Debashis Chakrabarti

क्या भारत एकदलीय राजनीति की ओर बढ़ रहा है? विपक्ष पर बड़ा सवाल


क्या भारत एकदलीय राजनीति की ओर बढ़ रहा है? विपक्ष पर बड़ा सवाल
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भारतीय जनता पार्टी के बढ़ते राजनीतिक वर्चस्व और कमजोर होते विपक्ष के कारण भारत में लोकतांत्रिक संतुलन पर सवाल उठ रहे हैं।

भारतीय लोकतंत्र लंबे समय तक एक जीवंत और बहसों से भरे राजनीतिक मंच की तरह रहा, जहां विभिन्न विचारधाराएं और क्षेत्रीय ताकतें सत्ता को चुनौती देती थीं। लेकिन अब राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। सवाल सिर्फ यह नहीं रह गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार चुनाव कैसे जीत रहे हैं, बल्कि यह भी है कि उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी प्रभावी जवाब देने में क्यों असफल हो रहे हैं।बंगाल से बिहार, दिल्ली से महाराष्ट्र तक देश की राजनीति केवल चुनावों से नहीं, बल्कि विपक्ष की कमजोर होती संरचना के जरिए नए रूप में ढलती नजर आ रही है।

कांग्रेस मुक्त भारत से आगे बढ़ती राजनीति

जब 2014 में मोदी ने “कांग्रेस मुक्त भारत” का नारा दिया था, तब इसे कई लोगों ने महज चुनावी बयान माना था। लेकिन एक दशक बाद यह नारा अब राजनीतिक रणनीति जैसा दिखाई देने लगा है।विश्लेषकों का मानना है कि लोकतंत्र केवल चुनाव खत्म होने से नहीं, बल्कि राजनीतिक असंतुलन से भी कमजोर हो सकता है। किसी सत्तारूढ़ दल को विपक्ष पर प्रतिबंध लगाने की जरूरत नहीं होती, यदि वह उसे धीरे-धीरे अप्रासंगिक बना दे।

कांग्रेस का पतन और विपक्ष की कमजोरी

कांग्रेस का पतन लंबे समय से जारी था। वंशवाद, वैचारिक भ्रम, संगठनात्मक कमजोरी और नेतृत्व संकट ने पार्टी को कमजोर कर दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का 206 सीटों से घटकर 44 सीटों पर पहुंच जाना भारतीय राजनीति के एक युग के अंत जैसा माना गया।लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह और अधिक महत्वपूर्ण था। भाजपा ने केवल कांग्रेस को नहीं, बल्कि क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतों को भी चुनौती देना शुरू किया।

क्षेत्रीय दलों पर बढ़ता दबाव

भारत की संघीय राजनीति में कभी मजबूत क्षेत्रीय नेता संतुलन का काम करते थे। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी तमिलनाडु में एमके स्टालिन, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल और बिहार में नीतीश कुमार जैसे नेता भाजपा के खिलाफ अलग राजनीतिक मॉडल पेश करते थे।आज इनमें से कई ताकतें कमजोर, विभाजित या चुनावी रूप से पराजित दिखाई दे रही हैं। भाजपा का प्रभाव देश के अधिकांश हिस्सों में फैल चुका है और केवल कुछ क्षेत्रीय गढ़ ही इसके बाहर बचे हैं।

लोकतंत्र का बदलता स्वरूप

भारत अभी औपचारिक रूप से तानाशाही नहीं बना है। चुनाव हो रहे हैं, अदालतें काम कर रही हैं और मीडिया तथा नागरिक समाज के कुछ हिस्से अब भी प्रतिरोध कर रहे हैं।लेकिन आलोचकों का कहना है कि लोकतंत्र धीरे-धीरे “मैनेज्ड डेमोक्रेसी” की ओर बढ़ रहा है, जहां चुनाव तो होते हैं, लेकिन राजनीतिक ताकतों के बीच समान अवसर नहीं रह जाते। विपक्षी दलों ने प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई और आयकर विभाग जैसी एजेंसियों पर राजनीतिक दबाव बनाने के आरोप लगाए हैं।

केजरीवाल का उदाहरण

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी के खिलाफ हुई जांच और गिरफ्तारियों को इस नए राजनीतिक माहौल का प्रतीक बताया गया है। हालांकि कई मामलों में अंतिम दोष सिद्ध नहीं हुआ, लेकिन राजनीतिक नुकसान काफी बड़ा रहा।इससे विपक्षी नेताओं के सामने यह संदेश गया कि उन्हें चुनावी राजनीति से ज्यादा समय कानूनी लड़ाइयों में लगाना पड़ सकता है।

भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक रणनीति

भाजपा की सबसे बड़ी सफलता हिंदू बहुसंख्यक पहचान को राष्ट्रीय राजनीतिक विचारधारा में बदलना रही है।जहां पहले भारतीय राजनीति जाति, भाषा और क्षेत्रीय पहचान के आधार पर बंटी हुई थी, वहीं भाजपा ने इसे “सभ्यतागत राष्ट्रवाद” के व्यापक विचार से जोड़ दिया।

इस रणनीति के तहत

कल्याणकारी योजनाएं

मुफ्त राशन

नकद सहायता

धार्मिक प्रतीकवाद

मजबूत विदेश नीति

डिजिटल प्रचार

सभी को एक बड़े राजनीतिक नैरेटिव में जोड़ा गया। कई मतदाताओं के लिए मोदी केवल एक प्रशासक नहीं, बल्कि “राष्ट्रीय पुनर्स्थापना” के प्रतीक बन गए हैं।

बंगाल में बदली राजनीति

पश्चिम बंगाल लंबे समय तक हिंदुत्व राजनीति के खिलाफ मजबूत गढ़ माना जाता था। वामपंथी राजनीति और बाद में ममता बनर्जी की क्षेत्रीय राजनीति ने राज्य में अलग राजनीतिक पहचान बनाई थी।लेकिन भाजपा की हालिया सफलता ने संकेत दिया कि हिंदुत्व की राजनीति अब उन इलाकों में भी प्रवेश कर चुकी है, जिन्हें पहले इससे अछूता माना जाता था। भाजपा ने बंगाल के चुनाव को केवल प्रशासनिक असफलता का मुद्दा नहीं रहने दिया, बल्कि इसे पहचान और सांस्कृतिक राजनीति के बड़े विमर्श में बदल दिया।

क्या विपक्ष खत्म हो रहा है?

विश्लेषकों का कहना है कि भारत अभी एकदलीय राज्य नहीं बना है, लेकिन विपक्ष को धीरे-धीरे अप्रभावी बनाया जा रहा है।इतिहास में मैक्सिको की इंस्टिट्यूशनल रिवोल्यूशनरी पार्टी जैसे उदाहरणों का उल्लेख करते हुए लेख में कहा गया है कि कई देशों में चुनाव जारी रहे, लेकिन वास्तविक राजनीतिक विकल्प धीरे-धीरे खत्म हो गए।

भारत के लोकतंत्र के सामने चुनौती

भारत की संवैधानिक सोच हमेशा विविधता और बहुलवाद पर आधारित रही है। जवाहर लाल नेहरू की “आइडिया ऑफ इंडिया” इस विश्वास पर टिकी थी कि कोई एक पहचान पूरे देश पर स्थायी रूप से हावी नहीं हो सकती।लेकिन भाजपा एक अलग दृष्टिकोण पेश कर रही है, जिसमें सांस्कृतिक एकरूपता और मजबूत केंद्रीकृत सत्ता को प्राथमिकता दी जा रही है।लोकतंत्र की असली परीक्षा सरकार की ताकत से नहीं, बल्कि असहमति और विपक्ष के अस्तित्व से होती है। और संभव है कि लोग विपक्ष की अहमियत तब समझें, जब वह लगभग खत्म हो चुका हो।

(द फेडरल हर तरह के नज़रिए और राय पेश करने की कोशिश करता है। आर्टिकल में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक की हैं और ज़रूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को दिखाते हों।)

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