Debashis Chakrabarti

बंगाल जीत के बाद क्या भारत में बदल रहा है लोकतंत्र का चेहरा?


बंगाल जीत के बाद क्या भारत में बदल रहा है लोकतंत्र का चेहरा?
x

पश्चिम बंगाल चुनाव में बीजेपी की जीत के साथ वोटर लिस्ट, SIR और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर देशभर में नई बहस छिड़ गई है।

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत को लोकतंत्र के विस्तार की बड़ी सफलता के तौर पर पेश किया गया। लेकिन हकीकत में यह चुनाव इस बात का संकेत बन गया कि भारत में चुनावी राजनीति किस तरह संस्थागत नियंत्रण, प्रशासनिक दखल और बहुसंख्यकवादी राजनीति के जरिए बदल रही है। अब सवाल सिर्फ वोट डालने का नहीं रह गया, बल्कि यह भी है कि आखिर वोट डालने की इजाजत किसे मिलेगी।

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की बड़ी जीत को नरेंद्र मोदी के “नए भारत” की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में गिना जाएगा। लंबे समय तक बंगाल हिंदुत्व राजनीति के प्रभाव से बाहर माना जाता था। यह राज्य स्वतंत्रता आंदोलन, मजदूर आंदोलनों, किसान संघर्षों, शरणार्थी राजनीति, साहित्यिक आधुनिकता और मजबूत धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक सोच की जमीन रहा है। जब बीजेपी उत्तर और पश्चिम भारत में तेजी से बढ़ रही थी, तब भी बंगाल उसके लिए चुनौती बना हुआ था। अब वह दीवार भी टूट चुकी है।

लोकतंत्र के बदलते मायने

बंगाल में बीजेपी की जीत सिर्फ एक चुनावी नतीजा नहीं मानी जा रही। इसे भारतीय लोकतंत्र के बदलते स्वरूप के रूप में देखा जा रहा है, जहां संवैधानिक लोकतंत्र धीरे-धीरे संस्थागत नियंत्रण, बहुसंख्यक राष्ट्रवाद और “मैनेज्ड इलेक्शन” की तरफ बढ़ता दिखाई दे रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में अपेक्षा से कमजोर प्रदर्शन के बाद बीजेपी ने बंगाल में मिली जीत को अपनी ताकत के नए प्रतीक के रूप में पेश किया। लेकिन इस जीत के पीछे एक बड़ा विवाद भी रहा — वोटर लिस्ट का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR)।

आरोप लगे कि चुनाव से पहले लाखों मतदाताओं के नाम या तो हटाए गए, या सत्यापन के नाम पर अटकाए गए। आलोचकों का कहना है कि यह सिर्फ चुनाव नहीं था, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश भी थी।

वोटर लिस्ट पर विवाद

सरकारी तौर पर SIR प्रक्रिया का मकसद डुप्लीकेट और “अवैध” वोटरों को हटाना बताया गया। लेकिन विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों का दावा है कि यह स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा वोटर वेरिफिकेशन अभियान बन गया।बताया गया कि सिर्फ बंगाल में ही 90 लाख से ज्यादा नामों की जांच, रोक या हटाने की प्रक्रिया हुई। पहली बार ऐसा माहौल बना, जहां वोट देने का अधिकार साबित करने की जिम्मेदारी नागरिकों पर आ गई।

सबसे ज्यादा असर गरीबों, प्रवासी मजदूरों, महिलाओं, बुजुर्गों और मुस्लिम समुदाय पर पड़ा। कई मजदूर दूसरे राज्यों में काम करते थे और तय समय में सत्यापन नहीं करा सके। कई लोगों के आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी में नाम या पते की अलग-अलग जानकारी होने से दिक्कतें आईं।

शादी के बाद महिलाओं के सरनेम बदलने के कारण भी सवाल उठे। वहीं मुस्लिम समुदाय को लेकर आरोप लगे कि AI आधारित जांच प्रणाली ने उर्दू, बंगाली और अंग्रेजी में नामों की अलग-अलग स्पेलिंग को “संदिग्ध” मान लिया।

जीत के अंतर से ज्यादा हटे वोटर

कई विधानसभा सीटों पर बीजेपी की जीत का अंतर उन वोटरों की संख्या से कम बताया गया, जिनके नाम हटाए गए या विवादित बने रहे। यही वजह है कि विपक्ष ने चुनावी नतीजों की नैतिक वैधता पर सवाल उठाए।बीजेपी ने इस पूरी प्रक्रिया को “बांग्लादेशी घुसपैठ” रोकने की जरूरत बताया। लेकिन आलोचकों का कहना है कि बंगाल में “घुसपैठ” का मुद्दा लंबे समय से मुख्य रूप से बंगाली मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल होता रहा है।

चुनाव आयोग पर उठे सवाल

भारत का चुनाव आयोग कभी दुनिया के सबसे मजबूत चुनावी संस्थानों में गिना जाता था। लेकिन बंगाल चुनाव के बाद उसकी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठे।विपक्षी दलों ने आयोग पर पारदर्शिता की कमी, पक्षपात और चुनिंदा कार्रवाई के आरोप लगाए। विवाद तब और बढ़ गया जब चुनाव प्रक्रिया से जुड़े कुछ अधिकारियों को बाद में नई जिम्मेदारियां दी गईं।

आलोचकों का कहना है कि इससे यह धारणा मजबूत हुई कि संवैधानिक संस्थाएं सरकार के प्रभाव में काम कर रही हैं। कई विशेषज्ञों ने इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं के धीरे-धीरे कमजोर होने का संकेत बताया।

अदालतों की भूमिका पर भी बहस

वोटर लिस्ट से नाम हटने के बाद लाखों लोगों ने अपील दायर की। लेकिन मतदान से पहले करोड़ों में से लाखों मामलों का निपटारा नहीं हो सका।सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति दी, लेकिन जिनकी अपील लंबित थी, उन्हें वोट डालने की अनुमति नहीं मिली। इस फैसले को लेकर भी बहस छिड़ी कि क्या लोकतांत्रिक अधिकारों से पहले प्रशासनिक प्रक्रिया को प्राथमिकता दी गई।

हिंदुत्व और नया राजनीतिक ढांचा

विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में बीजेपी की जीत सिर्फ एक राज्य की जीत नहीं, बल्कि हिंदुत्व की व्यापक राजनीतिक परियोजना का हिस्सा है।2024 के बाद बीजेपी ने अपनी दीर्घकालिक राजनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए कई मोर्चों पर काम तेज किया। इनमें परिसीमन (Delimitation), वोटर वेरिफिकेशन अभियान और “वन नेशन, वन इलेक्शन” जैसे प्रस्ताव शामिल बताए जा रहे हैं।आलोचकों का कहना है कि इन कदमों से संघीय ढांचे और क्षेत्रीय दलों की भूमिका कमजोर हो सकती है।

आर्थिक मुद्दों से ध्यान भटकाने का आरोप

लेख में यह भी कहा गया है कि बेरोजगारी, महंगाई, खेती संकट और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों को सांप्रदायिक बहसों में बदल दिया गया।आलोचकों का आरोप है कि हिंदुत्व राजनीति आर्थिक असंतोष को अल्पसंख्यकों की तरफ मोड़ने का काम करती है, जिससे असली आर्थिक सवाल पीछे छूट जाते हैं।

बंगाल से मिला बड़ा संकेत

पश्चिम बंगाल का चुनाव अब सिर्फ एक राज्य का चुनाव नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।आलोचकों के मुताबिक, लोकतंत्र सिर्फ चुनाव कराने से नहीं चलता, बल्कि इस बात से तय होता है कि हर नागरिक को बराबरी से भागीदारी का अधिकार मिले।

उनका कहना है कि अगर बड़ी संख्या में लोग वोटर लिस्ट से बाहर होने के डर में जीने लगें, संस्थाओं पर भरोसा कमजोर हो जाए और राजनीति पूरी तरह धार्मिक ध्रुवीकरण पर टिक जाए, तो लोकतंत्र केवल प्रक्रिया बनकर रह जाता है।

कभी बीजेपी के विस्तार के सामने सबसे बड़ी दीवार माने जाने वाला बंगाल अब एक नए राजनीतिक दौर की शुरुआत का प्रतीक बन गया है — ऐसा दौर, जहां चुनाव तो होते रहेंगे, लेकिन लोकतंत्र की आत्मा लगातार कमजोर पड़ती जाएगी।

Next Story