
महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़ धर्म परिवर्तन पर सख्त कानून ला रहे हैं, जबकि कर्नाटक अंतरधार्मिक विवाह करने वालों को सुरक्षा देकर अलग मॉडल पेश कर रहा है।
महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ जहां धर्म परिवर्तन के मामलों में पूर्व जांच और प्रमाण का भार उलटने जैसे प्रावधान लागू कर रहे हैं, वहीं कर्नाटक अंतर-धार्मिक और अंतर-जातीय विवाह करने वाले जोड़ों को हिंसा से सुरक्षा देने की दिशा में कदम उठा रहा है। इस महीने तीन राज्यों की विधानसभाओं में भारत के दो अलग-अलग दृष्टिकोण कानून के रूप में सामने आए। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाली सरकारों ने यह तय करने के लिए कानून बनाए कि कोई व्यक्ति कब और क्यों अपना धर्म बदल सकता है। दोनों राज्यों के कानून लगभग एक जैसे हैं। इसके विपरीत, कर्नाटक में, जहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) की सरकार है, वहां जाति और धर्म से परे विवाह करने वालों की सुरक्षा पर जोर दिया गया है।
तीनों सरकारें दावा करती हैं कि वे नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा कर रही हैं और सभी भारतीय संविधान का हवाला देती हैं, लेकिन नागरिकों को लेकर उनकी सोच में गहरा अंतर है।
एक सख्त कानून
महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ का मानना है कि जो लोग अपने जन्म धर्म से अलग धर्म अपनाते हैं, वे दबाव या धोखे का शिकार हो सकते हैं। वहीं कर्नाटक मानता है कि नागरिक स्वयं निर्णय लेने में सक्षम हैं। महाराष्ट्र फ्रीडम ऑफ रिलिजन बिल, 2026, जिसे इसी महीने विधानसभा में पारित किया गया है, भारत के सबसे सख्त धर्म परिवर्तन विरोधी कानूनों में से एक माना जा रहा है। यह उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों से भी अधिक कठोर बताया जा रहा है। छत्तीसगढ़ में भी इसी तरह का कानून लागू किया गया है।
यह कानून “बल, धोखाधड़ी, प्रलोभन या विवाह” के जरिए किए गए धर्म परिवर्तन को अपराध घोषित करता है, जिसमें सात साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। “विवाह” को इसमें शामिल करना सबसे ज्यादा चिंता का विषय है, क्योंकि इससे पुलिस और प्रशासन को अंतर-धार्मिक विवाहों में हस्तक्षेप करने का अधिकार मिल सकता है। खासकर उन मामलों में जहां महिलाएं दूसरे धर्म में विवाह करती हैं।
पूर्व जांच और नियंत्रण
महाराष्ट्र के कानून के अनुसार, जो व्यक्ति धर्म परिवर्तन करना चाहता है, उसे लगभग 60 दिन पहले जिला प्रशासन को इसकी सूचना देनी होगी। इसके बाद प्रशासन यह जांच कर सकता है कि धर्म परिवर्तन “वास्तविक” है या नहीं।
सबसे विवादास्पद प्रावधानों में से एक है प्रमाण का उल्टा भार। इसमें राज्य को यह साबित करने की जरूरत नहीं होगी कि धर्म परिवर्तन अवैध था, बल्कि आरोपी को यह साबित करना होगा कि उसने कोई गलत काम नहीं किया। अगर विवाह से जुड़ा धर्म परिवर्तन अवैध पाया जाता है, तो विवाह को भी अमान्य घोषित किया जा सकता है।
कानून का व्यापक प्रभाव
यह कानून केवल जबरन धर्म परिवर्तन को रोकने तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत आस्था को भी राज्य के नियंत्रण में लाने की कोशिश करता है। हालांकि धर्म परिवर्तन को नियंत्रित करने वाले कानून पहले भी मौजूद थे, लेकिन नरेंद्र मोदी के 2014 में सत्ता में आने के बाद कई राज्यों में इन्हें संशोधित कर अधिक सख्त बनाया गया है।
आज भारत के करीब एक दर्जन राज्यों में ऐसे कानून हैं, जिन्हें अक्सर “धर्म की स्वतंत्रता” के नाम पर लागू किया गया है। कई पुराने कानून दशकों तक निष्क्रिय रहे, लेकिन हाल के वर्षों में इन्हें सक्रिय और सख्त बनाया गया है।
भाजपा का व्यापक एजेंडा
महाराष्ट्र का यह कानून देवेंद्र फडणवीस सरकार के तहत भाजपा के व्यापक राष्ट्रीय एजेंडे का हिस्सा माना जा रहा है। “लव जिहाद” जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द बने ये कानून पिछले कई वर्षों से भाजपा की राजनीति का हिस्सा रहे हैं।
विधानसभा में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) ने इस कानून का समर्थन किया है, जबकि कांग्रेस, शरद पवार की पार्टी NCP (SC), AIMIM और अन्य दलों ने इसका विरोध किया है। भाजपा, एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजित पवार गुट के पास बहुमत होने के कारण इस कानून के पारित होने में कोई बाधा नहीं है।
क्या यह राजनीतिक चिंता है?
सरकार का तर्क है कि यह कानून महिलाओं, बच्चों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को जबरन धर्म परिवर्तन से बचाने के लिए जरूरी है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि मौजूदा कानून पहले से ही ऐसे मामलों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं।
सवाल यह है कि क्या यह कानून वास्तविक समस्याओं का समाधान है या राजनीतिक चिंताओं का परिणाम। महाराष्ट्र में ऐसे मामलों की संख्या बहुत अधिक नहीं रही है, जिससे यह बहस और तेज हो जाती है।
एक जटिल चुनौती
समर्थकों का कहना है कि यह कानून समाज में कमजोर वर्गों की सुरक्षा करता है। लेकिन आलोचकों का मानना है कि सरकार के लिए यह तय करना बेहद कठिन है कि कौन सा धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से हुआ है और कौन सा दबाव में।इसके अलावा, ऐसे कानूनों से स्वयंभू “धर्म रक्षक” समूहों को बढ़ावा मिल सकता है, जो कानून अपने हाथ में लेकर अंतर-धार्मिक जोड़ों के खिलाफ हिंसा कर सकते हैं।
कर्नाटक का अलग दृष्टिकोण
अब कर्नाटक की स्थिति देखें। यहां सिद्धारमैया सरकार ने एक ऐसा कानून पेश किया है जो अंतर-जातीय और अंतर-धार्मिक जोड़ों को हिंसा, धमकी और सामाजिक दबाव से बचाने पर केंद्रित है। हालांकि 2022 में भाजपा सरकार ने यहां भी धर्म परिवर्तन विरोधी कानून बनाया था, लेकिन 2023 में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद उसे हटाने की बात कही गई। इसके बजाय 2026 में “फ्रीडम ऑफ चॉइस इन मैरिज” विधेयक लाया गया, जो ऑनर किलिंग जैसे अपराधों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान करता है और पीड़ित जोड़ों को सुरक्षा, फास्ट-ट्रैक अदालतें और प्रशासनिक सहायता प्रदान करता है।
दो अलग दृष्टिकोण
कर्नाटक का दृष्टिकोण इस सिद्धांत पर आधारित है कि वयस्कों को अपने जीवनसाथी चुनने का अधिकार है और राज्य का काम उस निर्णय की रक्षा करना है खासकर परिवार या समाज के दबाव से। जब इन दोनों तरह के कानूनों को साथ रखकर देखा जाता है, तो अंतर स्पष्ट हो जाता है। एक कानून व्यक्ति के इरादों को नियंत्रित करना चाहता है, जबकि दूसरा हिंसा को रोकने पर केंद्रित है।
दोनों ही कानून सामाजिक वास्तविकताओं और राजनीतिक चिंताओं से उत्पन्न हुए हैं, लेकिन वे यह दिखाते हैं कि राज्य की भूमिका को लेकर अलग-अलग विचारधाराएं किस तरह कानून का रूप लेती हैं।
('द फ़ेडरल' सभी पक्षों के विचारों और मतों को प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। लेखों में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक के अपने हैं और ज़रूरी नहीं कि वे 'द फ़ेडरल' के विचारों को ही दर्शाते हों।)


