
बांग्लादेशी घुसपैठियों की वापसी को लेकर केंद्र, बीएसएफ और बंगाल सरकार के अलग-अलग दावों ने भारत-बांग्लादेश संबंधों में नया कूटनीतिक तनाव पैदा कर दिया है।
दशकों से भारत में यह कहा जाता रहा है कि लाखों अवैध बांग्लादेशी प्रवासी (घुसपैठिए) देश में दाखिल हो चुके हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने भी अपने प्रमुख चुनावी वादों में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ को रोकने का मुद्दा प्रमुखता से उठाया था। माना जाता है कि इस मुद्दे का पार्टी को चुनाव में बड़ा राजनीतिक फायदा भी मिला।
अब जब राज्य में भाजपा की "डबल इंजन" सरकार बन चुकी है, तो लोगों को उम्मीद थी कि अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान कर उन्हें वापस भेजने की दिशा में ठोस कार्रवाई होगी।
केंद्र सरकार ने बांग्लादेश पर बढ़ाया दबाव
पश्चिम बंगाल में नई सरकार बनने के तुरंत बाद केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर बांग्लादेश पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया।21 मई को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साप्ताहिक प्रेस वार्ता में कहा कि कई कथित अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की नागरिकता की पुष्टि पिछले लगभग पांच वर्षों से बांग्लादेशी अधिकारियों के पास लंबित है।उन्होंने बताया कि भारत ने बांग्लादेश से इन लोगों की राष्ट्रीयता की पुष्टि करने का अनुरोध किया है। सरकार के पास ऐसे 2,369 लोगों की सूची लंबित है, जिन्हें सत्यापन पूरा होने के बाद बांग्लादेश भेजा जाना है।
'कानून के अनुसार होगी कार्रवाई'
रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट कहा कि भारत में अवैध रूप से रहने वाले विदेशी नागरिकों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी, चाहे वे बांग्लादेशी हों या किसी अन्य देश के नागरिक।उन्होंने कहा कि भारत में बड़ी संख्या में ऐसे बांग्लादेशी नागरिक मौजूद हैं, जिन्हें कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद निर्वासित किया जाना है।
जायसवाल के मुताबिक, इनमें से कई लोग अपनी जेल की सजा भी पूरी कर चुके हैं, लेकिन उनकी नागरिकता की पुष्टि वर्ष 2020 से लंबित है। उन्होंने बांग्लादेश सरकार से आग्रह किया कि सत्यापन प्रक्रिया में तेजी लाई जाए ताकि जिन लोगों को वापस भेजा जाना है, उन्हें जल्द बांग्लादेश भेजा जा सके।
घुसपैठ के दावों-सरकारी आंकड़ों में बड़ा अंतर
भारत-बांग्लादेश सीमा से लगे राज्यों में अवैध प्रवास कोई नई बात नहीं है और इसे लंबे समय से एक वास्तविक समस्या माना जाता रहा है।हालांकि, यहां एक बड़ा सवाल खड़ा होता है।एक तरफ चुनावी सभाओं में नेताओं द्वारा वर्षों से "लाखों घुसपैठियों" की बात कही जाती रही है, जबकि दूसरी ओर विदेश मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों में केवल 2,369 लोगों के निर्वासन की प्रक्रिया लंबित बताई गई है।यानी राजनीतिक दावों और सरकारी रिकॉर्ड के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।यही आंकड़ों का यह अंतर अब पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू बन गया है।अवैध बांग्लादेशी नागरिकों को वापस भेजने (पुशबैक) के मामले में भी अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं।
सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ), जिस पर बांग्लादेशी नागरिकों को जबरन सीमा पार भेजने के आरोप लगे हैं, का कहना है कि उसने इस वर्ष मार्च से अब तक 2,390 लोगों को बांग्लादेश वापस भेजा है।चूंकि बांग्लादेश इस कार्रवाई को मौजूदा निर्वासन प्रक्रिया का उल्लंघन बताते हुए लगातार विरोध जता रहा है, इसलिए माना जा रहा है कि बीएसएफ इस पूरे मामले पर संयमित रुख अपनाना चाहती है।
मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के बड़े दावे
वहीं पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी इस मुद्दे पर लगातार आक्रामक बयान दे रहे हैं।8 जून को उन्होंने दावा किया कि राज्य सरकार अब तक करीब 4,800 लोगों को बांग्लादेश भेज चुकी है, जबकि 836 लोग होल्डिंग सेंटरों में रखे गए हैं।भाजपा की एक बैठक में उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के लिए सीमा सुरक्षा और अवैध घुसपैठ सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि जिन घुसपैठियों पर नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) लागू नहीं होता, उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।मुख्यमंत्री के अनुसार, पहले ऐसे लोगों को जेल भेज दिया जाता था, लेकिन अब गृह मंत्रालय के निर्देशों के मुताबिक उन्हें सीधे बीएसएफ को सौंपा जा रहा है। इसी उद्देश्य से सीमावर्ती जिलों में विशेष होल्डिंग सेंटर बनाए गए हैं।उन्होंने दावा किया कि इन केंद्रों से अब तक 4,800 लोगों को बांग्लादेश भेजा जा चुका है और 836 अन्य लोगों को भी जल्द वापस भेजने की तैयारी चल रही है।सुवेंदु अधिकारी ने यह भी कहा कि यह अभियान लगातार जारी रहेगा क्योंकि राज्य की जनसंख्या संरचना (डेमोग्राफी) में बड़ा बदलाव आया है।
सीमा बैठक से पहले बढ़ा विवाद
मुख्यमंत्री के ये बयान ऐसे समय आए जब 8 से 11 जून के बीच नई दिल्ली में बीएसएफ और बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) के महानिदेशक स्तर की 57वीं द्विवार्षिक बैठक आयोजित होने वाली थी।इस बैठक में बांग्लादेश ने कथित पुशबैक के मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया।तनाव इतना बढ़ गया कि बैठक समाप्त होने के बाद दोनों देशों की सीमा सुरक्षा एजेंसियों ने परंपरा के अनुसार संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस तक नहीं की। इसे दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव का संकेत माना गया।
दो सप्ताह में दोगुना हुआ दावा
23 जून को मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने विधानसभा में और भी बड़ा दावा किया।उन्होंने कहा कि उनकी सरकार अब तक 10,000 अवैध घुसपैठियों को बांग्लादेश वापस भेज चुकी है, जबकि 1,800 लोग अभी भी 12 होल्डिंग सेंटरों में मौजूद हैं और उन्हें भी जल्द भेजा जाएगा।उन्होंने कहा कि राज्य सरकार हर दिन अवैध प्रवासियों को वापस भेज रही है।अगर मुख्यमंत्री के दावे सही माने जाएं, तो इसका अर्थ है कि जून के शुरुआती दो सप्ताह में ही पुशबैक की संख्या लगभग दोगुनी हो गई।यही वजह है कि बीएसएफ, राज्य सरकार और केंद्र सरकार के अलग-अलग आंकड़ों ने पूरे मामले को और अधिक विवादित बना दिया है।
बांग्लादेश का दावा और बढ़ता विवाद
बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) का दावा है कि उसने मई और जून के दौरान सीमा सुरक्षा बल (BSF) द्वारा किए गए कम से कम 30 पुशबैक प्रयासों को विफल कर दिया।बांग्लादेश में सोशल मीडिया पर कई लोगों ने BGB के जवानों की तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने भारतीय सीमा बल की कार्रवाई का मजबूती से सामना किया। एक मामले में जब बीएसएफ ने नो-मैन्स लैंड में फंसे कुछ लोगों को मानवीय आधार पर वापस ले लिया, तो बांग्लादेश के कुछ इस्लामवादी संगठनों ने इसे अपनी जीत बताया और BGB की सराहना की।
हालांकि, बांग्लादेश सरकार या BGB ने आधिकारिक तौर पर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी द्वारा बताए गए पुशबैक के आंकड़ों का सीधा खंडन नहीं किया। केवल जमात-ए-इस्लामी के एक सांसद ने भारत सरकार को पत्र लिखकर सुवेंदु अधिकारी के बयानों पर रोक लगाने की मांग की।वास्तविक संख्या कितनी है, इसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि अब तक नहीं हो सकी है।
राजनीति और कूटनीति आमने-सामने
विश्लेषकों का मानना है कि भारत सरकार और बीएसएफ इस पूरे मामले को इसलिए ज्यादा प्रचारित नहीं करना चाहते क्योंकि उन पर निर्वासन की तय प्रक्रिया का पालन किए बिना लोगों को सीमा पार भेजने के आरोप लग सकते हैं। लेकिन दूसरी ओर मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी लगातार सार्वजनिक मंचों और विधानसभा में पुशबैक के विस्तृत आंकड़े पेश कर रहे हैं। इससे केंद्र सरकार की संतुलित कूटनीतिक रणनीति कमजोर पड़ती दिखाई देती है।यह मामला इस बात का उदाहरण बन गया है कि कई बार घरेलू राजनीति, विदेश नीति पर भारी पड़ जाती है।
भारत-बांग्लादेश संबंधों पर असर
इन घटनाओं के बाद भारत और बांग्लादेश के संबंधों में तनाव बढ़ गया है। दोनों देशों के सोशल मीडिया पर भी बयानबाजी तेज हो गई है। पश्चिम बंगाल में हिंदुत्व समर्थक समूह और बांग्लादेश में इस्लामवादी संगठनों के बीच तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।एक समय था जब पश्चिम बंगाल के नेता ज्योति बसु और प्रणब मुखर्जी ने भारत-बांग्लादेश संबंधों को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
विश्लेषकों के अनुसार, वर्ष 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा तीस्ता जल बंटवारा समझौते का विरोध किए जाने के बाद दोनों देशों के संबंधों में नई चुनौतियां सामने आईं। बाद के वर्षों में बांग्लादेश की राजनीति और भारत के साथ उसके रिश्तों को लेकर भी कई विवाद सामने आए।
सुवेंदु अधिकारी के बयान और बढ़ती चिंता
सुवेंदु अधिकारी अक्सर जमात-ए-इस्लामी की आलोचना करते हैं, जिसका बांग्लादेश में अवामी लीग और कट्टरपंथ विरोधी वर्ग स्वागत करता है लेकिन जब वह यह कहते हैं कि भारतीय सेना "कुछ ही मिनटों में बांग्लादेश को संभाल सकती है", तो इससे सीमा पार राजनीतिक माहौल और अधिक गर्म हो जाता है। ऐसे बयान ढाका में भारत के नए उच्चायुक्त के लिए कूटनीतिक चुनौतियां भी बढ़ा सकते हैं।
तनाव कम करने के लिए कूटनीति जरूरी
सीमा पर दोनों देशों की सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर हैं और कुछ स्थानों पर गोलीबारी की घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि तनाव कम करने और संबंधों को सामान्य बनाने के लिए मजबूत कूटनीतिक प्रयासों की आवश्यकता होगी। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि ऐसे समय में, जब पाकिस्तान सिंधु जल संधि के मुद्दे पर लगातार आक्रामक रुख अपना रहा है और भारत की चीन के साथ सीमा विवाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, तब दो मोर्चों पर तनाव भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों के अनुकूल नहीं माना जा सकता।
उनका कहना है कि चुनावी राजनीति में आक्रामक बयान लाभ पहुंचा सकते हैं, लेकिन विदेश नीति में संतुलन, संवाद और कूटनीति ही सबसे प्रभावी रास्ता होते हैं।इसी सोच के तहत वर्ष 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान सैन्य हस्तक्षेप का फैसला किया था, ताकि भविष्य में भारत को ऐसी जटिल दो-मोर्चा सुरक्षा स्थिति का सामना न करना पड़े।


