Janaki Nair

सभ्यता बनाम संविधान, क्या अधिकारों पर भारी पड़ रही परंपरा?


सभ्यता बनाम संविधान, क्या अधिकारों पर भारी पड़ रही परंपरा?
x

सभ्यता और परंपरा के नाम पर अधिकारों, महिलाओं की स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों को चुनौती देने की बहस फिर तेज हो गई है।

हाल के दिनों में भारत की ‘सभ्यता’ और उसकी ‘मूल पहचान’ को लेकर सार्वजनिक जीवन में चिंता और बहस तेज हो गई है। यह चिंता केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं है, बल्कि न्यायपालिका तक भी इसकी गूंज सुनाई दे रही है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या भारत का संविधान, जो समान अधिकार और स्वतंत्रता की गारंटी देता है, अब ‘सभ्यतागत मूल्यों’ और बहुसंख्यक धारणाओं के दबाव में कमजोर पड़ता जा रहा है?

मोहन भागवत के बयान और इतिहास की नई व्याख्या

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में मुंबई में आयोजित कर्मयोगी पुरस्कार समारोह में कहा कि भारत की अनुसूचित जातियों और जनजातियों ने विदेशी आक्रमणों के बावजूद भारत की ‘मूल पहचान’ को बचाए रखा। उनके अनुसार, इन समुदायों की वर्तमान सामाजिक और आर्थिक स्थिति के लिए भारत की पारंपरिक व्यवस्था नहीं, बल्कि विदेशी आक्रमणकारी जिम्मेदार हैं।

भागवत ने यह भी कहा कि वेद भारत के जंगलों से उत्पन्न हुए और आदिवासी ही मूल सनातनी थे। आलोचकों का मानना है कि इस तरह के बयान दशकों से हुए ऐतिहासिक और मानवशास्त्रीय शोधों को नजरअंदाज करते हैं, जिनमें भारतीय समाज में जातिगत भेदभाव और असमानता के लंबे इतिहास का विस्तार से दस्तावेजीकरण किया गया है।

संविधान बनाम ‘सभ्यतागत निरंतरता’

भागवत ने अपने भाषण में यह भी कहा कि भारत की सभ्यता ‘एकता, सहयोग, कर्तव्य और पारस्परिक जिम्मेदारी’ पर आधारित रही है, न कि सामाजिक अनुबंध (Social Contract) के सिद्धांतों पर। उन्होंने उन लोगों को फिर से ‘हिंदू समाज’ में शामिल करने की बात कही, जिन्हें विदेशी ताकतों ने अलग कर दिया था।

यह सोच भारतीय संविधान की मूल भावना से टकराती है। संविधान ने एक ऐसे भारत की कल्पना की थी, जहां समानता, स्वतंत्रता और न्याय के आधार पर समाज का निर्माण हो। लेकिन ‘स्थायी सभ्यतागत ethos’ की अवधारणा संवैधानिक नैतिकता और व्यक्तिगत अधिकारों को चुनौती देती दिखाई देती है।

सबरीमाला मामला और न्यायपालिका की चिंता

यह बहस केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रही। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश जस्टिस नागरत्ना ने कहा था कि अगर हर धार्मिक परंपरा को अदालत में चुनौती दी जाने लगे, तो भारत की वह सभ्यता कैसे बचेगी जिसमें धर्म समाज से गहराई से जुड़ा हुआ है।उन्होंने यह भी कहा कि “हमारी सभ्यता में एक स्थिर तत्व (constant) है, जिसे तोड़ा नहीं जा सकता।” इस तरह की सोच संविधान और नागरिक अधिकारों के ऊपर ‘सभ्यता’ की अवधारणा को रखती है।

बदलती परंपराएं और सबरीमाला

सबरीमाला यात्रा समय के साथ पूरी तरह बदल चुकी है। 1950 के दशक में जहां केवल लगभग 50 हजार श्रद्धालु आते थे, वहीं अब यह संख्या 50 लाख के करीब पहुंच गई है।यात्रा से जुड़े पारंपरिक नियम — जैसे 41 दिन का व्रत, ब्रह्मचर्य, मांस और शराब से दूरी — अब पहले की तुलना में काफी बदल चुके हैं। आधुनिक जीवनशैली, नौकरी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण लोग इन नियमों में ढील देने लगे हैं।इसके बावजूद, परंपरा और ‘आस्था’ को बनाए रखने का पूरा बोझ आज भी मासिक धर्म वाली महिलाओं पर ही डाला जाता है।

क्या सभ्यता बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं की?

लेख इस सवाल को भी उठाता है कि क्या भारतीय सभ्यता को बचाने का बोझ हमेशा महिलाओं पर ही डाला जाता रहा है?इतिहास में बाल विवाह, सती प्रथा और मंदिर प्रवेश जैसे मुद्दों पर भी यही तर्क दिया गया था कि परंपरा और धर्म की रक्षा जरूरी है। लेकिन समय के साथ समाज ने इन प्रथाओं को बदला।

1920 के दशक में जब मदन मोहन मालवीय ने हिंदू शास्त्रों का हवाला देते हुए लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने का विरोध किया था, तब ऑल इंडिया वीमेंस कॉन्फ्रेंस ने कहा था — “हमें नए शास्त्र चाहिए।”लेख के अनुसार, आज भारत के पास वह नया ‘शास्त्र’ है — भारतीय संविधान।

संविधान को मजबूत करने की जरूरत

भारत को अपनी सभ्यता और संस्कृति की रक्षा के नाम पर महिलाओं और कमजोर वर्गों के अधिकारों की कीमत नहीं चुकानी चाहिए। संविधान ने समानता और न्याय पर आधारित एक नई नैतिकता और सामाजिक दृष्टि दी है।ऐसे में, दशकों पुराने ‘सभ्यतागत संकट’ के तर्कों को दोहराने के बजाय संविधान की क्षमता को मजबूत करना और उसे समाज के हर वर्ग के अधिकारों की रक्षा का आधार बनाना जरूरी है।

(द फेडरल हर तरह के नज़रिए और राय पेश करने की कोशिश करता है। आर्टिकल में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक की हैं और ज़रूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को दिखाते हों।)

Next Story