
अयोध्या राम मंदिर में दान की कथित चोरी ने करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और भरोसे को गहरी चोट पहुंचाई। यह मामला केवल धन का नहीं, बल्कि मंदिर प्रबंधन की जवाबदेही और विश्वास का भी है।
दिल्ली की नेताजी नगर कॉलोनी, जहाँ मेरा बचपन बीता, वहाँ एक बीस-बाईस साल का छोटा-मोटा गुंडा रहता था, जिसका नाम था काला। उसका नाम उसके काले कारनामों के बिल्कुल अनुरूप था। उसकी सबसे बदनाम आदतों में से एक थी पास के राम-शिव मंदिर से पैसे चुराना।
उसका तरीका बेहद सरल था। वह दोनों हथेलियों पर खूब सारा गोंद लगाकर मंदिर जाता। हनुमान जी के स्थान पर सिर झुकाता और सीमेंट की बेंच पर रखे सिक्कों पर अपनी हथेलियाँ रख देता। जब उसे विश्वास हो जाता कि सिक्के हथेलियों से चिपक गए हैं, तब वह धीरे-धीरे सिर उठाता, भगवान की ओर श्रद्धा का अभिनय करते हुए देखता, जोर से "जय बजरंग बली" का उद्घोष करता और आराम से मंदिर से बाहर निकल जाता।
काला कभी पकड़ा नहीं गया क्योंकि कोई भी उस गुंडे से उलझना नहीं चाहता था। उसकी हरकत से लोग घृणा तो करते थे, लेकिन डर के कारण शिकायत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे।जब मुझे अयोध्या के राम मंदिर में उस घोर अनैतिक घटना की जानकारी मिली, जिसे मंदिर के संरक्षकों ने ही अंजाम दिया, तो मेरी आँखों के सामने उसी काला की तस्वीर घूम गई।
एक महापाप
अयोध्या में जो अपराध हुआ, वह केवल चोरी नहीं बल्कि एक महापाप है। इसमें उन छोटे-बड़े दानों की खुलेआम लूट हुई, जिन्हें भारत और दुनिया भर के करोड़ों हिंदुओं ने सच्ची श्रद्धा से भगवान राम के चरणों में अर्पित किया था।राम मंदिर का निर्माण चाहे जिस राजनीतिक पृष्ठभूमि में हुआ हो, जनवरी 2024 में मंदिर खुलने के बाद वहाँ दर्शन करने वाले लाखों श्रद्धालु केवल अपनी आस्था के कारण पहुँचे। उनमें मेरे मित्र और रिश्तेदार भी शामिल थे। उनमें से अधिकांश ने मंदिर या उसके कोष के लिए अपनी श्रद्धानुसार नकद धनराशि, आभूषण या अन्य मूल्यवान वस्तुएँ दान कीं।उनमें से किसी ने भी यह कल्पना तक नहीं की होगी कि उनकी श्रद्धा से दिया गया धन उन लोगों द्वारा लूट लिया जाएगा, जो स्वयं को मंदिर का संरक्षक बताते थे।
विश्वास का टूटना
यह जानकर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि मंदिर की दैनिक नकद प्राप्ति में भारी गिरावट आई है।यह महत्वपूर्ण नहीं है कि पुलिस के अनुसार चोरी की कुल राशि 80 लाख रुपये है या उससे अधिक। मेरा मानना है, और अनेक हिंदू भी ऐसा ही सोचते हैं, कि वास्तविक रकम इससे कहीं अधिक हो सकती है।यह भी उतना महत्वपूर्ण नहीं कि चोरी करने वालों में बैंक कर्मचारी थे, ड्राइवर थे, क्लर्क थे या राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कर्मचारी। असली प्रश्न यह है कि मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर कैसे थी।
क्या केवल इस्तीफा पर्याप्त है?
ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।लेकिन यदि कोई यह मानता है कि केवल उनके इस्तीफे से समस्या का समाधान हो गया है, तो यह वास्तविकता से बहुत दूर है।चंपत राय विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ नेता रहे हैं। बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर निर्माण आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिसने अंततः भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सत्ता तक पहुँचाने में योगदान दिया।
मंदिर से जुड़े लगभग सभी महत्वपूर्ण निर्णय—कर्मचारियों की नियुक्ति से लेकर सुरक्षा व्यवस्था तक—उनकी निगरानी में होते थे। चोरी के आरोपियों में उनका निजी ड्राइवर भी शामिल बताया गया है।
एक चौंकाने वाला आश्वासन
ट्रस्ट के एक अन्य ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने भी इस्तीफा दिया है। 2024 के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में वे और उनकी पत्नी मुख्य मेजबान थे।ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी ने बयान जारी करते हुए कहा "हम सभी को आश्वस्त करते हैं कि भविष्य में ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना दोबारा नहीं होगी।"यह बयान आश्चर्यजनक भी है और बहुत कुछ उजागर भी करता है।लोग इस आश्वासन पर आसानी से विश्वास नहीं करेंगे, क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आने के बावजूद ट्रस्ट ने ऐसी मजबूत व्यवस्था विकसित नहीं की, जिससे इस प्रकार की चोरी असंभव हो जाती।
धर्म के तथाकथित रक्षक
यह सोचकर भी मन विचलित हो जाता है कि साधारण लोगों द्वारा भगवान के नाम पर दिया गया धन उन्हीं लोगों ने हड़प लिया, जो स्वयं को हिंदू धर्म का रक्षक बताते थे।यह पहली बार भी नहीं है जब राम मंदिर से जुड़े मामलों में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोप लगे हों।राजनीति और अपराध से परे सबसे बड़ा प्रश्न यही है—कोई व्यक्ति मंदिर में चोरी करने का साहस कैसे कर सकता है?समस्या केवल सुरक्षा व्यवस्था की नहीं है। असली समस्या यह है कि ऐसे लोगों के भीतर न तो आध्यात्मिकता बची और न ही भगवान का भय।
मंदिरों में चोरी दुर्लभ क्यों होती है?
भारत और विदेशों में करोड़ों मंदिर हैं। अधिकांश छोटे हैं, कई मध्यम आकार के हैं और कुछ विशाल तथा प्राचीन हैं।यदि संगठित रूप से प्राचीन मूर्तियों की चोरी को अलग कर दिया जाए, तो मंदिरों में दान की चोरी अत्यंत दुर्लभ है।इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि मंदिरों में सेवा करने वाले अधिकांश लोग कर्म के सिद्धांत को समझते हैं।चोरी हर जगह गलत है, लेकिन मंदिर की संपत्ति चुराना सबसे बड़ा अधर्म माना जाता है।अधिकांश मंदिरों में न तो नियमित ऑडिट होता है और न ही हर जगह सीसीटीवी कैमरे लगे होते हैं, फिर भी वहाँ का दान सुरक्षित रहता है।
तमिल भाषा में एक प्रसिद्ध कहावत है—"शिवन सोथु, कुल नाशम"। अर्थात—भगवान शिव या किसी भी मंदिर अथवा धार्मिक संस्था की संपत्ति, धन या भूमि का दुरुपयोग करने वाला व्यक्ति स्वयं ही नहीं, उसका पूरा परिवार या वंश भी विनाश का भागी बनता है।जब यह विश्वास मन में गहराई से बैठ जाता है, तब कोई भी व्यक्ति मंदिर की संपत्ति पर बुरी नजर डालने का साहस नहीं करता।
जहाँ राजनीति, वहाँ भक्ति कम
लेकिन यदि किसी धार्मिक स्थल से जुड़े लोगों को भीतर ही भीतर यह पता हो कि वे अपनी श्रद्धा के कारण नहीं बल्कि राजनीतिक संरक्षण के कारण वहाँ हैं, तो स्थिति बदल जाती है।अयोध्या का राम मंदिर एक ऐसे राजनीतिक-धार्मिक आंदोलन का परिणाम है, जिसका एक स्पष्ट राजनीतिक उद्देश्य भी था।यही कारण है कि 2024 की प्राण-प्रतिष्ठा को अभूतपूर्व प्रचार और भव्यता के साथ प्रस्तुत किया गया, जबकि सामान्यतः मंदिरों में लगभग हर बारह वर्ष बाद होने वाली प्राण-प्रतिष्ठा धार्मिक गरिमा और विनम्रता के साथ संपन्न होती है।
विश्वास ही सबसे बड़ी पूँजी
अधिकांश हिंदू देश के सभी प्राचीन मंदिरों के दर्शन नहीं कर पाते।इसलिए यदि कोई परिचित किसी प्रसिद्ध तीर्थ पर जाता है, तो लोग उसे अपने पैसे देकर कहते हैं कि वह उनकी ओर से मंदिर की हुंडी में दान कर दे।वापस आने पर उससे कोई रसीद नहीं माँगी जाती।क्योंकि विश्वास होता है कि मंदिर के नाम पर कोई झूठ नहीं बोलेगा।
मंदिर में 'असामाजिक तत्व'?
अयोध्या के राम मंदिर में चोरी करने वालों ने यह साबित कर दिया कि उन्हें न भगवान का भय था और न धर्म की कोई समझ।क्या ऐसे लोगों को वास्तव में धार्मिक कहा जा सकता है?यही कारण है कि राम जन्मभूमि ट्रस्ट के बयान का एक और हिस्सा अजीब लगता है।बयान में कहा गया—"हम असामाजिक, अधार्मिक और स्वार्थी तत्वों को सनातन धर्म को बदनाम करने में सफल नहीं होने देंगे।"यह कथन विचित्र इसलिए है क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है मानो चोरी किसी बाहरी व्यक्ति ने की हो, जबकि आरोप उन्हीं लोगों पर हैं जो मंदिर की व्यवस्था का हिस्सा थे।
जनता का भरोसा खो गया
जब मंदिर की संपत्ति की रक्षा करने वाले ही उसे अपने निजी लाभ के लिए घर ले जाने लगें, तब केवल मंदिर नहीं, बल्कि सनातन धर्म की प्रतिष्ठा भी गहरी चोट खाती है।जाँच अभी प्रारंभ हुई है। कौन कह सकता है कि केवल 80 लाख रुपये ही चोरी हुए? क्या कभी पूरी सच्चाई सामने आ पाएगी?एक बात निश्चित है—अयोध्या राम मंदिर के प्रबंधन को करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास दोबारा जीतने में बहुत लंबा समय लगेगा।
नेताजी नगर का काला और अयोध्या के कथित घोटाले के आरोपी—दोनों में मूल अंतर केवल चोरी की राशि का है। मानसिकता, दुर्भाग्य से, एक जैसी प्रतीत होती है।
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