
ईरान युद्ध के बीच चीन शांति समझौते की अहम कड़ी बनकर उभरा है। ट्रंप की बीजिंग यात्रा ने बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन को उजागर किया।
ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के बीच चीन एक ऐसे देश के रूप में उभरकर सामने आया है, जो दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाकर शांति समझौते की दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। ईरान पर अपने प्रभाव और अमेरिका पर अपने बढ़ते दबदबे के कारण चीन ऐसी स्थिति में है, जहां वह दोनों देशों को बातचीत की मेज पर ला सकता है।
भारतीय क्रिकेट टीम को लंबे समय तक “घर में शेर और विदेश में ढीली” टीम कहा जाता रहा है। कुछ वैसा ही दृश्य हाल ही में चीन दौरे पर गए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यवहार में देखने को मिला। आमतौर पर आक्रामक और आत्मविश्वास से भरे नजर आने वाले ट्रंप बीजिंग में अपेक्षाकृत शांत, विनम्र और दबे हुए दिखाई दिए।
चीन यात्रा और सीमित घोषणाएं
ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई शिखर वार्ता के बाद सार्वजनिक रूप से बहुत कम घोषणाएं की गईं। केवल यह कहा गया कि चीन 200 बोइंग विमान, अमेरिकी तेल और सोयाबीन खरीदेगा। ईरान युद्ध पर भी संक्षेप में चर्चा हुई, जिसमें कहा गया कि चीन कूटनीतिक माध्यमों से संघर्ष को समाप्त करने में मदद करेगा।
चीन ने यह भी स्पष्ट किया कि वह नहीं चाहता कि ईरान परमाणु हथियार हासिल करे, लेकिन साथ ही वह होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखने का भी पक्षधर है, ताकि वैश्विक व्यापार और तेल आपूर्ति प्रभावित न हो।
कमजोर लेकिन कायम युद्धविराम
हालांकि ट्रंप अमेरिका लौटने के बाद फिर से आक्रामक अंदाज में दिखाई दिए और ईरान को चेतावनी दी कि “समय तेजी से निकल रहा है”, लेकिन अब यह लगभग स्पष्ट हो चुका है कि ईरान संकट के समाधान की चाबी चीन के हाथ में है।करीब तीन महीने से जारी इस संघर्ष में 7 अप्रैल से युद्धविराम लागू है, लेकिन स्थिति अब भी बेहद नाजुक बनी हुई है। फारस की खाड़ी में बीच-बीच में होने वाली झड़पें वैश्विक शिपिंग और व्यापार को प्रभावित कर रही हैं। इसका आर्थिक असर भारत समेत कई देशों पर महसूस किया जा रहा है।
चीन की रणनीतिक स्थिति
चीन की मध्यस्थता की पेशकश इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि उसका लगभग आधा कच्चा तेल ईरान से आता है। वहीं ईरान के लिए चीन सबसे बड़ा आर्थिक सहयोगी है, जो उसका करीब 80 प्रतिशत तेल खरीदता है।ऐसे में शी जिनपिंग ऐसी स्थिति में हैं कि वे ईरान पर अपने प्रभाव और ट्रंप के साथ अपने संबंधों का उपयोग कर दोनों देशों को समझौते के लिए तैयार कर सकते हैं।
हालांकि चीन फिलहाल किसी आर्थिक संकट के खतरे में नहीं है, क्योंकि उसने पर्याप्त तेल भंडार जमा कर रखा है और नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग में भी बढ़त हासिल की है, लेकिन वैश्विक मंदी से बचने के लिए उसके लिए भी इस युद्ध को जल्द खत्म करना जरूरी है।
ट्रंप और नेतन्याहू के बीच बातचीत
बीजिंग यात्रा के बाद ट्रंप ने कथित तौर पर इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को शी जिनपिंग के साथ हुई बातचीत की जानकारी दी।हालांकि ट्रंप और शी के बीच ईरान युद्ध पर क्या विस्तृत चर्चा हुई, यह सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन माना जा रहा है कि शी ने ट्रंप से ईरान को परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह छोड़ने की अपनी कठोर शर्तों में नरमी बरतने को कहा होगा।चीन की आधिकारिक राय यह है कि अमेरिका और इजरायल को युद्ध शुरू नहीं करना चाहिए था। लेकिन अब जबकि युद्ध शुरू हो चुका है, इसे जल्द समाप्त किया जाना चाहिए।
क्या ईरान 20 साल तक परमाणु गतिविधियां रोकेगा?
बीजिंग से लौटने के बाद ट्रंप ने दावा किया कि ईरान 20 वर्षों तक परमाणु गतिविधियां रोकने को तैयार है और उन्होंने इस पर सहमति भी जताई। हालांकि तेहरान ने अब तक इसकी पुष्टि नहीं की है।ट्रंप द्वारा नेतन्याहू को शी के साथ हुई बातचीत की जानकारी देना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति एक तरफ इजरायल और दूसरी तरफ युद्ध समाप्ति चाहने वाली वैश्विक राय के बीच फंसे हुए हैं।दुनिया के कई देशों में इस युद्ध को “बेमतलब संघर्ष” माना जा रहा है, जिसका मुख्य उद्देश्य केवल इजरायल द्वारा ईरान को नुकसान पहुंचाना है।
अमेरिका में ट्रंप की गिरती लोकप्रियता
ट्रंप ने ईरान पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को यह कहकर सही ठहराने की कोशिश की कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम अमेरिकी नागरिकों के लिए खतरा है। लेकिन उन्होंने इस दावे के समर्थन में कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया।इससे यह धारणा मजबूत हुई है कि अमेरिका वास्तव में इजरायल की लड़ाई लड़ रहा है। यही वजह है कि ट्रंप की लोकप्रियता घटकर लगभग 32 प्रतिशत तक पहुंच गई है और अधिकांश अमेरिकी नागरिक युद्ध के खिलाफ दिखाई दे रहे हैं।
चीन क्यों गए थे ट्रंप?
रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप विशेष रूप से चीन इसलिए गए क्योंकि उन्हें पता था कि केवल बीजिंग ही ईरान पर इतना दबाव डाल सकता है कि वह अमेरिकी मांगों के बीच का रास्ता स्वीकार करे।दिलचस्प बात यह रही कि शिखर वार्ता के दौरान ईरान और अमेरिका दोनों ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले चीनी मालवाहक जहाजों को सुरक्षित रास्ता दिया।
ताइवान पर शी का कड़ा रुख
वार्ता के दौरान शी जिनपिंग ने ताइवान मुद्दे पर भी ट्रंप को स्पष्ट चेतावनी दी। रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने कहा कि अमेरिका की गतिविधियां बीजिंग और वाशिंगटन के बीच युद्ध की स्थिति पैदा कर सकती हैं।शी ने कथित तौर पर अमेरिकी सेना को सैन्य सहायता देने के ट्रंप के अनुरोध को भी ठुकरा दिया। जानकारों का मानना है कि यह या तो अमेरिका की घटती वैश्विक पकड़ का संकेत है या फिर चीन के तेजी से उभरते वैश्विक प्रभाव का।
बदलता वैश्विक शक्ति संतुलन
बीजिंग शिखर सम्मेलन में ट्रंप का अपेक्षाकृत नरम रवैया और शी जिनपिंग की आत्मविश्वासी तथा प्रभावशाली बॉडी लैंग्वेज ने यह संदेश दिया कि चीन अब अमेरिका के बराबर की वैश्विक शक्ति बनकर उभर रहा है।हालांकि इसके पीछे अन्य कारण भी हैं। ट्रंप ने जनवरी में सत्ता संभालते समय यह सोचा था कि अमेरिका दुनिया पर अपनी शर्तें थोप सकता है। लेकिन कनाडा और यूरोपीय सहयोगियों—जैसे ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और स्पेन—की बढ़ती असहमति ने अमेरिका और ट्रंप दोनों को यह एहसास कराया है कि दुनिया अब पहले जैसी नहीं रही।


