
बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि संतान संपत्ति लेने के बाद माता-पिता की देखभाल नहीं करती, तो संपत्ति का हस्तांतरण रद्द किया जा सकता है।
भारत में बुजुर्ग माता-पिता अक्सर अपनी संपत्ति अपने बच्चों के नाम "उपहार (गिफ्ट)" के रूप में कर देते हैं। लेकिन व्यवहार में यह सिर्फ एक उपहार नहीं होता, बल्कि इसके पीछे एक अनकहा भरोसा छिपा होता है कि बदले में बच्चे उनकी देखभाल करेंगे और बुढ़ापे का सहारा बनेंगे।हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक ऐसे मामले में माता-पिता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बेटे को दी गई संपत्ति का हस्तांतरण रद्द कर दिया, क्योंकि उसने अपने माता-पिता की देखभाल नहीं की। इस फैसले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ऐसे संपत्ति हस्तांतरण वास्तव में "उपहार" हैं या फिर देखभाल की शर्त पर आधारित एक अनौपचारिक समझौता?
कानून क्या कहता है?
ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट के अनुसार, किसी भी "गिफ्ट" का मतलब बिना किसी शर्त के संपत्ति का हस्तांतरण होता है। इसमें प्राप्तकर्ता पर कोई कानूनी जिम्मेदारी नहीं होती।लेकिन माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 (Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act) की धारा 23 इस सिद्धांत से अलग रास्ता अपनाती है। इस कानून के तहत यदि कोई संतान संपत्ति मिलने के बाद अपने माता-पिता की देखभाल करने से इनकार करती है या उनकी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं करती, तो माता-पिता संपत्ति का हस्तांतरण रद्द कराने की मांग कर सकते हैं।
अदालतों ने कई मामलों में स्पष्ट किया है कि मुद्दा केवल आर्थिक सहायता का नहीं, बल्कि उस भरोसे और जिम्मेदारी का है, जिसके आधार पर संपत्ति बच्चों को सौंपी गई थी।
कानून और सामाजिक सोच के बीच टकराव
भारतीय समाज में माता-पिता की सेवा करना हमेशा नैतिक जिम्मेदारी माना गया है, न कि कानूनी अनुबंध।इसी कारण अधिकांश परिवारों में संपत्ति देते समय कोई लिखित समझौता नहीं किया जाता। माता-पिता यह मानकर चलते हैं कि बच्चे स्वाभाविक रूप से उनकी देखभाल करेंगे। अगर इस बात को लिखित रूप दिया जाए, तो कई लोगों को लगता है कि इससे पारिवारिक रिश्ते प्रेम के बजाय लेन-देन जैसे दिखाई देंगे।लेकिन जब यह भरोसा टूट जाता है, तब कानून ही आखिरी सहारा बनता है।
दूसरे देशों का क्या मॉडल है?
कुछ देशों ने इस विषय पर अधिक स्पष्ट कानूनी व्यवस्था बनाई है।सिंगापुर के मेंटेनेंस ऑफ पेरेंट्स एक्ट के तहत बुजुर्ग माता-पिता अपने सक्षम बच्चों से भरण-पोषण की मांग कानूनी रूप से कर सकते हैं।वहीं ऑस्ट्रेलिया में ऐसे मामलों को संपत्ति, अनुबंध और सामाजिक सुरक्षा कानूनों के तहत स्पष्ट रूप से मान्यता दी गई है, जहां बुजुर्ग अपनी संपत्ति देखभाल और रहने की व्यवस्था के बदले हस्तांतरित करते हैं।भारत में अभी भी इन हस्तांतरणों को "गिफ्ट" कहा जाता है, जबकि विवाद होने पर अदालतें इन्हें देखभाल की शर्त से जुड़ा समझौता मानकर फैसला सुनाती हैं।
बुजुर्ग अदालत जाने से क्यों कतराते हैं?
सबसे बड़ी चुनौती कानून नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक है।अक्सर कहा जाता है कि बुजुर्गों को अपने अधिकारों की जानकारी नहीं होती। लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। कई माता-पिता अपने कानूनी अधिकार जानते हुए भी अदालत या ट्रिब्यूनल का दरवाजा नहीं खटखटाते।इसकी सबसे बड़ी वजह भावनात्मक और सामाजिक दबाव है।अपने ही बेटे या बेटी के खिलाफ शिकायत करना अधिकांश बुजुर्गों के लिए आसान नहीं होता। उन्हें लगता है कि ऐसा करने से परिवार की प्रतिष्ठा पर आंच आएगी और लोग इसे रिश्तों की असफलता के रूप में देखेंगे।इसी तरह वृद्धाश्रम में रहना या देखभाल के लिए भुगतान करना भी आज भी कई परिवारों में सामाजिक कलंक माना जाता है।
कानून तब आता है, जब बहुत देर हो चुकी होती हैधारा 23 बुजुर्गों को कानूनी सुरक्षा जरूर देती है, लेकिन यह सुरक्षा तब मिलती है जब रिश्ते लगभग पूरी तरह टूट चुके होते हैं।अधिकांश मामलों में माता-पिता तब अदालत पहुंचते हैं, जब लंबे समय तक उपेक्षा और दुर्व्यवहार सहने के बाद उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता।यानी कानून राहत तो देता है, लेकिन समस्या को शुरू होने से नहीं रोक पाता।
आगे क्या बदलाव जरूरी हैं?
भारत तेजी से वृद्ध समाज की ओर बढ़ रहा है। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक देश में 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों की संख्या लगभग 31.9 करोड़ हो जाएगी।ऐसी स्थिति में केवल पारिवारिक भरोसे के सहारे बुजुर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके लिए बुजुर्गों के लिए मजबूत सामाजिक देखभाल व्यवस्था विकसित करनी होगी। कानूनी सहायता तक पहुंच आसान बनानी होगी। समाज में यह स्वीकार करना होगा कि अपने अधिकार मांगना परिवार के खिलाफ जाना नहीं है। संपत्ति हस्तांतरण के समय देखभाल संबंधी शर्तों को अधिक स्पष्ट और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए।
बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले ने उठाया बड़ा सवाल
बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला केवल एक संपत्ति विवाद तक सीमित नहीं है। इसने एक बड़े सामाजिक प्रश्न को सामने रखा है—क्या भारतीय कानून को अब भी ऐसे संपत्ति हस्तांतरण को "गिफ्ट" कहना चाहिए, जबकि वास्तव में वे देखभाल और जिम्मेदारी पर आधारित समझौते होते हैं?जब तक अपने अधिकारों की मांग को परिवार के साथ विश्वासघात नहीं, बल्कि न्याय पाने का अधिकार नहीं माना जाएगा, तब तक अधिकांश बुजुर्ग कानून की शरण तभी लेंगे, जब उनके सामने कोई दूसरा रास्ता नहीं बचेगा।


