
टैगोर जयंती पर शपथ लेने वाली बंगाल सरकार पर आरोप हैं कि उसके फैसले मानवतावाद, धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ हैं।
पश्चिम बंगाल में भाजपा की पहली सरकार के शपथ ग्रहण समारोह को लेकर शुरुआत से ही राजनीतिक और सांस्कृतिक संदेश देने की कोशिश साफ दिखाई दी। भाजपा ने अपनी सरकार के शपथ ग्रहण के लिए ‘पोइला बोइशाख’ यानी बंगाली कैलेंडर के पहले महीने बैशाख के 25वें दिन को चुना, जो इस वर्ष 9 मई को पड़ा। यही दिन महान कवि और नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती के रूप में मनाया जाता है।
बंगाल में यह दिन केवल एक सांस्कृतिक अवसर नहीं, बल्कि बंगाली अस्मिता, कला और साहित्यिक परंपरा का प्रतीक माना जाता है। भाजपा ने इस तारीख का चयन स्पष्ट राजनीतिक उद्देश्य से किया—टैगोर की विरासत को अपने साथ जोड़ने की कोशिश के रूप में।
शपथ के बाद जोरासांको पहुंचे सुवेंदु अधिकारी
शपथ ग्रहण के तुरंत बाद मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड से सीधे जोरासांको ठाकुरबाड़ी पहुंचे, जो रवींद्रनाथ टैगोर का पैतृक घर है। यह कदम सांस्कृतिक और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से प्रतीकात्मक माना गया।हालांकि, सरकार के शुरुआती फैसलों और उसके राजनीतिक संदेशों को देखकर यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या भाजपा वास्तव में टैगोर की विचारधारा के करीब है, या सिर्फ उनकी विरासत का राजनीतिक इस्तेमाल करना चाहती है।
टैगोर की सोच के विपरीत फैसले
लेख में कहा गया है कि सरकार बनने के कुछ ही दिनों के भीतर लिए गए कई फैसले टैगोर की सोच और उनके मानवतावादी दृष्टिकोण के खिलाफ दिखाई देते हैं।सबसे पहले, शपथ ग्रहण समारोह का अत्यधिक हिंदू धार्मिक प्रतीकों से भरा होना आलोचना का कारण बना। मंच पर देवी दुर्गा और काली मंदिर की छवियां लगाई गईं। कार्यक्रम में धार्मिक नारे, भगवद गीता का पाठ और बड़े पैमाने पर हिंदू धार्मिक अनुष्ठान शामिल थे।
आलोचकों का कहना है कि बंगाल जैसे बहुधार्मिक और धर्मनिरपेक्ष राज्य में किसी सरकारी कार्यक्रम का केवल हिंदू प्रतीकों तक सीमित रहना बहुसंख्यकवादी राजनीति को दर्शाता है।
मदरसा शिक्षा विभाग को लेकर विवाद
सरकार ने क्षुदिराम टुडू को अल्पसंख्यक और मदरसा शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी दी, जिसे लेकर भी विवाद हुआ। भाजपा की चुनावी जीत से पहले टुडू कई बार मदरसों के खिलाफ बयान दे चुके थे और उन पर कार्रवाई की मांग कर चुके थे। उन्होंने कई मदरसों को “अवैध” भी बताया था, हालांकि इसके समर्थन में कोई ठोस प्रमाण पेश नहीं किया गया।इन घटनाओं को टैगोर के उस भारत के विचार के विपरीत माना जा रहा है, जहां विविधता और सह-अस्तित्व को सबसे बड़ी ताकत माना गया था।
भाजपा की राष्ट्रवादी प्रतीकों को अपनाने की राजनीति
भाजपा लंबे समय से उन राष्ट्रीय नेताओं और प्रतीकों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करती रही है, जिनकी ऐतिहासिक पहचान कांग्रेस या अन्य विचारधाराओं से रही है।1990 के दशक से भाजपा ने सरदार वल्लभभाई पटेल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और अन्य नेताओं की विरासत को अपने राजनीतिक विमर्श में शामिल करना शुरू किया। अब उसी क्रम में रवींद्रनाथ टैगोर को भी भाजपा अपने प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है।सुवेंदु अधिकारी का जोरासांको दौरा इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
टैगोर का मानवतावाद बनाम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
रवींद्रनाथ टैगोर की सोच सार्वभौमिक मानवतावाद पर आधारित थी। वे भारत को अनेक संस्कृतियों, भाषाओं और समुदायों का संगम मानते थे। दूसरी ओर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और उससे जुड़ी विचारधारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदू राष्ट्र की अवधारणा पर जोर देती रही है।
टैगोर ने राष्ट्रवाद के कट्टर रूप का कई बार विरोध किया था। उनका मानना था कि जब राष्ट्रवाद मानवता से ऊपर रखा जाता है, तब वह समाज के लिए खतरनाक हो जाता है।1908 में अपने मित्र ए.एम. बोस को लिखे एक पत्र में टैगोर ने कहा था:“देशभक्ति हमारा अंतिम आध्यात्मिक आश्रय नहीं हो सकती। मैं कभी देशभक्ति को मानवता से ऊपर नहीं रखूंगा।”
‘भारत तीर्थ’ में विविधता का संदेश
अपने प्रसिद्ध काव्य ‘भारत तीर्थ’ में टैगोर ने भारत को विभिन्न जातियों और संस्कृतियों के संगम के रूप में चित्रित किया। उन्होंने लिखा कि आर्य, द्रविड़, चीनी, हूण, पठान और मुगल सब मिलकर भारत की पहचान बने हैं। लेख में कहा गया है कि आज जिस तरह मध्यकालीन भारतीय इतिहास को केवल “विदेशी शासन” और “गुलामी” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, वह टैगोर की समावेशी सोच के विपरीत है।
गर्गा चटर्जी की गिरफ्तारी पर सवाल
सरकार के शुरुआती फैसलों में सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी गर्गा चटर्जी की गिरफ्तारी को भी महत्वपूर्ण उदाहरण बताया गया है। उन्हें विधानसभा चुनाव के दौरान EVM को लेकर सोशल मीडिया पोस्ट करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया।आलोचकों का आरोप है कि यह कदम लोकतांत्रिक असहमति को दबाने की कोशिश है। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल राइट्स (PUCR) ने भी इसे राजनीतिक अभिव्यक्ति के अपराधीकरण की दिशा में खतरनाक कदम बताया।टैगोर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विचारों की विविधता के समर्थक थे। ऐसे में यदि वे आज जीवित होते, तो संभवतः इस तरह की कार्रवाई का विरोध करते।
टैगोर की विरासत और राजनीतिक प्रतीकवाद
केवल टैगोर की तस्वीरें लगाने, उनके नाम का उल्लेख करने या उनके घर जाने से उनकी विचारधारा को नहीं अपनाया जा सकता।टैगोर की असली विरासत मानवता, स्वतंत्र सोच, सांस्कृतिक विविधता और सहिष्णुता में निहित है। यदि सरकार के फैसले इन मूल्यों के विपरीत जाते हैं, तो उनकी विरासत को राजनीतिक रूप से अपनाने की कोशिश महज प्रतीकात्मक और भ्रामक मानी जाएगी।
(द फेडरल हर तरह के नज़रिए और राय पेश करने की कोशिश करता है। आर्टिकल में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक की हैं और ज़रूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को दिखाते हों।)


