
बंगाल में सफलता के बाद बीजेपी अब कर्नाटक मॉडल और सांप्रदायिक मुद्दों के सहारे तमिलनाडु-केरल में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश में है।
दक्षिणी राज्यों में कर्नाटक पहला ऐसा राज्य था जहाँ बीजेपी का उभार हुआ, और इसकी बड़ी वजह सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील विवाद बने।1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद पश्चिम बंगाल उन गिने-चुने राज्यों में था जहाँ सांप्रदायिक हिंसा नहीं हुई। उस समय राज्य में वाम मोर्चा की सरकार थी। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण बढ़ चुका है और हिंदुत्व की राजनीति करने वाली बीजेपी सत्ता में आ गई है।
वाम मोर्चा के 34 साल के शासनकाल में सांप्रदायिक दंगे काफी हद तक नियंत्रित रहे। लेकिन 2011 में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद हालात बदलने लगे। बीजेपी को यहाँ अपनी राजनीति फैलाने के लिए उपजाऊ जमीन मिली। उसने हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच विभाजन पैदा करने की रणनीति अपनाई।
बीजेपी ने बांग्लादेश से घुसपैठ का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। धीरे-धीरे ऐसा माहौल बनाया गया कि बंगाली बोलने वाले मुसलमानों को पहले “बाहरी” माना जाने लगा और बाद में उन्हें अपनी नागरिकता साबित करनी पड़े। जबकि पश्चिम बंगाल में लगभग 2.5 करोड़ मुसलमान रहते हैं, जो राज्य की आबादी का करीब 27 प्रतिशत हैं।
घुसपैठ की कहानी मीडिया में लगातार दिखाई गई, लेकिन इन दावों के समर्थन में कभी ठोस और विश्वसनीय आंकड़े सामने नहीं आए। ‘द फेडरल’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, हिंदुत्व संगठनों द्वारा बताए जाने वाले लाखों घुसपैठियों के मुकाबले, विदेश मंत्रालय के आंकड़ों में केवल 3,000 से कम संदिग्ध बांग्लादेशियों के मामले जांच और निर्वासन के लिए लंबित हैं।
इसके साथ ही बीजेपी ने लगातार यह प्रचार किया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मुस्लिम समुदाय का “तुष्टिकरण” कर रही हैं। इसका मकसद भी धार्मिक ध्रुवीकरण को मजबूत करना था, और यह रणनीति काफी हद तक सफल रही।
तुष्टिकरण और राजनीतिक प्रतीक
उदाहरण के तौर पर, राज्य सरकार द्वारा मौलवियों और मुअज्जिनों को मासिक मानदेय देने को “तुष्टिकरण” बताया गया, जबकि हिंदू पुजारियों को मिलने वाले समान भत्तों को नजरअंदाज कर दिया गया।
इसी तरह, 2023 में दुर्गा पूजा के लिए टीएमसी सरकार ने पूजा पंडाल लगाने वाले क्लबों को 280 करोड़ रुपये दिए, लेकिन इसे तुष्टिकरण नहीं कहा गया।
हालिया विधानसभा चुनावों के दौरान विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया भी विवादों में रही। आरोप लगा कि लाखों मतदाताओं के नाम जल्दबाजी में सूची से हटा दिए गए। रिपोर्टों के अनुसार, प्रभावित लोगों में लगभग 65 प्रतिशत मुसलमान थे।मुर्शिदाबाद जिले में करीब 5 लाख वोटर हटाए गए, उत्तर 24 परगना में 3 लाख से अधिक और मालदा में लगभग 2.5 लाख नाम सूची से काटे गए। ये तीनों जिले मुस्लिम बहुल हैं।आखिरकार बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में 206 सीटें जीत लीं।इसके विपरीत, तमिलनाडु में बीजेपी 27 सीटों में से केवल एक सीट जीत पाई और केरल में 97 सीटों में से मात्र तीन सीटें।
दक्षिण भारत में बीजेपी की सीमाएं
तमिलनाडु और केरल में बीजेपी की सीमित सफलता के पीछे कई कारण हैं, लेकिन सांप्रदायिक सौहार्द की परंपरा सबसे बड़ा कारण मानी जाती है।हालांकि बीजेपी और उससे जुड़े हिंदुत्व संगठनों ने कोशिशें जरूर कीं।
तमिलनाडु में मदुरै के पास थिरुपराकुंड्रम विवाद को उछाला गया, जहाँ एक पहाड़ी पर हिंदू मंदिर के पास मुस्लिम दरगाह स्थित है। लेकिन यह विवाद ज्यादा नहीं चल पाया क्योंकि दोनों समुदाय वर्षों से साथ रहते आए हैं और जनता ने इसे राजनीतिक मुद्दा नहीं बनने दिया।कन्याकुमारी जिले में पहले हिंदू श्रद्धालुओं और ईसाई मछुआरों के बीच झड़पें हुई थीं, जिसके कारण बीजेपी को वहाँ कुछ समर्थन मिला। 2021 में उसने नागरकोइल सीट जीती थी।कोयंबटूर में भी, जहाँ पहले इस्लामी संगठनों से जुड़े धमाके हुए थे, बीजेपी को हमेशा चुनावी उम्मीद रही है।
केरल और सबरीमला
केरल में सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा बीजेपी के लिए बड़ा राजनीतिक अवसर बन सकता था।2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी। बीजेपी ने इसका विरोध किया और आंदोलन का नेतृत्व करने की कोशिश की।लेकिन कांग्रेस ने भी फैसले का विरोध शुरू कर दिया, जिससे बीजेपी का मुद्दा कमजोर पड़ गया। वामपंथी सरकार भी धीरे-धीरे अपने खुले समर्थन से पीछे हट गई।
कांग्रेस और वाम दल दोनों को डर था कि सबरीमला विवाद धार्मिक ध्रुवीकरण को बढ़ा सकता है और बीजेपी इसका फायदा उठा सकती है। इसलिए दोनों ने किसी हद तक एक जैसी रणनीति अपनाई।
कर्नाटक मॉडल
दक्षिण भारत में बीजेपी का सबसे बड़ा उभार कर्नाटक में हुआ।1990 के दशक में हुबली के इदगाह मैदान विवाद ने सांप्रदायिक माहौल बनाया। यह विवाद बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद इतना बड़ा बना कि इसे दक्षिण का “अयोध्या” कहा जाने लगा।विवाद उस मैदान को लेकर था जिसे 1921 में हुबली नगरपालिका ने अंजुम-ए-इस्लाम नामक मुस्लिम संस्था को लीज पर दिया था।
बीजेपी और हिंदुत्व संगठनों ने वहाँ राष्ट्रीय पर्वों पर झंडारोहण की मांग की। मुस्लिम पक्ष को डर था कि भीड़ धार्मिक ढांचे को नुकसान पहुँचा सकती है, जैसा अयोध्या में हुआ था।यह विवाद इतना बढ़ा कि बीजेपी को राजनीतिक फायदा मिला। 1989 में विधानसभा में उसकी केवल 4 सीटें थीं, जो 1994 में बढ़कर 40 हो गईं।
इसके बाद बाबा बुदनगिरी विवाद खड़ा किया गया। यह कर्नाटक के चिकमंगलूर स्थित एक प्राचीन दरगाह-मंदिर परिसर को लेकर था, जहाँ हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय पूजा करते थे।बीजेपी और हिंदुत्व संगठनों ने मांग की कि यह स्थल केवल हिंदुओं को सौंपा जाए। यह विवाद आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
ध्रुवीकरण की राजनीति और उसकी सीमा
कर्नाटक में सत्ता में आने के बाद बीजेपी ने कई ऐसे कदम उठाए जिन्हें अल्पसंख्यकों को अलग-थलग करने की कोशिश माना गया।हिजाब विवाद के तहत स्कूलों में हिजाब पर रोक लगाई गई। हिंदुत्व संगठनों ने मुस्लिम व्यापारियों को हिंदू मेलों से बाहर निकालने की कोशिश की।ईसाई समुदाय भी निशाने पर रहा। 2021 में पीयूसीएल ने कर्नाटक में ईसाइयों पर कम से कम 39 हिंसक घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया।लेकिन बीजेपी की यह रणनीति उलटी पड़ गई। 2023 के चुनावों में कांग्रेस ने 224 में से 136 सीटें जीतकर भारी बहुमत हासिल किया, जबकि बीजेपी केवल 66 सीटों पर सिमट गई।
अब नजर दक्षिण पर
भले ही बीजेपी को तमिलनाडु और केरल में बड़ी सफलता नहीं मिली हो, लेकिन उसके राजनीतिक इतिहास को देखते हुए माना जा रहा है कि पार्टी इन राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश जारी रखेगी।आरएसएस और उससे जुड़े संगठन अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए नए मुद्दे तलाशेंगे, और सबसे आसान रास्ता सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ही माना जा रहा है।
तमिलनाडु में अभिनेता से नेता बने सी. जोसेफ विजय ने बीजेपी से दूरी बनाए रखी है और कांग्रेस व अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों के करीब दिखाई दे रहे हैं।इसके बाद सोशल मीडिया पर विजय के धर्म और उनके परिवार की कथित ईसाई सोच को लेकर कई अपुष्ट और बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए संदेश फैलने लगे हैं।
कई लोग इसे बीजेपी समर्थक समूहों द्वारा भविष्य की सांप्रदायिक राजनीति की तैयारी मान रहे हैं।बीजेपी नेतृत्व बार-बार यह याद दिलाता रहा है कि कभी पश्चिम बंगाल विधानसभा में उसकी सिर्फ एक सीट थी। फिर वह 77 सीटों तक पहुँची और अब 206 सीटें जीत चुकी है।आलोचकों का कहना है कि जिस रणनीति से पश्चिम बंगाल में यह सफलता मिली, उसी मॉडल को अब तमिलनाडु और केरल में दोहराने की कोशिश की जा सकती है।


