुनाव से पहले नाराज जातियों को साधने का मास्टरप्लान। ब्राह्मण, जाट, गुर्जर और अति पिछड़ों को सत्ता में मिली बड़ी हिस्सेदारी। बंगाल मॉडल से सपा के PDA की काट।
UP Cabinet Reshuffle : उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल का सबसे महत्वपूर्ण और संभवतः अंतिम कैबिनेट विस्तार संपन्न कर लिया है। अगले साल फरवरी 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों से महज कुछ महीने पहले किया गया यह विस्तार केवल मंत्रियों की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि यह बीजेपी का एक बड़ा 'सोशल रिसेट' है। इस कदम के जरिए पार्टी ने उन तमाम वर्गों और जातियों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया है, जो हाल के दिनों में किसी न किसी कारणवश भाजपा से छिटकते नजर आ रहे थे।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में मिली प्रचंड जीत के बाद, बीजेपी अब वहां के सफल फार्मूले को उत्तर प्रदेश की धरती पर लागू करना चाह रही है। बंगाल में महिलाओं और अति पिछड़ों की लामबंदी ने जिस तरह से नतीजे दिए, उसी तर्ज पर अब यूपी में भी 'लाभार्थी राजनीति' को 'प्रतिनिधित्व की राजनीति' से जोड़ा जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी ने इस विस्तार के जरिए यह साफ कर दिया है कि 2027 की लड़ाई के लिए पार्टी ने अपनी कमर कस ली है।
UP Cabinet expansion: Bhupendra Chaudhary, Manoj Pandey sworn in as ministers in Yogi's govt
— ANI Digital (@ani_digital) May 10, 2026
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क्यों हुई विस्तार में देरी?
काफी समय से इस कैबिनेट विस्तार की चर्चाएं लखनऊ से लेकर दिल्ली के गलियारों में तैर रही थीं। कई बार तारीखें तय हुईं लेकिन किसी न किसी वजह से इसे टाल दिया गया। राजनैतिक हल्कों में यह अटकलें भी लगाई गईं कि दिल्ली और लखनऊ के बीच समन्वय की कमी है, लेकिन पार्टी सूत्रों ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया। असल में, बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व अपनी पूरी ताकत पश्चिम बंगाल और असम के चुनावों में झोंके हुए था। रणनीति यह थी कि पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद ही यूपी और बिहार जैसे बड़े राज्यों में संगठन और सरकार का पुनर्गठन किया जाए।
ब्राह्मण और जाट समीकरणों पर फोकस
इस कैबिनेट विस्तार का सबसे बड़ा संदेश 'सोशल इंजीनियरिंग' को लेकर है। योगी सरकार से कई मुद्दों पर नाराज चल रहे ब्राह्मण समाज को साधने के लिए मनोज पांडेय को मंत्री बनाया गया है। बीजेपी को उम्मीद है कि उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और मनोज पांडेय की जोड़ी ब्राह्मणों के बीच यह संदेश देने में सफल रहेगी कि पार्टी उनके हितों के प्रति गंभीर है।
वहीं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट और गुर्जर समुदाय के असंतोष को दूर करने के लिए भी विशेष होमवर्क किया गया है। भूपेंद्र चौधरी को जाटों के बड़े चेहरे के रूप में और सोमेंद्र तोमर को गुर्जर समाज के प्रतिनिधि के तौर पर मजबूती दी गई है। लोकसभा चुनावों के दौरान पश्चिमी यूपी में जो समीकरण डगमगाते दिखे थे, उन्हें अब विधानसभा चुनाव से पहले स्थिर करने की कोशिश की गई है।
'गैर-यादव ओबीसी' से आगे बढ़कर 'माइक्रो ब्लॉक्स' तक
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बीजेपी अब सिर्फ “गैर-यादव ओबीसी” की पारंपरिक राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती। पार्टी अब “माइक्रो सोशल ब्लॉक्स” पर काम कर रही है। इसमें निषाद, मौर्य, कुशवाहा, विश्वकर्मा, प्रजापति, लोधी, पाल और बिंद जैसे छोटे लेकिन चुनावी रूप से बेहद महत्वपूर्ण समूहों को सत्ता में सीधे भागीदारी दी गई है। इसका उद्देश्य अखिलेश यादव के 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले की काट तैयार करना है।
लोधी समाज के लिए कैलाश राजपूत और वाल्मीकि समुदाय के लिए सुरेंद्र दिलेर जैसे नामों को आगे बढ़ाकर पार्टी ने यह साफ कर दिया है कि वह दलित और अति पिछड़ी जातियों के उस हिस्से को अपने पाले में लाना चाहती है, जो मायावती के कमजोर होने के बाद फिलहाल राजनीतिक विकल्प तलाश रहे हैं।
बंगाल मॉडल: महिलाओं और लाभार्थियों का गठजोड़
यूपी में बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी की व्यक्तिगत छवि रही है, लेकिन अब पार्टी समझ रही है कि केवल हिंदुत्व और कानून-व्यवस्था के भरोसे हैट्रिक लगाना मुश्किल हो सकता है। यहीं पर 'बंगाल मॉडल' की चर्चा महत्वपूर्ण हो जाती है। बंगाल में जिस तरह महिला वोट बैंक ने निर्णायक भूमिका निभाई, उसे यूपी में भी आक्रामक तरीके से लागू किया जा रहा है।
उज्ज्वला, आवास और राशन जैसी योजनाओं की महिला लाभार्थियों को अब राजनीतिक नेतृत्व से जोड़ने की तैयारी है। कैबिनेट में महिला चेहरों को महत्व देना इसी चुनावी रणनीति का हिस्सा है। बीजेपी का लक्ष्य एक ऐसा 'बहुस्तरीय ओबीसी गठबंधन' तैयार करना है जो सपा के 'मुस्लिम-यादव' समीकरण के मुकाबले अधिक समावेशी और विशाल हो।
एंटी-इंकम्बेंसी और मिशन 2027 की चुनौती
उत्तर प्रदेश में बीजेपी 2017 से लगातार सत्ता में है। दो विधानसभा और दो लोकसभा चुनाव लगातार जीतने के बाद अब पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती 'एंटी-इंकम्बेंसी' यानी सत्ता विरोधी लहर का मुकाबला करना है। पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों ने पार्टी को यह सबक दिया है कि केवल पुराने चेहरों के भरोसे मैदान में उतरना जोखिम भरा हो सकता है।
नए मंत्रियों को शामिल कर पार्टी जनता को यह संदेश देना चाहती है कि वह नई ऊर्जा और बदलाव के लिए तैयार है। दिलचस्प बात यह है कि किसी पुराने मंत्री को हटाया नहीं गया है, जिससे गुटबाजी की संभावना को कम किया जा सके। यह विस्तार 2027 के लिए एक 'लॉन्चपैड' की तरह काम करेगा, जहां नए मंत्रियों के पास प्रशासनिक कार्य से अधिक अपनी जातियों के बीच जाकर पार्टी का प्रचार करने की जिम्मेदारी होगी।
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