
NEET, CBSE और बेरोजगारी के मुद्दों पर युवाओं का गुस्सा CJP के बैनर तले सड़कों पर दिखा, जिसने सरकार के लिए नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी।
ऐसे देश में, जहाँ रवीन्द्रनाथ ठाकुर का गीत ‘एकला चलो रे’ पिछले 120 वर्षों से लोगों को राष्ट्रहित में अकेले खड़े होने और संघर्ष करने की प्रेरणा देता रहा है, वहाँ व्यंग्य से जन्मे और पले-बढ़े मंच ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) के पहले वास्तविक धरातल पर आयोजित प्रदर्शन को केवल संख्या के आधार पर आंकना जल्दबाजी होगी।
यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है कि इस विरोध सभा में एक-दो हजार लोग शामिल हुए या इससे कहीं अधिक। महत्वपूर्ण यह है कि इस रैली ने एक व्यक्ति की ताकत को रेखांकित किया और दिखाया कि भारत के राजनीतिक रूप से घुटनभरे माहौल में भी अपेक्षाकृत गैर-राजनीतिक लोग किसी साझा मुद्दे पर एकजुट होकर सरकार को चुनौती दे सकते हैं।
सीजेपी भविष्य में राजनीतिक दल बनेगी या नहीं, चुनावी राजनीति में उतरेगी या नहीं, और सत्ताधारी दल तथा उसके प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों के लिए परेशानी का कारण बनेगी या नहीं—यह अभी कहना जल्दबाजी होगी। यह भी संभव है कि यह आंदोलन पड़ोसी देशों की उन पीढ़ी-ज़ेड (Gen Z) आंदोलनों जैसी ऊंचाइयों तक न पहुंचे, जिन्होंने सत्ता परिवर्तन तक करवा दिया था।
फिर भी, भविष्य के इतिहासकार इस घटना को नजरअंदाज नहीं करेंगे, क्योंकि यह एक ऐसा प्रकरण है जिसमें एक जिम्मेदार संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की अनावश्यक टिप्पणी ने व्यापक आक्रोश और विरोध को जन्म दिया।
सड़क पर आंदोलन की नई दिशा
आज के दौर में, जब कई संवैधानिक और महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग सत्ता को खुश रखने और सेवानिवृत्ति के बाद पद पाने की कोशिश करते दिखाई देते हैं, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का नाम शायद ऐसे संभावित पदों की सूची से बाहर हो चुका है।
6 जून की रैली भारतीय सड़क-आधारित आंदोलनों के इतिहास में एक असाधारण मोड़ साबित हुई। विडंबना यह है कि इसकी शुरुआत आत्म-व्यंग्य और इंटरनेट मीम के रूप में हुई थी, जिसमें अलग-अलग और कभी-कभी अजीबोगरीब संगीत का इस्तेमाल किया गया। यही इसकी वायरल प्रकृति की पहचान भी थी।
कुछ ही समय में यह ऑनलाइन भीड़ एक मुख्यतः गैर-राजनीतिक, युवाओं द्वारा संचालित सड़क आंदोलन में बदल गई, जिसमें देश के विभिन्न शहरों और कस्बों से बड़ी संख्या में युवा दिल्ली पहुंचे।सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि यह किसी राजनीतिक दल द्वारा आयोजित पारंपरिक रैली नहीं थी, जहाँ सारी व्यवस्था पार्टी करती है। यहां हर व्यक्ति को सचमुच अकेले या अपने कुछ दोस्तों के साथ ही भाग लेना पड़ा।
अपमान को विरोध के हथियार में बदलना
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम स्पष्ट रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पैरोडी है। रैली में इस्तेमाल किए गए मास्क, नारे और गीत इस बात के उदाहरण थे कि कैसे अपमान को राजनीतिक हथियार में बदला जा सकता है।स्कूल और कॉलेज की किताबों के साथ कॉकरोच मास्क पहनना, राष्ट्रीय ध्वज लहराना और डॉ. भीमराव आंबेडकर के बड़े चित्र उठाना विरोध और शक्ति का प्रतीक बन गया।
कॉकरोच होना गर्व की बात बना दिया गया, क्योंकि यह ऐसा जीव है जो सबसे कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहता है और लगभग अमर माना जाता है।6 जून की रैली ने यह भी दिखाया कि राजनीतिक दलों के पारंपरिक ढांचे से बाहर रहकर भी एक बड़ा राजनीतिक प्रदर्शन आयोजित किया जा सकता है।
हालांकि, असली चुनौती 2.2 करोड़ ऑनलाइन समर्थकों को वास्तविक राजनीतिक कार्यकर्ताओं में बदलने की होगी। सोशल मीडिया पर एक क्लिक से समर्थक बन जाना आसान है, लेकिन लोगों को सड़कों पर उतारना कहीं अधिक कठिन कार्य है।
युवाओं की नाराजगी सरकार के लिए चिंता
भारत में, जहां असहमति की आवाजों को विशेषकर ऑनलाइन मंचों पर सीमित करने के आरोप लगते रहे हैं, वहां युवाओं की यह नाराजगी सरकार के लिए चिंता का विषय बन गई है।राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET), सीबीएसई ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) विवाद और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) के खिलाफ चला अभियान मुख्य रूप से छात्रों और युवाओं द्वारा संचालित था और भी चिंताजनक बात यह रही कि ओएसएम ठेके में कथित अनियमितताओं और घोटाले का खुलासा बारहवीं कक्षा के छात्रों ने किया, जिनमें से कुछ की उम्र अभी 18 वर्ष भी नहीं हुई होगी।
यदि सरकार सुधारात्मक कदम नहीं उठाती, तो भाजपा को पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग खोना पड़ सकता है। इनमें से कई छात्र बोर्ड परीक्षाओं में कथित गलत मूल्यांकन से प्रभावित हुए और उनकी उच्च शिक्षा में प्रवेश की संभावनाओं पर असर पड़ा।इसी तरह 30 वर्ष से कम आयु के मतदाता शिक्षा संकट, प्रवेश परीक्षाओं की अव्यवस्था और बढ़ती बेरोजगारी के कारण सत्तारूढ़ दल से दूर हो सकते हैं।
मुख्य मांग: शिक्षा मंत्री का इस्तीफा
हालांकि आंदोलन ने शुरुआत खुद को मजाक और व्यंग्य के रूप में पेश करके की थी, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने अपनी राजनीतिक असहमति को स्पष्ट रूप से सामने रखा।उन्होंने पूरी तरह अहिंसक रुख अपनाया, भारतीय तिरंगे को प्रमुखता दी और धार्मिक पहचान को किसी भी स्तर पर मुद्दा नहीं बनने दिया।सबसे महत्वपूर्ण मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की रही है, जो फिलहाल कमजोर पड़ती नहीं दिख रही।सीजेपी के अलावा कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई और माकपा से जुड़ा स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) भी उन्हीं मुद्दों को उठा रहे हैं, जिन्हें सीजेपी ने प्रमुखता से सामने रखा है।
अलग-अलग आवाजें, लेकिन मुद्दे एक
भले ही इन संगठनों की विचारधाराएं अलग हों, लेकिन उनके मुद्दे समान हैं। इसका संयुक्त प्रभाव सरकार पर पड़ सकता है।सीजेपी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही है कि उसने बेरोजगार और छात्र युवाओं की चिंताओं को सीधे संबोधित किया है।यह वर्ग अस्थिर, गैर-विचारधारात्मक और तकनीकी रूप से सक्षम मतदाताओं का समूह है, जिसे पारंपरिक ध्रुवीकरण की राजनीति के जरिए आसानी से प्रभावित नहीं किया जा सकता।
क्या सीजेपी का राजनीतिक भविष्य है?
फिलहाल यह आंदोलन एनईईटी, सीबीएसई और एनटीए से जुड़े विवादों से उपजे छात्र आक्रोश का परिणाम है।लेकिन यदि सीजेपी को लंबे समय तक युवाओं के बीच प्रभाव बनाए रखना है, तो उसे छात्र असंतोष को बेरोजगारी, आर्थिक ठहराव और सस्ती तथा गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाओं जैसे व्यापक मुद्दों से जोड़ना होगा।
मोदी सरकार की कमजोरी
दी सरकार ने पिछले 12 वर्षों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों को काफी हद तक नियंत्रित रखा है, लेकिन जनआंदोलनों से निपटना उसकी कमजोरियों में शामिल रहा है।भूमि अधिग्रहण कानून को उदार बनाने के खिलाफ 2015 का विरोध, किसान आंदोलन, नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी आंदोलन, अग्निपथ योजना के खिलाफ प्रदर्शन और महिला पहलवानों का आंदोलन ऐसे उदाहरण रहे हैं, जहां सरकार को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।सीजेपी के विरोध प्रदर्शन के मामले में सरकार ने इस बार टकराव का रास्ता नहीं चुना और रैली की अनुमति भी दी।
लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सवाल
वी-डेम इंस्टीट्यूट की रिपोर्टों के अनुसार भारत को 2017 से "चुनावी निरंकुशता" (Electoral Autocracy) की श्रेणी में रखा गया है।2026 की रिपोर्ट में लोकतांत्रिक संस्थाओं के "धीरे-धीरे लेकिन व्यवस्थित क्षरण" का उल्लेख किया गया था। साथ ही यह भी कहा गया कि डिजिटल पीढ़ी इन मुद्दों के प्रति सजग है।
शुरुआती दौर में सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर ‘कॉकरोच आंदोलन’ से जुड़े सोशल मीडिया अकाउंट्स को हटाने की कोशिश की, लेकिन उनके जैसे कई नए अकाउंट्स सामने आ गए। इससे यह संदेश गया कि कठोर दमनात्मक उपाय उल्टा असर डाल सकते हैं।
क्या कॉकरोच आंदोलन जीवित रहेगा?
गौरतलब है कि 6 जून की रैली को अधिकांश मुख्यधारा के टीवी चैनलों ने लगभग नजरअंदाज किया। इसके बावजूद सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इसकी व्यापक वीडियो कवरेज ने डिजिटल शक्ति का प्रदर्शन किया।यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि सीजेपी भविष्य में एक प्रभावशाली राजनीतिक ताकत बनेगी या इंटरनेट की भीड़ में खो जाएगी। लेकिन इतना निश्चित है कि ‘कॉकरोच आंदोलन’ आने वाले समय में राजनीतिक विश्लेषण और बहस का महत्वपूर्ण विषय बना रहेगा।
(द फेडरल हर तरह के नज़रिए और राय पेश करने की कोशिश करता है। आर्टिकल में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक की हैं और ज़रूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को दिखाते हों।)


